Thursday, November 3, 2016

मुलायम सिंह जिंदाबाद-- शिवपाल सिंह कौन,,


बचपन में दोस्तों के बीच लडाई होने पर भी ग्रुप के बाकि दोस्तों को अपनी लाईन लेनी होती थी। और जिसका साथ देना होता था उसको गरियाना शुरू किया जाता था। उधर दोनों के बीच वाद-विवाद बढ़ते बढ़ते हाथापाई में बदल जाता था। और ऐसे ही वक्त जिस को पिटवाना होता था उसको हाथों में बांध कर बार बार कहा जाता था कि लड़ना नहीं है उधर जिसके हाथ पिटवाना होता था उसके हाथ खुले होते थे। ऐसे में वो दूसरे दोस्त का मुंह अपने घूंसों से लाल कर देता था। बाद में काफी देर बाद पिटने वालें को अपने साथियों की हकीकत समझ में आती थी लेकिन उस वक्त किया क्या जा सकता था। ये कहानी आजकर मुलायम सिंह के कुनबें में दोहराई जा रही है। मुलायम सिंह के इशारे साफ है, शिवपाल सिंह के हाथ बांधे हुए है और उधर अखिलेश यादव वार पर वार किए जा रहे है। शिवपाल की समझ में अभी आ ही नहीं रहा है कि मुलायम उनका साथ दे रहे है या उनका सफाया कर रहे है। प्रेस क्रांफ्रैंस में बेचारे बड़ी उम्मीद से भाई मुलायम सिंह के साथ आएं थे कि भाई कुछ बड़ा ऐलान करेंगे। भाई मुलायम सिंह ने साफ कहा कि पत्रकारों की बात सुन रहे है मुख्यमंत्री उनको लेना होगा तो ले लेंगे नहीं लेना तो उनकी मर्जी शिवपाल सिंह ने तो मंत्री पद की मांग नहीं की है। 
अखिलेश यादव पिछले चार साल से सरकार का चेहरा है। एनसीआर में रहने वाले जब भी अपने घर के लिए निकलते है या फिर घर से निकलते है तो उनके एफएम पर युवा मुख्यमंत्री का इतना गुणगान होता है कि कान कान नहीं रह जाते। राज्य के हर शहर और चौराहों पर मुख्यमंत्री के मुस्कुराते हुए फोटों आपका पीछा नहीं छोड़ते है। हर तरफ युवा नेतृत्व का शोर है। ऐसे में फिर ये कहानी कहां से पैदा हो गई कि मुख्यमंत्री को काम ही नहीं करने दिया गया। चेहरा मुख्यमंत्री ही थे और है। पूरी ताकत उनके पास थी और है। 
ऐसे में अगर चुनाव में पार्टी हारती( इस ड्रामें को हटा दे तब कि स्थिति) तब हारे हुए कार्यकर्ताओं को हमेशा कि तरह ( हर हारने वाली पार्टी का ये यक्ष प्रश्न होता है) एक सिर चाहिए था जिससे फुटबाल खेलकर वो अपनी हार का गम भूल सके और अगले पांच साल बाद की उम्मीद बनाएं रखे। इस सारे खेल में अखिलेश के अलावा किसी का चेहरा पार्टी के सामने नहीं था, लिहाजा सारी बंदूकों के निशाने पर पार्टी के सबसे उजले चेहरे अखिलेश यादव होते। तब कार्यकर्ताओं की आलोचनाओं का निशाना उन्हीं को बनना था। लेकिन अब कार्यकर्ताओं के सामने अगर हार होती है तो एक खलनायक पेश कर दिया गया है। पार्टी क्यों हारी क्योंकि शिवपाल सिंह ने हल्ला कर दिया। जिस भाई ने पार्टी खड़ी की उसी को पार्टी के भविष्य की नींव बना दिया गया है। 
मुलायम सिंह की राजनीतिक समझ आज भी इस देश के चंद राजनीतिज्ञों से बेहद महीन है और उन हजारों पत्रकारों से सौ गुना बेहतर जो कुछ नेताओं के पास बैठकर उत्तरप्रदेश को आंवला मानकर भविष्य बांचने लगते है। इसीलिए इस नाटक को जिस तरह लिखा गया उसमें शिवपाल आखिर तक समझने की हालत में नहीं रहे। 
इस वक्त कार्यकर्ताओं के लिए सबसे बड़ा नाम अखिलेश यादव है। विधायक उनके साथ है। आम कार्यकर्ता उनके साथ है। और मुख्यमंत्री पद उनके पास है। ऐसे में शिवपाल से पास क्या है। शिवपाल को आम पार्टी कार्यकर्ताओं की नजर में खलनायक के तौर पर बदलने में मुलायम सिंह के ज्यादा किसी का हाथ नहीं है। 
गजब की स्क्रिप्ट है। मुलायम सिंह अपने साथ बैठाएं हुए है शिवपाल सिंह को, पार्टी को अपनी बता रहे है, घर को अपना बता रहे है, अखिलेश की कोई हैसियत नहीं बता रहे है, लेकिन शिवपाल को कुछ दे नहीं रहे है। अगर किसी ने यूपी बोर्ड से पढ़ाई की है तो उसको एक कहानी वसीयत याद कर लेनी चाहिएं। जिसमें पंडित जी पूरे परिवार को गालियां देते है लेकिन लाखों रूपए देते है। घर,मकान और जायदाद देते है सिर्फ एक दामाद और अपनी बेटी की इतनी तारीफ करते है और जब उनके देने के नाम के कॉलम में सिर्फ आशीर्वाद निकलता है। माल तो जिनको गालियां दे रहे थे उनको सौंप दिया गया। इस मामले मेें वो कहानी पूरी तरह से याद आ रही है। 
मुलायम सिंह यादव की तरफदारी पर शिवपाल सिंह सवाल भी नहीं कर सकते। और शिवपाल सिंह अपना दर्द बता भी नहीं सकते। दांव इतना महीन कि शिवपाल सिंह और उनके समर्थक भी कह रहे है कि नेताजी के खिलाफ कुछ सुना नहीं जाएंगा और अखिलेश भी कह रहे है कि नेताजी के खिलाफ कुछ सुना नहीं जाएंगा। 
रही बात रामगोपाल सिंह की। दांव तो अच्छा चला रामगोपाल यादव ने लेकिन मुलायम के चरखा दांव के सामने कुछ नहीं। मुलायम सिंह की राजनीति की सबसे खास बात है मौके का चुनाव। रामगोपाल ने अखिलेश का साथ देकर अपने आप को भविष्य के समीकरण मेे अपने को फिट करने की कोशिश की थी लेकिन मुलायम तो भविष्य पर ही दांव लगा रहे है लिहाजा एक ही झटके में उनको ठिकाने लगा दिया। क्योंकि मुलायम जानते है कि चेहरा और भविष्य जरूर अखिलेश है लेकिन आज शिवपाल पॉवर शेयर कर रहे है तो कल रामगोपाल करेंगे लिहाजा 2022 का फैसला लेने के लिए आज ही दांव चल दिया है। 
मुलायम सिंह की राजनीतक समझ पर लोगों को शक हो वो हाल ही में बिहार चुनाव के वक्त बनाए गए मोर्चे की हालत देख ले। उससे थोड़़ा पहले जाएं तो उनको मुलायम सिंह के घऱ में राष्ट्रपति के लिए उनका समर्थन लेने पहुंची ममता बनर्जी और देवेगौड़ा का चेहरा तो याद होगा। उससे पहले वामंपथियों ने न्यूक्लियर डील पर मुलायम सिंह का लौहा देखा था, सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने से पहले का मुलायम दांव भी कांग्रेसियों को याद होगा। उससे पहले जाने वाले भी मायावती सरकार और उससे पहले वीपी सिंह का प्रकरण काफी लंबी कहानी है। लेकिन मैं एक बात आपको माननी होगी कि मुलायम सिंह को समझना आसान नहीं है। हालांकि दांव को लेकर आप रिसर्च कर सकते है लेकिन अखाड़ें में तो उसकी मास्टरी मुलायम सिंह के पास ही है। चरखा बना दिया सबकों अपने चरखा दांव से।

रजत सिंह नहीं रहा।


युवा पत्रकारों में से कुछ पत्रकार आपको हमेशा उम्मीद दिलाते रहते है कि मीडिया को उनसे कुछ बेहतर स्टोरी मिलेंगी। वो मीडिया के आने वाले वक्त में मेहनती चेहरों में शुमार होंगे। रजत उन्हीं में से एक था। दिल्ली आजतक के उन पत्रकारों में से जिनके साथ आज छोड़ने के बाद भी राब्ता बना रहा। अरावली की पहाड़ियों पर उसकी स्टोरी पर काफी चर्चा भी हुई, मैंने कहा था कि आप इसको और भी बेहतर कर सकते थे अवार्ड से भी आगे। हंसते हुए रजत ने कहा था कि दादा आपके साथ काम करना है। ऐसे ही एक दिन विजय चौक पर रजत ने हंसते हुए का कि दादा कब मौका मिलेंगा। मैंने भी हंसते हुए कहा कि अब तुम लोगों को नहीं मुझे ये कहना चाहिए कि मैं कब आप लोगों के साथ काम करूंगा। युवा सपनों के साथ उम्मीद का आसरा ज्यादा होता है,निराशा कम होती है। इस पर वो और मैं ठहाका मार कर हंस दिए। वो एक आखिरी मुलाकात थी। परसो एक साथी ने खबर दी कि रजत का एक्सीडेंट हो गया। फिर कल मेरी टीम के रिपोर्टर और रजत के जूनियर गौरव ने कहा कि सर वो एम्स में है और बचने की उम्मीद नहीं है। शाम को रजत से मिलने की उम्मीद में एम्स गया,एमरजेंसी विभाग में गया लेकिन वहां सी टू में रजत नहीं था। फिर मैंने अपने रिपोर्टर को फोन किया तो उसने कहा कि सर आप गलत आ गये है एम्मस में नहीं एम्मस ट्रामा सेंट्रर में है रजत। और तब मैं वहां पहुंच ही नहीं पाया, वापस आना पड़ा ऑफिस और फिर रात में गौरव का व्हाट्अप। मुझे मालूम नहीं रजत को न जानने वालों को मैं कैसे कह पाऊंगा कि रजत मीडिया की युवा उम्मींदों में से एक था। बस ये ही कह सकता हूं कि रजत नहीं रहा।

