इस वक्त कैसा अहसास हो रहा है। बता नहीं सकता। घर में किसी की मौत हो गयी हो और तब आपको मर्सिया लिखना हो ऐसा ही लग रहा है। देश में लोकतंत्र की सरे-राह हत्या। एक लोकतंत्र जो किसी भी कीमत पर गरीब आदमी का लोकतंत्र नहीं था। लेकिन उस पर्दे को भी इस बे-पैंदी के प्रधानमंत्री की सरकार ने फाड़ दिया। रात के अंधियारें में आराम कर रहे हजारों लोगों पर पुलिस का लाठीचार्ज अश्रु-गैस के गोले बरसाये गये।
ये पुलिस वाले वहीं है जो पहले यूनियन जैक के नाम पर इस देश के लोगों पर अत्याचार किया करते थे और अब तिरंगे के नाम पर कर रहे है।
भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आंदोलन में दिल्ली आएँ इन देशवासियों पर कुछ हजार पुलिस वालों ने सरकार में बैठे बौंनों के आदेश में हमला बोल दिया। साफ तौर पर दिख रहा है कि आजादी के बाद भी इस देश की पुलिस ने कुछ नहीं सीखा। सत्ता में बैठे लोग चार जून से ही सदमें में थे कि क्या चल रहा है। राजधानी में कुछ लोग आ गये और पैसे वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कर रहे है। ये क्या बात हुई। पिछले साठ सालों से खाकी वर्दी के दम पर राज में हिस्सेदारी कर रहे लुटेरों के खिलाफ आंदोलन। मैं कई बार इस बात समझने में नाकाम रहा कि मीडिया ऐसे वक्त में क्यों चूक जाता है कि उसे किसका साथ देना है। टीवी चैनलों और अखबारों में ऐसी खबरें साया हो रही थी कि जैसे रामदेव नाम का ये बाबा पाकिस्तान का एजेंट है और इसके तंबू और कनात का पैसा आईएसआई ने दिल्ली में बैठे आरएसएस नाम के संगठन की मार्फत भेजा है। हो सकता है रामदेव के ट्रस्ट्र के खिलाफ कई शिकायतें हो फिर ये शिकायतें उसी वक्त को आती है जब वो भ्रष्ट्राचार के खिलाफ कोई आंदोलन कर रहा होता है। ये उसी वक्त क्यों आती है जब भ्रष्ट्राचार की नाभि में हमला करने की बात होती है। रामदेव के खिलाफ लोग मुझे एक बात से मुत्तमईन करना चाहते है कि ये बाबा कभी साईकिल पर चलता था तब मैं एक सवाल करता हूं कि क्या उन लोगों के बाबा हवाई जहाज में बैठ कर चलते थे।
इस पूरे मामले में दो किस्म की खीझ थी एक कि ये बाबा कभी साईकिल पर चलता था अब इसके पास हजारों करोड़ रूपये का ट्रस्ट है और दूसरी कि इससे लोकतंत्र को खतरा है। अरे शांति पूर्ण विरोध करना किस देश के लोकतंत्र में अवैध है। एक मैदान में बैठकर अनशन करना किस देश के कानून का उल्लंघन है। इस बारे में कोई बोल नहीं रहा है।
मैंने इस बात को समझने की कोशिश की चलो बाबा के खिलाफ हो सकता है भ्रष्ट्राचार के मामले हो लेकिन क्या इससे ही वो भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता है।
ये तर्क देने वालों से एक बात पूछना चाहता हूं कि रोटी के लिए जीबी रोड़ पर बैठकर जिस्म बेचने वाली औरत अगर बाजार में उतरती है तो क्या हर आदमी को उससे बलात्कार करने का अधिकार मिल जाता है।
मैं आजतक एक बात ही समझता रहा कि लोकतंत्र का मूल ये बात है जो किसी पश्चिमी विचारक ने कही थी।
"मैं आपकी कही बात से पूर्णतया असहमत हूं लेकिन आपके कहने की अधिकार की रक्षा के लिए अपने खून की आखिरी बूंद भी बहा दूंगा।"
Sunday 5 June 2011
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