शिवपाल को धोबीपाट। मुलायम सिंह के भाई हो बेटे नहीं।


सालों पहले एक घर में बैठा था। घर मुलायम सिंह के संबंधी का था।बातचीत चल रही थी। पार्टी जीत कर सत्ता में आई थी। लिहाजा बात पार्टी की आगे की रणनीति पर ही हो रही थी। लेकिन बातचीत में ही मुलामय सिंह के संबंधी ने कहा कि 2017 के चुनाव में मुलायम की चुनौती शिवपाल होंगे मायावती नहीं। अजीब सी बात लगी। और लगा कि शायद उनकी अपनी राजनीति का गणित शिवपाल के गणित से टकरा रहा है शायद इसी लिए ये कहा होगा। लेकिन बात गहरी थी। मैने चैनल छोड़ दिया और उस पार्टी की कवरेज भी। सो बातें भी अतीत हो गई। लेकिन जैसे ही अखिलेश और शिवपाल का झगड़ा शुरू हुआ तो लगा कि सालों पहले से ये प्लॉन मुलायम सिंह के दिमाग में साफ था। भाई और लड़के के भविष्य के बीच चुनाव करना है तो हिंदुस्तानी राजनीति और हिंदु्स्तानियों की परंपरा बेटे को ही चुनती है। भले ही भाई की कुर्बानी की तारीफ में नेताजी की जुबान में कितने ही छाले पड़ जाएं। इस बार की सरकार में शिवपाल के लोग काफी थे। ऐसे तमाम विधायक थे जो शिवपाल के इशारे पर इस्तीफा दे भले नहीं लेकिन लंका लगा सकते थे। लिहाजा मुलायम अपने बेटे को समय समय पर भभकियां दे कर लोगों को और उससे भी ज्यादा अपने भाई को बहलाते रहे। सरकार के बीच में टूट जाने से बहुत से लोग शिवपाल के पाले में भी खड़े हो सकते थे। लिहाजा चार साल राम राम करते हुए गुजर गए। मंथराओं से भरे हुए सत्ता तंत्र में षड़यंत्र तो दिमाग तेज करने के काम आते है। लिहाजा षड़यंत्र बुने जाते रहे और लोग आते जाते रहे। मोहरे बदलते रहे और बिसात पर खेलने वाले पिता-पुत्र ही रहे। मुलायम सिंह की जमीनी समझ पर शायद ही किसी को ऐतराज हो। और पाला बदलने की उनकी योग्यता पहलावानी के अखाड़ों से उपजी हुई है। ऐसे में जब चुनाव नजदीक आ गए तो शिवपाल का पहाड़ा पढ़ने का समय भी आ गया। नेताजी की बिगड़ती हुई सेहत इस बात की ओर इशारा कर रही थी कि जल्दी ही अखिलेश का रास्ता निष्कंटक करना होगा नहीं तो चुनाव के बाद संकट शुरू हो सकता है। सरकार को बनाने के लिए विधायकों को जीताना होता है। और विधायकों को जीताने से पहले अपने आदमियों को टिकट देना होता है। टिकट बांटने का अधिकार किसी भी तरह से साझा करना सत्ता में साझा करना होता है। और मुलायम सिंह इसको किसी के साथ साझा नहीं करना चाहते थे। लिहाजा ये पूरा नाटक तैयार किया गया। कई सारे बकरों को इकट्ठा किया गया। उनके गले में माला पहनाई गई और फिर पूजा स्थल तक ले जानै के लिए तिलक भी किया गया। इस बात को सबको मालूम है कि बकरों को कब लाया गया और उनका क्या इस्तेमाल किया गया। शिवपाल जमीन पर मजबूत आदमी है। जातिवादी कबीलाई मानसिकता का जीता जागता रूप। अपने आदमी के लिए आखिरी तक लड़ने की मुलायम सिंह की आदत के एक दम अनुरूप। भाई के लिए परछाईयों से भी लड़ जाने वाले शिवपाल में सब कुछ सही था बस इतिहास उनके खिलाफ आ गया। इतिहास गवाह है कि ज्यादातर मौकों पर सत्ता बेटों को दी जाती है भाईयों को नहीं। और यही कारण है कि जातिवादी राजनीति के मसीहा और मुस्लिम यादव एकता के नायक मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल सिंह को धता बता दी। अब टिकट बंटवारे के वक्त अगर शिवपाल बगावत भी करते है उसको उनकी आदत खराब बता कर उनको पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएंगा। ये सारा खेल मुलायम सिंह का था और शिवपाल मुलायम की भाषा समझने में सबसे एक्सपर्ट होने के बावजूद दांव खा गए।
रही बात गायत्री-फायत्री की तो इन लोगों की हैसियत अपनी मर्जी से अपने कुर्तें के बटन खऱीदने तक की नहीं लिहाजा ये खनन पनन में पैसा अपने लिए कमा रहे होंगे ये बात सोचने वाले को पूरी ट्रॉली रेत खिला दोंगे तब भी उसकी बुद्दि का आरा तेज नहीं हो पाएंगा। खैर पार्टी में अगर कोई बुद्दिजीवि होने का दिखावा या नाटक करता है तो उसको याद रखना चाहिए कि महाभारत में अर्जुन ने भीष्म को मारने के लिए शिखंडी का इस्तेमाल किया था। और आप जानते है शिखंडी आज भी शिखंडी के तौर पर ही याद किया जाता है महारथी के तौर पर नहीं।

Saturday, August 6, 2016

अब कहां ढूढ़ने जाओंगे हिरण के कातिल। यूं करों कि कत्ल का इल्जाम हिरण पर ही रख दो।

सलमान खान रिहा हो गए। गज़ब की ख़बर हुई। सुल्तान, दबंग या फिर भाई जाने कितने नामों से मीडिया को खुशी से बेहाल होते हुए देखा। यहां से आगे सुप्रीम कोर्ट है जहां से भाई को जमानत मिलने में अक्सर देर नहीं लगती है। हजार बार से ज्यादा ये दिख जाता है दिन भर में अंधों को भी कि जेब में माल है तो फिर कानून जूते में है। ( सहारा का उदाहरण न देना- उसकी कहानी ये है कि अभी तक एक संपत्ति नहीं बेच पाईं चल पाई) । हिरण मरे या नहीं मरे इस पर सवाल खड़ा होना चाहिए। मैं तो ये चाहता हूं कि उस जंगल के हिरणों को इस अपराध में सजा देनी चाहिए कि उनकी वजह से सुपरस्टार को परेशान हुई। एक सजा ये भी हो सकती है कि सलमान खान को उनके शिकार की ईजाजत दे देनी चाहिए। मैं हैरान हूं कि ये कैसे हिरण है दबंग से मरने के लिए बेकरार नहीं हो रहे है। लाईन में लग कर आ जाना चाहिए और अदालत जानती है कि हिरण इस तरह आना चाहते है। लेकिन बेईमान मीडिया या दलाल चिल्लाते तो वो निकल भागते है।
हरीश दुलानी को जानते है शायद मीडिया को उसको दिखाने की सुध नहीं थी। सालों साल पहले जब इस खबर में हरीश दुलानी की कहानी शुरू हुई थी तो उसकी मां मिली थी एक मकान में बैठी हुई। बेटा गायब हो गया था। वही बेटा था हरीश दुलानी। हरीश दुलानी चश्मदीद गवाह था इस केस का। एक बार बयान देने के बाद गायब हो गया हरीश दुलानी। फिर सालों तक कहां रहा कुछ पता नहीं। एक दूसरा गवाह और था जो एक गांव में था, अच्छा खासा आदमी पागलों की तरह व्यवहार कर रहा था और झोंपड़ी में उसकी हालत देख कर लगा था ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहेगा। वही हुआ वो भी निबट गया दंबग की राह के दूसरे कांटों की तरह। फिर कुछ साल पहले हरीश दुलानी वापस आ गया। दुलानी को कोर्ट ने कई बार सम्मन भेजे। कई बार उसकी तलाश का नाटक हुआ। लेकिन किसी को उसका पता नहीं लगा। लेकिन किसी अदालत को किसी अधिकारी को कठघरे में खड़ा करने का नहीं सूझा। अदालतों की एक बात और सुंदर लगती है कि जब वो किसी को रिहा करती है तो एजेंसी को काफी कोसती है लेकिन किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं करती हालांकि ये भी उनके अधिकारक्षेत्र में आता है। इससे होता ये है कि फैसला आपका, बचाव किसी ताकतवर का और लाठी भी बच गई। ग़जब की नौटंकी चल रही है। हरीश दुलानी से बात करने की कोशिश की थी तो उसकी हालत भी ऐसी ही लगी कि उसको एक लंबें समय तक ऐसे हालात में रखा गया कि वो सामान्य जैसा न लग सके। (कानून को मालूम नहीं हुआ कि कहां है लेकिन जोधपुर की गली में घूमते हुए आवारा कुत्तें भी भौंक कर बता सकते है कि वो कहां रहा) बहुत मजेदार बात की बचाव पक्ष को अहम गवाह से जिरह की करने जरूरत ही नहीं( जरूरतें पूरी होने के बाद किसी की जरूरत नहीं रहती)
मुझे इस फैसले को देखने के बाद याद आ रहा है राहत इंदौरी का एक शेर ( शब्द दर शब्द याद नहीं है कोई इसको सुधार भी सकता है)
अब कहां ढूढने जाओंगे हमारे क़ातिल .
यूं करो कि कत्ल की इल्जाम हमी पे रख दो।
और इसको कहा जा सकता है
अब कहां ढूढने जाओंगे हिरन के कातिल
यूं करों कि कत्ल का इल्जाम हिरन पे ही रख दो।

हादसा नहीं हुआ अभी तक, भगवान को धन्यवाद दो सरकार कोई नहीं है।

अखबार की पहली हैडलाईंस और दिल पत्थर सा। एक मां-बेटी के साथ समाजवादी सरकार के स्वर्ग में सामूहिक दुष्कर्म हो गया। हाईवे पर। घंटों एक मां-बेटी के साथ घिनौना अपराध कर रहे अपराधियों को मालूम था कि समाजवादी जाति की पुलिस अभी किसी न किसी अपराध पर पर्दा डालने में जुटी होगी इसी लिए इँसानियत के पर्दे को तार-तार करने में कोई परेशानी नहीं है। कोई डर नहीं है कोई बाधा नहीं है। जब ये अपराध रात में हो रहा था उस वक्त जाम में फंसे हुए रेडियों पर गानों के बीच में एक एड बार बार आ रहा था जिसका पैसा इस दुष्कर्म की शिकार मां-बेटी के परिवार की गाढ़ी कमाई से ही आया था किसी समाजवादी राजा की जेंब से नहीं। एड था कि ये चमकती गाड़ियां और सजग पुलिस दिखाई दे रही है क्या हम अमेरिका में है तो जवाब देती है कोई दूसरी आवाज नहीं ये उत्तरप्रदेश है समाजवादी सरकार ने ये सब कर दिखाया है। सड़कों पर गुंडे खुलेआम नाच रहे है। लूट और हत्या की खबरें सब पेजों पर है। ये कोई नई बात नहीं है इस राज्य के लिए लेकिन पुलिस जिस तरह से बेलगाम है जातिवाद के नंगें नाच में जुटी है वो जरूर चौंकाता है। नया वो नहीं है क्योंकि सरकार एक बार पहले भी आकर ये खेल कर चुकी है। दरअसल जातिवाद ने लोकतंत्र की मूल भावना को खत्म ही कर दिया या पनपने ही नहीं दिया। बहुत से समाजवादी जाति के लोग इस बात पर हल्ला काट देंगे कि ये क्या लिख दिया लेकिन मैं सिर्फ एक जाति की बात नहीं कर रहा हूं सत्ता हासिल होने पर शुरूआती पांच दशक तक सर्वणों से ताल्लुक रखने वाली जातियों ने भी मिल जुल कर ये ही खेल खेला। लेकिन तकलीफ तब शुरू हुई जब जनतंत्र की व्यवस्था के शोषित सत्ता में आएँ और उन्होंने भी वही सब करना शुरू कर दिया। यानि आंख के बदले आंख का सिद्दांत का शुरुआती गणित दोहराना शुरू हो गया। मैं सिर्फ ये ही कह रहा हूं कि मुझे लगता है कि बेहतर होना चाहिए था नई रोशनी में नए तरीके से। लेकिन किसी को इस तरफ जाना बेहतर नहीं लगा।जातियों की कोठरियां बन गई। अभी मुझे मालूम नहीं है कि वो बेगुनाह मां-बेटी किस जाति की है धर्म की है या फिर संप्रदाय की है। क्योंकि अखबारों ने भी उनकी अभी जाति नहीं लिखी है इसका मतलब वो खबर बनाने वाली जातियों या धर्म से रिश्ता नहीं रखती है। 
आप ऐसी पूरी सदी को अपने अंदर जीते हुए गुजरते है जिसमें कही कोई उम्मीद के बदले बदला ही बदला दिख रहा हो तो कैसा लगता है ठीक उसी जैसा - जैसे अब किसी भी संवेदनशील आदमी को इस तरह की खबरें पढ़ कर लगता है। ये सिर्फ सहानुभूति हो सकती है क्योंकि किसी एक की असहमति की भी ईज्जत का नारा जो लोकतंत्र की मूलभूत अभिव्यक्ति है उसका मौजूदा लोकतंत्र से कोई लेना-देना नहीं है। यहां तो उलट है लोकतंत्र को इस तरह गढ़ा गया है कि कुछ जातियां एक गोलबंदी का गणित बैठा कर सत्ता में आ सकती है और हमेशा से बहुमत में रहे विपक्षी जातियों के गठबंधनों को हौंक सकती है। और वो विपक्षी भी इंतजार करते है अपनी बारी का ताकि गिन गिन कर बदले ले।
लेकिन इन सबके बीच असली कहानी कही और है वो है नौकरशाहों की असीम ताकत। लूट और लूट के चक्र को अपने मुफीद बनाते हुए ये नौकरशाह किसी ऐसे हादसे के शिकार नहीं होते। इनके परिजन हाईवे हो या जंगल हमेशा एक सुरक्षा कवर से घिरे होते है। पुलिस को रोज आम इंसान को लाठियों से पिटते हुए देखना, थानों में इंसान को कुत्तों की तरह देखना जैसे दृश्य अपनी पत्रकारिता के 17 सालों में खूब देखे है। बहुत से लोग इस बात को अन्यथा लेंगे लेकिन कोई ये नहीं बता पाता कि थानों से वापस आने वाले आदमी का पुलिस पर से विश्वास क्यों उठ जाता है।
इस घटना में पुलिस ने रिपोर्ट लिखने में जो करतब दिखाएं है वो उसके डीएनए में है। पहले ये देखा जाना कि विक्टिम किसी जाति है अगर उसका सत्तारूढ़ पार्टी के जाति समूह से कोई रिश्ता नहीं है तो ये जानवर है जिसके साथ किसी इंसान ने कुछ कर दिया है इसको भुगतना ही चाहिएं। फिर थानेदार साहब को ये देखना है कि अपराधी किस जाति का है। अगर उसका सत्ता में बैठे गणित में हिस्सा है तो फिर उसको बचाने के लिए इस जानवर के साथ कैसा सलूक करना चाहिए। उस घटना को कैसे दर्ज किया जाना है ये इसी बात पर तय होता है। अब सवाल ये भी बचता है कि यार अगर दोनो में से कोई सत्ता गणित में पास जाति का नहीं है तब क्या देखा जाता है तब ये देखा जाता है कि किसकी जेंब से माल ऐँठा जा सकता है जो ज्यादा देगा वो ज्यादा पाएंगा। गणित सीधा है। जब सत्ता में समाजवादी जाति हो तो खाकी उनकी और जब भगवा में हो तो पुलिस के पास भगवा। पुलिस और पानी एक जैसे जिस बर्तन में डालों उस जैसे।
लेकिन हजारों लाखों लोगों को खौंफ में सड़कों पर चलना फिर उस आग भरी सड़कों से उतर कर घर की छोटी सी पनाहगाह में रात गुजारना कम मुश्किल से भरा नहीं। सड़कों पर चलते हुए पुलिस को दस रूपए दे कर विशेषाधिकार हासिल करने वाले ऑटों या बसों के गुंड़ों से बच कर ऑफिस तकपहुंच जाना और वहां से घर आना आपकी किस्मत पर निर्भर है किसी कानून पर नहीं
ये कहानी कोई नयी नहीं है 2007-8 में मुरादाबाद के मझौला थाने में इसी तरह का एक केस मैंने कवर किया था जिसमें कोई साईकिल का फ्रैविल सड़क पर डाल कर एक परिवार की कार को रोक कर लूट की थी और दुष्कर्म किया था। और वो परिवार जिसको एक जुल्म के खिलाफ खड़ा होना था वो बेचारा शर्म से मुंह छिपा रहा था क्योंकि सवाल इतने घिनौंने पूछे जाते है जैसे किसी थर्ड ग्रेड का स्क्रिप्ट राईटर इनको ये सवाल लिख कर दे गया हो।
(किसी को हो सकता है गुस्सा आएं जातिवादी लेख पर लेकिन बस इतना ही कहना है कि बलात्कारी भी ये उदाहरण दे सकते है कि उनकी जातियों के साथ ऐसा हुआ तो वो ऐसा कर रहे है। )
मेरी एक पुरानी कविता है जो इस तरह के डर पर आज से बरसों पहले लिखी थी शेयर कर रहा हूं अगर मन आएँ तो पढ़ सकते है।
डर आत्मा से खुरचता ही नहीं :
.................................................
अलार्म रोज बजता है,
चौंक कर आंखें खुलती है,
पसीने से भींगें जिस्म के साथ मैं सबसे पहले टटोलता हूं
जल को
हाथ जब तक उसको छूता है
तब तक आंखें भी देख लेती है उसको मुस्कुराकट के साथ सोए हुये
कई बार मिल जाती है बीबी भी बगल में लेटी हुयी
और कई बार खाली दिखता है उसका बिस्तर
चीखता हूं
.... रश्मि
हाथ में चाकू लिये
या फिर आटे से सने हुए हाथों में
तेजी घुसती है बेडरूम में
और पूछती है
क्या हुआ
कुछ नहीं
,
तुम ठीक हो ना
चप्पलें पैरों में डालता हुआ
संयत होने की कोशिश करता हूं
रात बीत गयी
डर
है कि खत्म नहीं होता।
कुछ न कुछ हो जायेगा
रात भर सड़कों पर घूमते रहे है लुटेरे
पुलिस वालों की जीप में बैठकर
....
मेरा घर बच गया है
आज रात

मैं कई बार ढपोरशंख की कहानी पढ़ता हूं गृहमंत्री जी। बिना मुंह का हो गया पाकिस्तान।

पाकिस्तान से बिना बिरयानी खाएं लौट आएं गृहमंत्री जी। एअरपोर्ट पर बेताब से पत्रकारों की बिरादरी में अपने बौनेपन के साथ मैं भी शामिल था। आखिर देश के गृहमंत्री दुश्मन देश की जमीन पर ( बहुत से लोगो को ये विशेषण नहीं पचेगा) उसे करारा जवाब देकर लौटे । ( ये हिंदुस्तानी मीडिया की लाईन थी) करारा ऐसा कि पाकिस्तान की बिरयानी भी नहीं खाई। मैने भी यही कहा। 
लेकिन एक प्रसंग साथ चल रहा था कि हमने पढ़ा क्या है और हमने कहा क्या है।
आप जिद करके बिरयानी खाने गए थे। आपकी जिद थी कि आप पाकिस्तान जाकर बिरयानी खाएंगे और उसी को गरियाएंगे। याद है कि नहीं क्योंकि बेशर्मी के घड़ें में यारदाश्त सबसे छोटा कण होती है कि आतंकियों के साथ अगर कोई मुठभेड़ भी लंबी चली तो आपके राष्ट्रवाद ने नारा लगाया था कि आतंकियों को बिरयानी खिला रहे है। शहजादे और उसकी मां को आपके महान नेता ने काफी गरियाया कि बहुत बिरयानी खिलाई आतंकियों को उन लोगो ने। लिहाजा मुझे लगा कि आपकी सरकार ने तय किया कि अब उनकी बिरयानी खाई जाएं ताकि बदला पूरा हो। इसीलिए पहले प्रधानमंत्री बिरयानी खाने बिना निमंत्रण पहंच गए और फिर आपको भी ये अदा इस्लामाबाद तक खींच कर ले गई।
खैर कहानी ये है कि आपको जिस लंच में जाना था वहां मेजबान नहीं था तो आप बिना खाएं लौट आएँ। ये आम शिष्टाचार होता है आपकी कोई वीरोचित बहादुरी नहीं जिस पर संसद में ताली पीटी जा रही थी। वहां बैठे हुए बहादुरों के बारे में देश अच्छे से जानता है एक एक को समझता है आखिर वहां वो वोटों के गणित से ही पहुचे है ना। बचपन की एक और कहानी है कि किस को नारायण दिखा। तो वहां सब लोगो को एक कहानी को बनाएं रखना था। वो कहानी थी कि जिद पर ऐसे माहौल में जब वो आपके देश को तोड़ने के खुलेआम प्रदर्शन कर रहा है उस वक्त आप वहां इस ख्वाब में चले गए कि वो हार लेकर खाने की थाली पर बैठकर आपका इंतजार कर रहा होगा।
मुझे उम्मीद है कि चार अगस्त की दोपहर के बाद से पाकिस्तान में सैकड़ों-हजारों लोग बिना मुुंह के घूम रहे होंगे क्योंकि आपका मुंहतोड़ जवाब लगातार वहां गूंज रहा होगा और लोगो के मुंह तोड़ रहा होगा। पाकिस्तान में बुर्कों की खरीद -फरोख्त बढ़ गई होगी इसी से इंडियन एजेंसियों की गणना फेल हो रही होगी नहीं तो आपके पास डाटा आ गया होता कि कितने लोगो के मुंह तोड़ दिये गए है। ऐसा ही आपने श्रीनगर में किया। आपके दौरे बाद अलगाव वादियों ने बुर्का पहन लिया और पत्थरबाजों के चूकिं आपके मुंहतोड़ जवाब ने मुंह तोड़ दिये लिहाजा वो जाने पत्थर कैसे फेंक रहे होंगे।
बात सिर्फ तंज की नहीं है बात है दर्द की। बात है एक ऐसे अनूठे सिस्टम की दो देश को लोगों को और आने वाली पीढ़ी तो चट कर रहा है उनके भविष्य को काला कर रहा है और उन्ही से ताली बजवा रहा है। गजब का कारनाम है। पूरी सरकार ने वोट हासिल किए थे कि वो बिरयानी खिलाने वालों को जवाब देंगी और कश्मीर में अलगाववादियों से कोई बात नहीं करके धारा 370 को हटाने की दिशा में काम करेंगी। आपने 370 का नाम सदन में सुना है क्या उसी सदन में जिसमें कश्मीर पर सदन ने चर्चा की। वही सदन जो देश का भविष्य बनाता है। उस सदन ने जिसने एक मत हो कर कश्मीर पर जवाब दिया। अब कुछ कहना दिक्कत कर देंगा कि ये वही सदन है और इसकी राजनाथ सिंह की गई तारीफ ऐसी ही है जैसी सदन में कश्मीर को लेकर की गई चर्चा मैं ये तो लिख ही सकता हूं कि-- दोनो चर्चाओं का कश्मीर की हकीकत से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है। एक कविता याद आती है मेरी अपनी हालात कैसी है इस खबर को करने और देखने के बाद, उसको इसके साथ जोड़ रहा हूं जो पढ़ना चाहे पढ़ सकते है।
काले को काला. सफेद को सफेद कहना
........................................
काला
वो बोले
भय से भीगी जनता चिल्लाई.... काला,
लेकिन वो काला रंग नहीं था
मैंने हाथों से मली आंखें बार-बार
दिमाग पर जोर डाला कई बार,
लेकिन ये तो नहीं है काला
मेरे चारो ओर घिर आये लोग
जोर देकर उन्होंने कहा कि काला
ध्यान से देखा मैंने फिर
लेकिन ये नहीं है काला
थोड़ी धीमी हो गयी थी मेरी आवाज
वो जिनकी तेज निगाह थी मुझ पर
उन्होंने कहा देखो ध्यान से
अचानक मुझे लगने लगा कि हां वो काला ही तो है
भीड़ से आवाज मिलाकर मैं चिल्लाया
हां.... कितना..... काला,
उसके बाद से मुझे नहीं मिला किसी भी रंग में अंतर
जो वो देखते रहे, मुझे भी लगता रहा वैसा ही
मैंने काले को सफेद, सफेद को हरा,
हरे को लाल और नीले को कहा काला
और फिर मैं भूल गया कि मैंने क्या कहा किस को
लेकिन
मेरे हाथ कांप रहे है आज
मुश्किल हो रही है मुझे बोलने में
जल पूछ रहा है,
रंगों की किताब हाथ में लेकर
पापा जरा बताओं तो ये कौन सा रंग है
मैं समझ नहीं पा रहा हूं
कि
इसको कौन सा रंग कौन सा बताना है।

उत्तर प्रदेश-- अ से अखिलेश, आ से आजम। ज से जाविद और वोटों का गणित..

बुलंदशहर की सड़कों पर एक रात एक परिवार के साथ हैवानियत हो गई। इस प्रदेश की सड़कों की ये एक आम बात है। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री नाराज हो गए। ( ये विचित्र बात है) पत्रकारनुमा चमचों की भीड़ ने इस तरह से नारा गुंजाया कि डीजीपी को हेलीकॉप्टर मिल गया घूमने के लिए। डीजीपी साहब वोटो के गणित के हिसाब से सबसे उम्दा है। इससे बेहतर गणित का डीजीपी इस प्रदेश को मौजूदा समय में नहीं मिल सकता है। आखिरकार डीजीपी वहां पहुंचे। सरकारी अमला हरकत मं आ गया। आखिर इसी लिए तो सरकारी अमला बना है कि साहब बहादुर जब भी आएँ तो कपड़ों पर इस्त्री हो, सैल्युट लगाना है और कंधों पर बंदूक टांगनी है, वसूली एक दिन पहले बंद करनी है एडवांस में लेने का कायदा भी हो सकता है ताकि सब कुछ ठीक-ठाक दिखे। डीजीपी साहब ने फौरन कुछ लोगो को सस्पैंड कर दिया। ( सस्पैंशन कोई सजा नहीं होती है ये कानून में है। वो फिर वापस छह महीने अपनी कमाई पूरी करने के हौंसले और हिम्मत से जुट जाते है)। लेकिन ये कोई बड़ा कारनामा नहीं है, वो तो उससे भी बड़ा कारनामा करने आएँ थे और कारनामा था कि उन्होंने तीन लोगो के पकड़े जाने की घोषणा की। तीन लोगों का नाम लेकर उन्होंने बताया कि इन लोगों ने वारदात में हिस्सा लिया। और वहां से उड़ गए। पत्रकारों ने आसमान को गुंजा दिया कि किस तरह से तीन लोगों ने इस वारदात को अंजाम दिया। कहानी पूरी हुई लेकिन अगले दिन जब जेल में गएं तो पता चला कि उनके नाम बदल गए। ये उलट-बांसी कैसे हो गई। अफसरों ने कहा कि डीजीपी साहब गलत नाम बोल गए थे।लेकिन डीजीपी ने जो कारण बताया वो किसी ऐसे देश में जिसमें कानून का शासन होता तो शायद डीजीपी बर्खास्त हो गए होते नहीं तो उनसे हाउसिंग नाम के कोल्डस्टोरेज में तो भेज दिया जाता। डीजीपी साहब ने बताया कि अपराधियों ने नाम गलत बताया और डीजीपी साहब ने यकीन कर लिया। किस तरह से यकीन कर लिया इसी तरह जिस तरह से उनकी पुलिस ने उनका रिमांड लेने की कोशिश नहीं की। मुझे उन अपराधियों पर तरस आ रहा है क्योंकि उन्होंने अपनी राष्ट्रीयता गलत नहीं बताई। अगर वो अपने आप को अमेरिकी नागरिक बताते तो डीजीपी साहब यकीन कर लेते। क्योंकि ये वोटो के गणित से भी बेहतर होता। आखिर अमेरिका को लेकर एक तबके में जिसकी उत्तरप्रदेश में बहुत वोट है बहुत गुस्सा है। ऐसे में अगर मुल्जिम अमेरिका बतातें तो सोचो क्या गणित बैठता वोटों का। और आगे जेबकतरी के एक छोटे से मामले में पुलिस वालों में मुल्जिम का रिमांड लेने की जो होड़ मचती है इसमें एक ऐसे मामले में जिसमें मुख्यमंत्री नाराज हो गए उसमें कोई रिमांड नहीं। ऐसा शानदार कारनामा कभी देखा नहीं गया। खैर कोई बात नहीं ये डीजीपी साहब पुलिसिंग जानते है क्योंकि इन्होने बताया था कि दादरी वाले में मसले में मांस गाए का हो या फिर भैस का अब उससे केस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यानि बिना मोटिव के ये साबित कर देंगे कि कत्ल हुआ है। इनकी बात बात गजब होती है लेकिन लोगों को जेहन में ये भी रखना चाहिए कि ये साहब सीबीआई में भी आरूषि केस में भी थे। खैर इनकी छोड़िये नाराज हो जाएँ क्या पता इसलिए इस बात को यही खत्म करते है माफी मांगते हुए कि साहब हमको पुलिसिंग का क ख ग नहीं आता।
अब एक आजम साहब है। पूरे इतिहास भूगोल को अपनी उंगुलियों में समेटे हुए वो जानते है कि पुलिसिंग किस चीज का नाम है। आखिर पुलिस ने उनकी खोई हुई भैंस खोज दी थी। ऐसी जादुई और कारामाती पुलिस को वो कई बार करेक्ट करते रहते है। इसी लिए उनको सामूहिक बलात्कार कांड में राजनीति दिखाई दी। एक बाप जिसके रोते हुए शब्दों ने हर ऐसे इंसान के कानों में पिघला हुआ शीशा उतर कर रख दिया जिसके सीने में दिल था। बेटी की चीखों के बीच उस बाप का दर्द जो बेटी के साथ बलात्कार के दौरान बाप को पुकारने की आवाज सुन रहा हो। ऐसा बाप जो अपनी जिंदगी भर इस दर्द को ढो़ने के लिए मजबूर होगा। उस बाप की आवाज में उस राजनेता को राजनीति दिखाई दी। लिखने को तो क्या लिखा जा सकता है कि -किस तरह की राजनीति करने के लिए बलात्कार कराना होता है अपनी बेटियों के साथ। इस तरह की हरकत के लिए खुद को तैयार करना होता है क्या खान साहब। लेकिन अगर आप ये बात लिख रहे हो कि ये बात उसको समझ नहीं आएंगी तो गलत लिख रहे हो। क्योंकि आजम खान साहब को ऐसी बातें खूब समझ आती है। नफरत के दम पर राजनीति कर रहे आजम खान साहब को मालूम है समाजवादी का क्या मतलब है इस प्रदेश में। समाजवाद कैसे उतरता है इस प्रदेश में। या दूसरा कोई भी वाद किस तरह नफरत की कोख से पैदा होता है वो जानते है सब कुछ। मुस्लिम वोट और यादव की वोट की कोख से पैदा हुआ ये नूतन समाजवाद किसी को उलझा सकता है। लेकिन अपने को इस तरह की राजनीति देखने की आदत सी हो गई है। एक ही उलझन है और वो है कि किस तरह से रोज रेडियों पर इस सरकार और अखिलेश यादव की तारीफों से भरे विज्ञापनों का खर्च हमको देना है क्योंकि जातिवादी और धार्मिक समूहों की कबीलाईं एकता के दम पर राज कर रही इस सरकार को टैक्स दिए बिना प्रदेश में कौन रह सकता है।
और आखिर में अखिलेश यादव जी। आपका युवा नेतृत्व कमाल का है। आपके पिता और समाजवादी ( मर्सीडीज 350 ए में चलने वाले) मुलायम सिंह जी रोज आपको बता रहे है कि जमीन लूटने से सरकार वापस नहीं लौटने वाली है। खनन माफिया के दम पर सत्ता वापस नहीं आने वाली है। आपको मुलायम सिंह को बताना चाहिए कि रेड़ियों के विज्ञापनों से छवि एक दम चका चक है। बौंने मीडिया को अफसरों ने काफी टुकड़े डाले हुए है लिहाजा हर अखबार की खबर में रेप की खबर बाद में थी और मुख्यमंत्री नाराज है की लाईन पहले थी। हमारे जैसों के भौंकने से होता क्या है।
राहत साहब की एक लाईन याद आई।
झूठों ने झूठों से कहा, सच बोलो
घर के अंदर झूठों की पूरी मंडी थी
दरवाजे पर लिखा था
सच बोलो।

Monday, June 13, 2016

मथुरा- बौंने - पुलिस और दहकते हुए सवाल

मथुरा में जवाहर पार्क है। दो सालों से वहां कब्जा है। उपरी अदालत तक मामला चला गया। सत्याग्रही है हजारों की तादाद में। फिर एक दिन टीवी चैनलों पर चलने लगा। पुलिस पर पथराव। सत्याग्रहियों को निकालने के लिए पुलिस ऐक्शन में एसपी सिटी और फरह के थानाध्यक्ष की मौत। इसके बाद पता चलता है और फिर सब कुछ आग के हवाले। आग से निकलती है दो दर्जन से ज्यादा लाशें। पहचान होना मुश्किल है। डीजीपी भी मौके पर पहुंचे। फिर अगले दिन तक देश के मीडिया को सुध आ गई। इसको और सरल शब्दों में कहे तो सूंघ आ गई टीआरपी की। और तमाम चैनल चल पड़े टीआरपी से सुर्खरूं होने। फिर अखबारों में भी लिख रहे पत्रकारनुमा लोगो को जोश आया। और फिर शुरू हुआ एक शख्स का टीकाकरण। किताबों में ब्रह्मराक्षस के जितने गुण हो सकते थे सबसे नवाज दिया। मैं अखबारों को पढ़ रहा था और सैकड़ों मील दूर बैठा हुआ कांप रहा था। हे भगवान। इतना ताकतवर शख्स वहां बैठा था। पूरा प्लॉन तैयार था। देश पर कब्जा करना था। लग रहा था कि मथुरा से शुरू होकर ये शख्स जल्दी ही दिल्ली पर कब्जा करने वाला था। पार्क में उसकी सत्ता चल रही थी। सैंकड़ों की तादाद में हथियार थे। फिर सुर्खियों में आया कि रॉकेट लांचर भी मिल गया। अमेरिका में बना हुआ। कुछ बच्चों के खिलौने जल गए होंगे आग में नहीं तो टैंक भी मिलना चाहिए था। कुछ लोगो ने उसको नक्सल से लिंक की जांच एमएचए से करा दी। गजब का उत्साह चल रहा था एक दूसरे से आगे बढ़ कर खबर लिखने का। लेकिन कुछ दिन पहले तक इस सब का कुछ पता नहीं था इन पत्रकारों को। ये पार्क शहर के भीतर ही था। एसपी और डीएम के दफ्तरों के करीब। शहर के बीचोंबीच। जहां रोज ये महान खोजी पत्रकार अपनी बाईक लगाकर किसी दफ्तर में बैठ कर साहब लोगो को नमस्ते करने जाते थे। और साहब लोग वो जो मथुरा जैसे जिले में समाजवाद के नायकों के प्रसाद स्वरूप इस जिले में पोस्टिंग का मजा लूट रहे थे। लेकिन किसी को लगा नहीं कि लादेन का गुरू यही रहता है। किसी को लगा नहीं नक्सलवाद के नायकों से भी बड़ा नायक सामने पार्क में जन्म ले रहा है। लेकिन क्या ये सच है। क्या झूठ के धुएं में सच को इतना पीछे नहीं धकेल दिया गया है कि इस घटना के लिए दिल्ली से कुछ घंटों या कुछ दिनों की मोहलत लेकर रिपोर्टिंग करने पहुंचे बौंनों की आंखों पर लगे रेबैन के चश्मों से दिखना मुमकिन नहीं रहा । लेकिन रिपोर्ट तो करनी थी। शहादत हो चुकी थी। पुलिसअधिकारी मर चुके थे घटना में। आखिर ये शहादत कम तो नहीं है। ऐसे में लाशों की गिनती करना बेकार है। 
अब दिल्ली से पहुंचे पत्रकारों की सूचना का स्रोत क्या होगा। लोकल के वे लोग जो पुलिस के करम के मोहताज है। जो टीवी पर चेहरा और अखबार में नाम छपवाने के लिए कुछ भी बोल सकते है। वो लोग जिनको पुलिस अब गवाह बना देंगी। वो लोग जो पार्क में थे और अब पुलिस की निगरानी में, हिरासत में अस्पतालों में बंद है। उनकी जिंदगी अचानक किसी की दया पर अटकी है। और दयानायकों के साथ आएं हुए बौंनों की भीड़ सच जानना चाहती है। सच जो मुफीद हो दयानायकों के लिए। खैर ये भी सच है कि बौंनों की इस टीम का हिस्सा मैं भी हूं। और दोनो तरफ से गालियां खाता हुआ मैं सच के करीब कभी ही पहुंच पाता हूं। अपने जमीर से भी और खबर देखने और पढ़ने वालों से भी। इस कहानी के हर पहलू में अब रामवृक्ष खलनायक है। उसके फोटो दिख रहे है। उसकी कहानियां अखबारों में छप रही है। एक के बढ़कर एक। एक अखबार ने लिखा जींस नहीं पहनने देता था और खुद जींस पहनने वाली महिलाओं से मिलता था रामवृक्ष यादव। किसी को लगा कि पुलिस बिछी हुई थी यादव के सामने। किसी ने लिखा बहुत लंबे प्लॉन के साथ वहां टिका था यादव। लेकिन सवालों का घेरा इस तरह है कि किसी को भी चोट न पहुंचे। जो मर गया सारा दोष उसी के माथे लिपट जाएं।
लेकिन सवाल है कि वो मर कैसे गया। किसने आग लगा दी उन सिलेंडरों को। किसने आग लगा दी उन टैंटों को। कैसे पसलियां टूटी मिली रामवृक्ष की। मौत पिटाई से कि जलने से। वो कौन लोकल थे जिन्होंने इतना बहादुराना काम किया कि पुलिस से आगे बढ़कर इतने बड़े हथियारबंद लोगो की पिटाई कर दी। ये बहादुर इतने दिन तक कहां छिपे हुए थे। उन लोगो की लाशों की शिनाख्त क्यों नहीं हुई। आखिरी सत्ताईस लाशों का सच क्या है। किसने मारा उनको। पुलिस के बयानों पर कितना यकीन करना चाहिए। उसी पुलिस के जिसकी टोपी समाजवादी परिवार की सेवा में लगी रहती है। रामवृक्ष का सवाल अपने आप में एक जाल है सवालों का। हर बार ऐसे सवाल उठते है लेकिन बौंनों के समर्पण के साथ ही खत्म हो जाते है। एक आईजी पुलिस तैयारी में था लेकिन तैयारी नहीं थी। एक एसपी और थानेदार मरता है। और फिर दो दर्जन से ज्यादा लोग जल मरते है। फिर पता लगना शुरू हो जाता है कि इतना हथियार था और इतना खतरनाक था। किस-किस राजनीतिज्ञ के साथ उसका रिश्ता था ये कहानी चलने लगती है। जांच सीबीआई से नहीं कराना या नही कराना राजनीति लगता है। क्या आपको लगता है कि उन लोगो ने खुद आग लगाई होगी। क्या आपको लगता है कि टैंट में आग लगाकर मरने वाले औरते और बच्चें फिदाईन थे। क्या आपको लगता है कि रामवृक्ष खुद ही जलना चाहता था। उसके परिवार को किसके क्रोध ने जला डाला। एक बाप के साथ बेटी और उसका पति और बेटा और बच्चें कैसे गायब हो गए। जैसे इंसान नहीं थे बल्कि धुआं था और पुलिस की सीटियों की हवा से गुम हो गया। कहां और कैसे जिंदा जला दिया गया इन सबको। कैसा और किसका गुस्सा खा गया इनको। 
पुलिस की जांच कभी हो नहीं सकती। पुलिस के टुकड़ों पर पलने वाले बौने सच को इतना धुंधला कर देते है कि उसके पार कुछ देखना असंभव हो जाता है। अब कोई ये नहीं बता पाएंगा कि औरतों और बच्चों से भरे हुए पार्क में इस तरह का पुलिस एक्शन गोलियों और बंदूकों के साथ होना था। एक ड्राईवर के दसहजार करोड़ के आश्रम की सत्ता संभालने के पीछे किस समाजवादी नायक का हाथ था। क्या उस का इसके साथ कोई रिश्ता था या नहीं। अब किसी भी सवाल को उठाने पर आपको गालियां मिलेगी क्योंकि लोग अपनी जाति के हिसाब से खबर का अर्थ तय कर लेते है। और पुलिस यही चाहती है। हर बार उसकी तरफ उठने वाले सवालों का रूख वो फिर से जातियों की आपसी लड़ाई की ओर मोड़ देती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। नहीं तो कम से कम 27 जिंदा लोगो को लाश में बदलने वालों को कुछ तो सबक दिये जाते। 
बहुत सारे लोगो को गालियां देने से पहले रामपुर तिराहा कांड, विक्टोरिया पार्क और रामलीला मैदान को याद करना चाहिए। इन सबके नायक पुलिस वाले ही थे।
आजकल एक समाजवादी एसएसपी की चिट्ठियों को बहुत से बौंने बहुत सुंदर मानकर शेयर कर रहे है बस इस सरकार के आने के बाद उन साहब की पोस्टिंग देख ले और फिर जरा सोचे कि कितना दम है साहब की कथनी और करनी में। एक कविता थोड़ी लंबी है लेकिन जिन्होंने इस लेख को इतना पढ़ने में वक्त खराब किया है शायद उनको चंद्रकात जी की ये कविता कुछ बता दे।
डर पैदा करो/ भयभीत लोग जब बड़ी तादाद में इकट्ठे हो जाएंगे/तो खून-खच्चर-आगजनी का फायदा मिलेगा/हर वक्त हमें लोहा लेना है अमन-चैन से /सुरक्षित मानसिकता सबसे बड़ी दुश्मन है/इसके विरुध्द पर्चियां, पैम्फलेट,गुमनाम खत,टेलीफोन/ और अफवाह फैलाने वाली कानूफूसी/सबसे कारगर हथियार है/पेट्रोल और आग घरों और इंसानों पर ही काफी नहीं/उनके सोच, सपनों और नींद तक पर हमले की /सूक्ष्म कार्यविधि पर अमल हो/ होना ये चाहिए कि लोग कुछ भी तय न कर पाएं/असमंजस,अटकलें ,अफवाह से बस्ती और बाजार ही नहीं/आदमी के भीतर का चप्पा-चप्पा गर्म रहे /असल मकसद है डर पैदा करना/फिर आग अपने करतब खुद दिखाएंगी
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साफ-साफ कह दिया गया था/कि हरकत में कुछ भी ना बचे/सिर्फ लपटों और धुएं के सिवा/चीख तक नहीं मुंह में डुच्चा दिया जाए/पत्थर हो जाएं आंखों में आंसू/होंठों पर कातर पुकार/चेहरे पर दहशत/बचाओं का चीत्कार टूटे हुए पंख की मानिन्द/लटक जाए वहीं होंठ के नीचे/ पर मिले है सबूत लापरवाही के/हिल रहे थे कटे स्तन बह रहा था दूध/पास ही फड़फड़ा रहे थे बच्चे के चीथड़ा होठ/पहला आपत्ति हरकत में पाया जाना इनका/दूसरे कोई शिनाख्त नहीं बची/ हलाक हुए मां-बच्चे की/मुश्किल हो रहा था मर्दुमशुमारी में/इनकी धर्म जाति भाषा का जान पाना/इस बाबत सख्त चेतावनी दी है ऑपरेशन प्रकोष्ठ के/सरदार क्रमांक दो ने/क्योंकि गड़बड़ा जाते है आंकडे़/किस खाते में डाला जाएं ऐसी वारदात को।

Thursday, June 9, 2016

गरीबी और गरीब इस देश का व्यापार है। गरीब दो किडनी, दो आंखे, एक लीवर और छह लीटर खून रख कर क्या करेंगे

साहब गांव के गांव कट रहे है। गरीबी के चंगुल में फंसे हुए लोग दक्षिण भारत में जाकर अपने आप को कटवा रहे है। दो ढाई लाख रूपए के लालच में वो लोग अपने आप को जिंदगी भर के लिए बेच रहे है। आवाज में दर्द था न खुशी। बडी ही सपाट बयानी के साथ वो युवा बोल रहा था। साहब गरीबों का खून पानी की तरह बिकता था आज किड़नी सेम के बीज की तरह बिक रही है। चलिए दिल्ली में ही दिखा देता हूँ भीख मांग रहे एक किडनी वालों को ......
दिल्ली पुलिस के हालियां किडनी रैकेट के छापे की कहानी के बाद ये पुरानी कहानी याद आ गई। और याद आ गए वो सब किरदार जिन को मैंने अपनी एक खबर में शामिल किया था। देश की राजधानी से लेकर आंध्र प्रदेश, तमिलनाड़ु, गुजरात, राजस्थान उत्तरप्रदेश और भी दूसरे राज्यों तक किड़नी का अवैध व्यापार चल रहा था। एक दो साल से नहीं उस वक्त भी एक दशक से। एक गांव ऐसा जिसमें एक भी परिवार ऐसा नहीं था जिसके घर से एक या दो किड़नियां नहीं बिकी थी।
एक दशक पहले की बात है। रिसेप्शन से फोन आया। एक लड़का आया हुआ है आप से मिलना चाहता है। नाम क्या है। खुशी। अजीब नाम था। मैं बाहर निकल कर रिसेपश्न पर आया। एक युवक वहां बैठा था। मैंने कहा कि बताईएं मेरा नाम ही धीरेन्द्र है। युवक ने कहा कि उसकी बात लंबी है। थोड़ा सा आपको समय देना होगा। युवक शक्ल से ही थका हुआ और भूखा दिख रहा था लिहाजा मैंने उसे कहा कि चलो बाहर चलते है। बाहर ढाबे पर बैठकर कुछ खाते हुए मैंने पूछा कि ये आपाक नाम बड़ा अजीब है। तो उसने कहा कि साहब नाम तो यही रख दिया गया है कागजों में। मैंने आगे पूछा कि क्या बात है बताओं। खुशी ने अपनी शर्ट ऊपर उठा दी। अजीब सी बात थी। ये क्या कर रहे हो। खुशी ने कहा कि सर शरीर में कोख के हिस्से पर देखिए। एक लंबा सा चीरा दिख रहा था। जो टांकों के निशान से भरा हुआ था। ये क्या है। साहब किडनी बेच दी हुुई है। दी हुई है मतलब। परिवार को दी हुई है। नहीं साहब बेच दी है। बेच दी है कितने में  बात तो दो लाख रूपए की हुई थी लेकिन पहले 70 हजार रूपए देने के बाद बाकि पैसा नहीें दिया गया। क्या आप ये खबर करेंगे। तुम को क्या मिलेगा। साहब मुझे तो अब पैसे की उम्मीद नहीं है। लेकिन बाकि सब गरीबों की जिनकी किडनी दी जा रही है शायद इसके बाद उनके पूरे पैसे मिल जाएं। लेकिन हम करेंगे कैसे। बहुत आसान है साहब। मुझे उसकी बात पर शक हो रहा था। क्योंकि आसानी से कैसे शूट हो सकता है। लेकिन उसने कहा कि साहब वहां तो आपकों झुंड़ के झुंड़ मिल जाएंगे आप चलिए तो। मैंने उसकी बात पर यकीन करने से पहले कहा कि इस पर तो कानून बना हुआ है एक कमेटी है वो चैक करती है। खुशी ने कहा कि साहब आप चलिये तो चैन्नई आपको सब कुछ अपनी आंखों से दिख जाएंगा। मैं फिर भी मुतमईन नहीं हुआ तब उसने एक कागज दिखाया और मुझे उसकी बात में मद लगा। कागज में मोहम्मद खुशी ने एक हिंदु आदमी के तौर पर अपनी किड़नी बेची थी, एक एक मुस्लिम लड़के ने हिंदु व्यापारी के रिश्तेदार के तौर पर अपनी किडनी दान दी थी कागजों के मुताबिक। खबर काफी हैरान करने वाली थी। लेकिन हिंदी टीवी चैनलों की टीआरपी गणित में फिट नहीं बैठ रही थी। क्योंकि इसका सिरा दक्षिण भारत तक जा रहा था। .ये ही सवाल था ब्यूरो चीफ का। कोई दुर्भावना नहीं बस टीआरपी और टीवी का ख्याल। आप खुद ही बात कर लो न्यूज डायरेक्टर से। मैंने खुद जाकर न्यूज डायरेक्टर सर से बात की। उनको विश्वास दिलाया कि ये एक पब्लिक इंट्रेस्ट की खबर है। खैर जाने की अनुमति मिल गई। खुशी और अपने साथी कृपाल सिंह के साथ निकल पड़े चैन्नई में खबर कवर करने। एक किड़नी ट्रांसप्लांट के रोगी की फाईल का इंतजाम किया। इंदौर से जीतू दा ने एक पेशेंट की फाईल भेज दी। चैन्नई के होटल में रूकने के वक्त लगा कि शायद काफी मेहनत का काम ले लिया हाथ में। अपनी भाषा समझने वाला एक भी नहीं। पहले दिन सिर्फ खुशी से पूरे मामले को लेकर फिर से माथापच्ची की। और प्लॉन तैयार करने की कोशिश की। लेकिन खुशी का कहना था कि साहब किसी प्ला़न की जरूरत नहीं आप चलो तो। और फिर चैन्नई के नामचीन हॉस्पीटल्स का दौरा शुरू हुआ। मैंने कई हॉस्पीटल्स में जाकर चैक किया। और लगा कि ये क्या हो रहा है। दिमाग एक दम से सुन्न हो चुका था। कोई कानून नहीं दिख रहा था। शेरू। अहमदाबाद का रहने वाला दलाल। स्वर्णा भवन में आकर मिला। फिर गिरीश दलाल। फिर हनीफ, सलीम, दीपक और भी जाने कितने नाम जो आकर अपने रेट बता रहे थे। हर किसी ने कहा साहब बीस लाख रूपए में ऑपरेशन का ठेका। मेडीकल से लेकर लीगल तक सब का हिसाब-किताब उनका। शेरू के साथ रेस्टोंरेंट में पांच किडनी देने वालों से मिला जिनकी किडऩी निकल चुकी थी और वो अस्पताल से उसी दिन निकल कर अपने गांव जा रहे थे। पैसा मिलने की खुशी उनके चेहरे पर दिख रही थी। हालांकि किसी को भी पैसा पूरा नहीं मिला था लेकििन जो भी अभी मिल रहा था उनके लिए काफी ज्यादा था। शेरू ने बताया उसके बीस से ज्यादा ऑपरेशन उस वक्त चैन्नई के अलग-अलग हॉस्पीटल में चल रहे है। और वो उन डोनर को इसलिए लाया था ताकि मुझे विश्वास दिलाया जा सके कि उसके पास बहुत तादाद में डोनर है। गुजरात के अलग-अलग गांवों से लाएं गए हुए इन डोनर्स को देखकर कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अपने परिवार वालों के लिए या खुद के लिए ये किडऩी बेच रहे है। फिर मुलाकात हुई गिरीश के आदमी से। गिरीश अहमदाबाद का रहने वाला एक बहुत बड़ा दलाल था। इतना बड़ा कि दलालों के बीच एक महानायक। नाडियाद इलाके का रहने वाला। नाडियाद गुजरात का वही जिला है जहां सबसे पहले देश में किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर किडनी खरीद कर लगाने का भांड़ा-फोड़ हुआ था। गिरीश के आदमी ने कहा साहब आप बताएँ कब ऑपरेशन कराना है उसी से पहले टेस्ट के लिए आपको आदमी मिल जाएंगा। फिर दीपक सिंह नाम का एक लड़का आया जिसने बताया किस तरह से वो पिछले चाल साल से इस इलाके में ये ही नेट वर्क चला रहा है। यहां तक कि चैन्नई के कई इलाकों में नार्थ इंडिया से आने वाले लोग किराए के मकानों में रह रहे है जिसमें डोनर भी उनके परिवार के आदमी के तौर पर रह रहा है। ये तो साफ दिख रहा था कि यहां डोनर के नाम पर गरीब आदमी अपनी किडनी बेचने में जुटा है।
अब हमने सोचा कि किडऩेी के लिए कमेटी को देखे। वहां जाकर देखा कि दीवारों पर इतने नियम कायदे थे कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहां कोई गलत काम करने की हिम्मत भी कर सकता है या सफल भी हो सकता है। लेकिन फिर वहां बैठे हुए दलालों ने बताना शुरू किया कि लाईन में  लगे हुए कई आदमी उनके अपने है। और जिस आदमी के साथ रिश्तेदार बन कर बैठे है उनका कोई लेना देना नहीं है। हाईकोर्ट के सामने एक वकील का नाम दिया गया जहां से अफिडेविट मिलते है। उसके बाद फिर थामस हॉस्पीटल में बैठे हुए एक वकील त्रिमूल से मिलना था। त्रिमूल ही वो शख्स था जो हमको डॉक्टर पलनी एस रविचंद्रन तक ले जाता। त्रिमूल की जिम्मेदारी थी कि वो हर आदमी से पूरे तौर पर मोलभाव कर ये भी चैक कर ले कि आदमी जेन्यूईन केस भी है या फिर कोई गडबडझाला है। आखिर में पलनी एस रविचन्द्रन से मुलाकात हुई। फाईल पर एक नजर डालने के बाद उस डॉक्टर ने कहा कि ठीक है सब काम हो जाएंगा त्रिमूल से बात कर ले। इसी दौरान विदेशी लोगो को भी इन हॉस्पीटल में मंडराते हुए देखा। और जब ये स्टिंग्स किया जा रहा था उस वक्त तक इन हॉस्पीटल में एक दो रेड हो चुकी थी लिहाजा ये इतने बड़े पैमाने पर हो रहा काम भी सतर्कता में चल रहा था। इतना बड़ा काम इतने खुले तौर पर सर्तकता से हो रहा है तो सिर्फ ये अंदाज ही लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर ये चल रहा था एक दो साल पहले तक। खैर बात ये ही है कि हम यो स्टिंग्स करके लौट आएं। स्टिंग्स के दो पैकेज चलाएं भी गए। फिर बात आई गई हो गई। खुशी भी ये जान गया कि हम क्या कर सकते है और कितना कर सकते है। वापस चुरू लौट गया। शेरू और हनीफ उसके बाद फोन करके ये बताने लगे कि सर हम इस धंधें को बंद करने में मदद कर सकते है। लेकिन मैं उस तरफ से हट चुका था। बाद में चैन्नई के इसी डॉक्टर को मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया तब पता चला कि ये आदमी 1500 करो़ड़ रूपए के नेटवर्क का किंगपिन था। लेकिन ये सिर्फ एक चेहरा था। जमानत हुई और ये काम शुरू हो गया देश के अलग-अलग हिस्सों में और भी जोर शोर से शुरू हुआ। दिल्ली के हॉस्पीटल हो या फिर देश के बाकि हिस्सों के सब को मालूम है कि कहां से किडऩी हासिल हो सकती है। किस तरह गरीब लोगो इस देश के लिए एक ब़ड़ी नियामत बन चुके है।
क्योंकि दलाल की निगाह में इस गरीब आदमी के पास दो किड़नी, चार से छह लीटर खून एक लीवर और दो आंखें है। इतना कीमती सामान रखे हुए ये गरीब आदमी अगर दलालों की निगाह में काफी अमीर है। दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ड्रग्स ट्रायल या गैरकानूनी तौर पर होते है। सैकड़ों लोग एक ही शहर में मर गए लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। खबर सिर्फ इस लिए बन गई कि ये देश की राजधानी दिल्ली में एक बड़े हॉस्पीटल से जुड़ा हुआ मामला है और जानकार लोगो की नजर में ये मामला उनके लिए नया नहीं बल्कि इस हॉस्पीटल पर हाथ डाल देना नया है। लेकिन अपना मानना है कि ये केस भी  जल्दी ही हवा हो जाएंगा। और फिर हॉस्पीटल हो या डॉक्टर अपने काम पर लग जाएंगे। 

Saturday, June 4, 2016

अमृतलाल किरार उर्फ डाकू अमृतलाल उर्फ चंबल की लोमड़ी।

अमृतलाल किरार
चंबल के बीहड़ों में डकैतों के किस्सों का सिलसिला बहुत लंबा है। एक से बढ़कर एक दुस्साहसी, एक से बढ़कर एक खूंखार एक से बढ़कर एक निशानेबाज। लेकिन चंबल के बीहड़ों के बीहड़ों में डाकुओं के किस्सों में एक डाकू ऐसा भी है जिसे पुलिस फाईलों में एक लोमड़ी कहा गया। इतना तेज तर्रार कि फरारी में भी आराम से शहरों में घूमता रहे, शक्की इतना कि अपनी परछाई से भी परहेज करे और दुस्साहसी इतना कि डीएम के घर को ही लूट ले,... पुलिस फाईलों में दर्ज चंबल का सबसे शातिर डकैत जिसने अपने दिमाग के दम पर एक दो साल नहीं लगभग चौथाई सदी तक चंबल में आतंक मचाएं रखा उस डाकू का नाम है अमृतलाल। बाबू दिल्ली वाला या अमरूतलाल।
बीहड़ों में खाकी का खौंफ हर किसी बागी या डकैत को होता है। मुठभेड़ हो तो भी डाकू पुलिस से बच निकलने की कोशिश करते है लेकिन अमृतलाल एक ऐसा डकैत जिसको पुलिस का कोई खौंफ नहीं था। वो आम लोगो को नहीं राजाओं को भी लूट लेता था।  घरों को ही नहीं गढ़ियों को लूट लेता था और इतने पर भी बस नहीं तो सुन लीजिए वो पुलिस के थाने भी लूट लेता था। और ये कहानी भी  उसके साथ ही जुड़ती है कि कोई जेल या थाना अमृतलाल को रोक नहीं पाती थी। और चंबल में पकड़ यानि अपरहण को डाकुओं की कमाई का जरिया बनाने की शुरूआत भी अमृतलाल से ही मानी जाती है।  

पुलिस के थाने लूटने वाला डाकू। लेकिन चंबल के डाकुओं के मिजाज से एक दम अलग। किसी भी लूट के लिए मिलिट्री की तरह से तैयारी और फिर लूट के बाद अय्याशी का एक खुला खेल। चंबल के डाकुओं में शायद अमृतलाल अकेला डकैत था जिसकी अय्य़ाशी भी सुर्खियों में थी और मौत भी उसको अय्याशी के चलते ही मिली। 
अमृतलाल के सैकड़ों किस्सें आज भी चंबल की फिजाओं में गूंजते है लेकिन एक किस्सा ऐसा है जिसका रिश्ता सीधे बॉलीवुड से जा जुड़ता है. कहते है कि एक बार  सिनेतारिका मीनाकुमारी और कमाल अमरोही भी अमृतलाल के गैंग के हत्थे चढ़ गए थे। और रात गुजरने के बाद ही उसने दोनों को बाईज्जत शिवपुरी के जंगलों से छोड़ दिया था 
 
चंबल की पुलिस फाईलों में दर्ज एक ऐसे डाकू अमृतलाल ने कैसे हासिल की चंबल की बादशाहत और कैसे पुलिस अधिकारियों ने माना उसके शातिर दिमाग का लोहा देखिए इस बार शिवपुरी। मध्यप्रदेश के बीहड़ों में एक जंगलों से घिरा एक और शहर। इसी शहर के पौहरी थाने का एक गांव गणेशखेड़ा। घने जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से घिरा हुए इस गांव तक पहुंचना आज भी आसान काम नहीं है। ... 
इस छोटे से गांव का ये घर किसी की भी निगाह अपनी और खींच लेता है। और इसी घर में 1916 में अमृतलाल का जन्म एक किसान भगवान लाल के घर हुआ था। कभी ये गांव अमृतलाल के बाबा ने ही बसाया था और गांव में ज्यादातर घर उन्हीं के परिवार के है।  
बचपन में अमृतलाल को पढ़ने के लिए गांव के स्कूल भेजा गया। और फिर गांव के स्कूल से वो पौहरी के स्कूल पढ़ने गया। अमृतलाल का दिमाग तो तेज था लेकिन वो पढ़ाई के रास्ते में नहीं था। उसका मन खुरापातों में लगा रहता था। घर वालों ने बहुत मान-मनौवल कर उसे स्कूल भेजा लेकिन उसका मन स्कूल में नहीं लगा। स्कूल और गांव के बीच के रास्ते में एक दुकान अमृतलाल की निगाह में चढ़ गई। और फिर एक दिन रात में अमृतलाल ने एक कदम तो दुकान के अंदर रखा और दूसरा कदम अपराध की दुनिया में। पुरिस रिकॉर्ड में ये अपराध क्राईम नंबर 62/39 के तौर पर दर्ज हो गया।
परिवार का कहना है कि इस चोरी में अमृतलाल के साथ पढ़ने वाले बड़े परिवार के लड़के भी थे लेकिन जब पुलिस कार्रवाई की बात हुई तो सिर्फ अमृतलाल को आगे कर दिया। इस बात ने अमृतलाल का दिमाग उलट दिया। अमृतलाल गिरफ्तार हो गया। लेकिन पौहरी थाने के लॉकअप में बंद अमृतलाल ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया कि पुलिस ही चौंक उठी।  लॉकअप में बैठे अमृतलाल ने एक पुलिस सिपाही को काबू किया औ 26 जून 1939 को हिरासत से निकल भागा और साथ में थाने से दो मजल लोडेड राईफल और कारतूस लूट कर ले गया। थाने में ये अपराध भी 68 नंबर की जगह पा गया।
अमृतलाल ने थाने से निकलने के साथ ही अपराध की दुनिया में पूरे तौर पर एंट्री ले ली। 1939 में अमृतलाल ने थाने से भाग कर सबसे पहले उत्तरप्रदेश के बीहड़ों में अपनी आमद दर्ज कराई। दो साल तक अमृतलाल चंबल के बीहड़ों में एक दम से गुम हो गया था। 1941 में अमृतलाल ईटावा के जसवंतनगर के डकैत गोपी ब्राह्मण के गैंग में शामिल हुआ। गैंग में उसने सिर्फ गोपी को ही अपनी असलियत बताई बाकि सब उसके बारे में कुछ नहीं जानते थे। गैंग में आते ही उसने लूट और डकैती के लिए योजना बनाने का जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया। 
एक के बाद एक वारदात करनी शुरू कर दी। हर किसी वारदात के बाद अमृतलाल कुछ दिन के लिए गायब हो जाता था। बीहड़ों से निकल कर वो किसी भी शहर में पहुंच जाता था। बस और ट्रेन के सहारे दूर दूर के शहरों में लंबा वक्त बिता कर वापस चंबल में पंहुच जाता था। अपने इन्हीं कारनामों की वजह से अमृतलाल का नाम पुलिस फाईलों में बाबू दिल्लीवाला के तौर पर मुखबिरों ने दर्ज कराया। क्योंकि  न तो पुलिस जानती थी कि पैंट बुशर्ट पहनने वाला कौन सा नया डकैत चंबल के बीहड़ों में पैदा हो गया और न ही बीहडों के बाशिंदें जानते थे कि चंबल का ये डकैत शहरों में कहां गायब हो जाता है।  ये चंबल में अमृतलाल की आमद थी। एक ऐसी आमद जिसकी आवाजाही अगले पच्चीस सालों तक चंबल में गूंजनी थी। 
उत्तरप्रदेश के बीहड़ों में अमृतलाल ने अपनी कारीगरी दिखानी शुरू कर दी। एक के बाद एक लूट और डकैती करने लगा। लेकिन शायद चंबल में उस वक्त किसी को अमृतलाल का नाम याद नहीं था। लेकिन एक दिन अमृतलाल ने अपने गैंग के साथ ऐसा काम कर दिखाया कि पुलिस महकमें के पैरों तले की जमीन खिसक गई। अमृतलाल ने इटावा के डीएम एस के भाटिया आईसीएस के घर की लूट कर डाली। 
इसके बाद अमृतलाल ने कानपुर में एक मिल्स से हथियार लूट लिए। अब गैंग के पास काफी हथियार हो गये थे। 1942 में ईटावा के जसवंतनगर में दो बडी डकैतियां डाली। 1943 में अमृतलाल अपने सरदार के साथ ग्वालियर में एक बड़ी डकैती डालने पहुंचा लेकिन मुठभेड़ में गोपी गिरफ्तार हो गया। गोपी की गिरफ्तारी के साथ ही गैंग की कमान अमृतलाल ने संभाल ली।  अमृतलाल ने गैंग की कमान संभालते ही ताबड़तोड़ डकैतियां डाली और कत्ल किए। हर मौका ए वारदात पर अमृतलाल अपने गैंग के साथ मौजूद रहा। 
1944 में यूपी पुलिस ने अमृतलाल को पकड़ने के लिए कमर कस ली। उसके गैंग के लोगो की निशानदेही की जाने लगी। लेकिन इससे बेपरवाह अमृतलाल ने कई डकैतियां डाली और फिर छिपने के लिए वापस शिवपुरी के जंगलों की पनाह ली। जंगलों में रहते रहते अमृतलाल ने शिवपुरी पर अपनी निगाह गड़ाई और एक के बाद एक लूट और डकैतियां इलाके में डालने लगा। धीरे -धीरे अमृतलाल के गैंग का नाम, उत्तरप्रदेश के ईटावा, मैनपुरी, मध्यप्रदेश में शिवपुरी, गुना, मुरैना और ग्वालियर तो राजस्थान में सवाईमाधोपुर की पुलिस फाईलों में दर्ज होने लगा।
 
पुलिस अमृतलाल के पीछे थी और बेपरवाह अमृतलाल शहरों में आराम से घूमता था। इसी बीच 1946 में आगरा शहर में अमृतलाल अवैध असलहे के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पहचान होने पर अमृतलाल पर डकैती के मुकदमों की झड़ी लग गई और 18 साल की कड़ी सजा सुनाई गई। अमृतलाल पर अलग अलग शहरों में डकैतियों के चार्ज थे लिहाजा पुलिस उसको लेकर अलग-अलग शहर जाती थी। ऐसी ही एक पेशी शिवपुरी में भी हुई। और फिर कोलारस के थाने की हिरासत से अमृतलाल भागने में कामयाब हो गया।  इस बार भी अमृतलाल अकेला नहीं गया। अपने गैंग के दो डाकुओं माता प्रसाद और साधुराम को तो साथ ले गया उसके साथ-साथ तीन दूसरे कैदियों को भी साथ लेकर निकल भागा। 
दो साल तक अमृतलाल ने फिर पूरे इलाके में ताबड़तोड़ वारदात की। और एक दिन ग्वालियर शहर की पुलिस के हत्थे च़ढ़ गया। अवैध हथियारों के साथ गिरफ्तार अमृतलाल को सजा काटने के लिए जेल भेज दिया गया। लेकिन अमृतलाल ने तो जैसे जेल की दीवारों को खिलौना मान रखा था। 1949 में एक दिन अमृतलाल यहां से भी हैरतअंगेज तरीके से फरार हो गया। 
ग्वालियर से फरार होने के बाद अमृतलाल एक दम से बदल गया। गैंग ने बेगुनाह लोगो को मारना और जिंदा जलाना भी शुरू कर दिया। 1950 में मैनपुरी जिले के एक गांव में पांच लोगों को डकैती के दौरान जिंदा जला दिया। एक के बाद एक डकैती। चंबल के बीहड़ों के बाहर अमृतलाल का नाम दहशत का नाम बन रहा था लेकिन चंबल के बीहड़ों के अंदर अमृतलाल का नाम एक दूसरी वजह से बिगड़ रहा था। अमृतलाल की अय्याशियां उसके गैंग के लोगो की निगाह में भी चढ़ने लगी थी।
चंबल के डकैतों ने अपने कुछ उसूल बनाएं हुए थे जिनको वो आसानी से या फिर लोगो की नजरों के सामने कभी तोड़ना नहीं चाहते थे। और सबसे पहला उसूल था कि गैंग के सदस्यों के परिवार पर कोई बुरी नजर नहीं रखेगा। लेकिन अमृतलाल की अय्याशियों ने सारे बीहड़ के सारे उसूलों को धता बता दी। अपने ही गैंग के जेल गए हुए सदस्यों के परिवार की महिलाओं के साथ अमृतलाल अवैध रिश्ते बनाने लगा। 
इसके साथ साथ जिन लोगो ने भी अमृतलाल की हथियार खरीदने या छिपने में मदद की उनके परिवार की औरतों की ईज्जत के साथ भी अमृतलाल हथियारों के दम पर खेलने लगा था। इसी बीच एक डकैती के दौरान अमृतलाल को गोली लग गई। लेकिन अमृतलाल को गोली से भी ज्यादा चोट इस बात से लगी कि ये गोली उसी के गैंग मेंबर जयश्रीरमान ने उसको निशाना बना कर चलाई थी। गैंग में दरार पड़ चुकी थी। जय के साथ गैंग के कई लोग हो गये थे जो अमृतलाल की अय्याशियों से नाराज थे। अमृतलाल अपने समर्थकों को साथ लेकर वहां से निकला और इसी के साथ उसने फिर कभी किसी यूपी के आदमी को अपने गैंग में न रखने की कसम खाई। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक अमृतलाल ने इसके बाद यूपी के इलाकों में कभी कोई वारदात नहीं की और पूरी तरह से अपना ऑपरेशन मध्यप्रदेश और राजस्थान को को ही बना लिया।
अमृतलाल की अय्याशियां पूरे चंबल में सुर्खियां बटोर रही थी। दारू और औरत अमृतलाल की कमजोरी कही जाने लगी। लेकिन अमृतलाल अपने दिमाग की मदद से फिर से बड़ा गैंग खड़ा करने में कामयाब हो चुका था। फिर से चंबल के इलाकों में अमृतलाल का सिक्का चल रहा था। डकैतियों में होने वाली फायरिंग और पुलिस मुठभेड़ से बचने का रास्ता निकाल चुका अमृतलाल अब पकड़ का मास्टर बन चुका था। कही से भी कही भी अमृतलाल आ सकता था और पकड़ को दिन दहाड़े ले जा सकता था। और पकड़ को इस तरह से रखता था कि पुलिस चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी।
शिवपुरी, गुना, मुरैना और ग्वालियर के जाने कितने गांवों में अमृतलाल ने लूट और डकैतियां डाली। लेकिन पकड़ करने के बाद उसने इसी को अपना मुख्य औजार बना लिया। एक दो के बजाया कई बार तो वो आदमियों को झुंड के तौर पर जंगल में ले जाकर बंधक बना लेता था और जबतक एक मोटी रकम हासिल नहीं होती थी वो किसी को नहीं छोड़ता था। एक ऐसी ही वारदात में शिवपुरी शहर के एक प्रसिद्ध मंदिर में पूजा करने गए चालीस लोगो में से 26 लोगो का अपहरण करके वो पालपुर के जंगलों में दाखिल हो गया। एक दो दस दिन नहीं  बल्कि महीनों तक पुलिस उनको छुड़ाने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाती रही लेकिन अमृतलाल के शिकंजे से किसी भी पकड़ को बिना फिरौती रिहा नहीं करा पाई। पकड़ रिहा हुई और शिवपुरी पहुंची तो पुलिस के होश ठिकाने नहीं रहे जब किसी भी पकड़ ने अपने अपहरण से ही इंकार कर दिया। 

अमृतलाल का नाम शिवपुरी के जंगलों में एक खौंफ बन चुका था। पुलिस के हाथ पैर बंधे हुए थे। दुसस्साहसी अमृतलाल हर बार पहले  से अलग कारनाम कर पुलिस को चौंका दिया करता था। शहर के सेठ को लूटने से पहले सेठ जी के पैर छूं कर आशीर्वाद लेने की बात हो या फिर उमरी के राजा की गढ़ी लूटने का कारनामा। हर बार अमृतलाल के किस्से लोगो की जुबां पर चढ़ जाते थे। 
अमृतलाल मध्यप्रदेश की उमरी रियासत के राजा अपनी गढ़ी में ( मंत्री शिवप्रसाद सिंह के पिता अगर शिवप्रसाद सिंह का फोटो नीरज मध्यप्रदेश से मिल जाएं तो उसको लिख कर फोटो लगा सकते है ) बैठे तेंदुपत्ते का हिसाब किताब कर रहे थे। कि एक मारवा़डी सेठ अपने कारिदों के साथ आया। राजा साहब के करीब पहुंचा तो राजा साहब ने पूछा बोलो। मारवाड़ी सेठ ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और जब सिर ऊपर किया तो राजा साहब के होश फाख्ता हो गए। पगड़ी उतार कर हाथ में रिवाल्वर लिए खड़ा शख्स और कोई नहीं अमृतलाल था। । छाती पर बंदूक रख कर पूरी गढ़ी से माल मत्ता और हथियार बंधवाकर अमृतलाल गढ़ी के दो नौकरों के सिर पर सामान रखवा कर फरार हो गया।  

अमृतलाल का हौंसला आसमान पर था और पुलिस को कुछ सूझ नहीं रहा थ। इसी बीच एक दिन अमृतलाल जा धमका राजस्थान के बारा जिले में। वहां के एक थाने कस्बां में दिनदहाड़े जा धमके अमृतलाल ने थाने के हथियार और गोलियों लूटी और आराम से चलता बना।  1954 में एक और थाने बैराड़ जा पहुंचा लेकिन पुलिस समय से चेत गई और अमृतलाल गैंग को भारी गोली बारी का सामना करना पड़ा। अमृतलाल थाने को लूटे बिना ही वापस हो गया। लेकिन इन घटनाओं ने पूरे चंबल में अमृतलाल को और भी कुख्यात कर दिया। अमृतलाल गैंग नंबर तीन बन चुका था। पुलिस चार्ट में पहले नंबर में रूपा पंडित यानि मानसिंह के बाद उसके गैंग का मुखिया दूसरे पर लाखन तो तीसरे पर  जी 3 के नाम पर अमृतलाल का नाम दर्ज हो चुका था। पुलिस शिवपुरी के जंगलों में माथा पकड़ रही थी लेकिन अमृतलाल अपनी अय्याशियों में आराम से मशगूल था। हर गांव में अपने लिए एक औरत का इंतजाम करने वाले अमृतलाल की रात अय्याशियों में ही कटती थी।  पुलिस रिकार्ड में दर्ज दर्जनों औरतों के नाम और पते आज भी अमृतलाल की अय्याशियों का पता देते है। ये रिकॉर्ड़ उन महिलाओं के नाम पर रखा गया जिनके गहरे रिश्ते अमृतलाल के साथ थे। 
अमृतलाल की तलाश में पुलिस जमीन-आसमान एक किए हुए थी। पौहरी थाने में नए इंचार्ज लाए गए। लेकिन अमृतलाल की अपराध कथा में पन्ने जुड़ते जा रहे थे। मध्यप्रदेश 1956 में नया राज्य बना था तो पुलिस ने चंबल को डकैतों से मुक्त करने के नाम पर एक बड़ा अभियान शुरू किया। शिवपुरी और गुना के जंगलों का खार बन चुके अमृतलाल पुलिस के पहले निशानों में से था। लेकिन बेपरवाह अमृतलाल ने मुरैना जिले में पाली घाट के पास शादी के लिए जा रही एक पूरी बारात को ही लूट लिया और चालीस हजार रूपए की रकम हासिल की। बारात से एक आदमी का अपहरण कर उसको जंगल में अपने साथ ले गया बाद में 60,000 की रकम हासिल करने के बाद ही उसको छोड़ा। पुलिस की नाक दम बन चुके अमृतलाल अपने 25 आदमियों के गैंग के साथ धामर में एक बडे़ ठाकुर के घर डकैती डाली और लाखों रूपए के साथ हथियार भी लूट कर ले गया। लूट के साथ ही दो लोगो को भी पकड़ के तौर पर अपने साथ ले गया। 
इसके बाद उसने राजमार्गों पर ही गाड़ियां रोक कर पकड़ बनाना शुरू कर दिया। ग्वालियर के राष्ट्रीय राजमार्ग से दिन दहाड़े दो बड़े व्यापारियों का अपहरण किया और उनसे फिरौती वसूल कर ली। सुर्खियों में बढ़ते जा रहे अमृतलाल ने एक नया धंधा और शुरू कर दिया था. और वो था इलाके ठेकेदारों से चौथ वसूली का। शिवपुरी और गुना के जंगलों में तेंदुपत्ता का हर ठेकेदार उसको वसूली दिया करता था। कोई भी ठेकेदार बिना अमृतलाल को चौथ दिए अपना काम नहीं कर सकता था। 
अमृतलाल के पास इतना पैसा हो गया था कि वो इसको ब्याज पर देने का काम भी करने लगा। इलाके के बडे सेठ उससे  ब्याज पर पैसा लेने लगे। चंबल में एक किस्सा ये भी है कि चंबल के सबसे बड़े कातिल माने जाने वाले लाखन सिंह को भी उसने पचास हजार रूपया उधार दिया था। अमृतलाल ने पैसे के दम पर इलाके में पुलिस से बड़ा मुखबिर तंत्र खड़ा कर लिया था। और उन पर अमृतलाल पानी की तरह से पैसा बहाता था। पूर्व पुलिस प्रमुख के एफ रूस्तमजी ने इस बारे में लिखा कि पचास के दशक के शुरूआत में एक नाई के हेयरकट से खुश होकर अमृतलाल ने उसको 100 रूपए का नोट ईनाम में दिया था। इतना ही नहीं एक मुखबिर ने दस मील साईकिल पर आकर पुलिस के बारे में खबर दी तो अमृतलाल ने उसको 1000 रूपया दिया। 
लेकिन उसकी अय्याशियां उसके खिलाफ जा रही थी। वो अब अपने ही इलाके लोगो को अपना दुश्मन मानने लगा था। औरतों को लेकर उसके लफड़े फैलने लगे थे। अपनी अय्याशियों और शराब की लत ने उसकी समझदारी को हवा कर दिया था. ऐसी ही एक वारदात में वो अपने ही रिश्तेदारों के गांव में जा चढ़ा।
गांव में कई लोगो को मौत के घाट उतारने वाले अमृतलाल को अपने दुश्मन का कुलनाश करना एक खेल लगता था। दुश्मनों का नामों-निशान मिटा देना। और इसी सनक में वो पुलिस थाने को ही उडाऩे चल दिया। 
शिवपुरी पुलिस अधीक्षक चुन्नीलाल ने अमृतलाल को पकड़ने की जोरदार कोशिश शुरू की। इसके लिए इलाके को अच्छे से समझने वाले लहरी सिंह को पौहरी थाने का इंचार्ज बनाया गया। लहरी सिंह ने अमृतलाल के परिजनों पर शिकंजा कसा। लहरी सिंह ने कसम खाई कि वो अमृतलाल को जिंदा पकड़ कर उसको पांच जूते सरेआम लगाएंगे। 
अमृतलाल को ये बात पता चल चुकी थी। उसने भी बदला लेने की ठान ली। लहरी सिंह और अमृतलाल एक दूसरे को मात देने के लिए चाल चलने लगे। लहरी सिंह की धार्मिक आस्था को इस्तेमाल कर उनको मौत के घाट उतारने के लिए अमृतलाल ने कई बार पांसे फेंके।
तो लहरी सिंह भी रोज अमृतलाल के गांव में जाकर उसके परिजनों का सरेआम बेईज्जत करने लगे। अमृतलाल अपनी मां को बहुत मानता था। एक दिन पुलिस अधीक्षक चुन्नीलाल और लहरी सिंह ने अमृतलाल की मां के साथ गेस्टहाउस में थोड़़ी सी सख्ती बरती तो ये खबर अमृतलाल को बर्दाश्त नहीं हुई। अमृतलाल को गुस्से में ये भी ख्याल नहीं रहा कि पुलिस से सीधे शहर में जाकर टकराना मौत से टकराने जैसा है। उसको धुन सवार हो गई कि चुन्नीलाल और लहरी सिंह को ठिकाने लगाना है। और तभी उसको पता चला कि चुन्नीलाल कोलारस थाने पर निरीक्षण करने जाने वाले है। बस इतनी खबर अमृतलाल के लिए बहुत थी और फिर वो जा धमका कोलारस थाना। 
पुलिस थाने में घुसे अमृतलाल ने एक दीवान और सिपाही का कत्ल कर दिया। थाना लूट लिया और बंदूकों को उठा कर चलता बना। लेकिन चुन्नीलाल और लहरीसिंह किस्मत के चलते बच गए। क्योंकि कुछ देर पहले ही वो पुलिस लाईँस जा चुके थे। 
इस घटना ने पूरे प्रदेश में बवाल खड़़ा कर दिया। एक डकैत दिन दहाडे थाना लूट रहा है और सीधे एसपी को मारने के लिए शहर में जा धमकता है। प्रदेश सरकार ने अपना ऑपरेशन कड़ा करने के लिए कहा। लेकिन अमृतलाल तो इस वारदात के बाद बीहड़ों के पत्थरों में गुम हो चुका था। पुलिस के पास न कोई मुखबिर था और न ही कोई पता । आखिर पत्थरों में खोजे तो किसको। लेकिन तभी लहरी सिंह और पुलिस को एक पत्थर में पारस दिखा। एक ऐसा पारस जो किसी लोहे को सोना नहीं बनाता बल्कि एक हैवान बने इंसान से इलाके को छुटकारा दिला सकता है। 
लहरी सिंह का रात दिन सिर्फ अमृतलाल की या फिर उसकी खबर की खोज में ही कट रहा था। हर तरफ मुखबिर लगे हुए थे। लेकिन कही से ऐसी खबर नहीं आ रही थी जो पुलिस को अमृतलाल तक पहुंचा सके। लहरी सिंह अमृतलाल की किलेबंदी में दरार खोज रहे थे कि उनको पता चला कि एक बद्री किरार नाम का लड़का है। ( बद्री किरार का फोटो फीड में है जहां अमृतलाल किरार की लाश के पास बैठा है)  जिसका जीजा कभी अमृतलाल के गैंग में रहा है। और कुछ कहानी का सिरा भी लहरी सिंह को पता चला।  बीस हजार का ईनामी डाकू जिंदा या मुर्दा किसतरह  से कानून के हाथ आ सकता है ये योजना लहरी सिंह के दिमाग में उतर गई।
बद्री किरार की बहन पर अमृतलाल की बुरी नजर थी। बद्री का रथी किरार भी अमृतलाल गैंग का एक्टिव मैंबर था और उसकी मौत हो गई थी। अमृतलाल की नजर उसकी पत्नी नारायणी पर थी। उसको हासिल करने के लिए वो बद्री पर दबाव बनाए हुए था। लाचार बद्री परिवार बचाने के लिए उसके सामने झुकने को तैयार था कि लहरी सिंह उसतक पहुंच  गए।
बद्री किरार के बारे में कई कहानियां पुलिस की फाईलो में दर्ज है। लेकिन उस वक्त के इंचार्ज लहरी सिंह बता रहे है कि किस तरह से उसको ट्रैनिंग दी गई और कैसे उसको कोड़ भी बताया गया। उसके साथ तिवारी जी कोलारस के इंचार्ज थे वो भी  पुलिस के इस सबसे अहम ऑपरेशन को करीब से देख रहे थे।
बद्री को गैंग में एक मैंबर के तौर पर भेजा गया। उस वक्त तक अमृतलाल शराब और अपनी अय्याशियों के चलते गैंग में ही काफी बदनाम हो चुका था। और उसके बुरे दिन शुरू हो चुके थे। लगभग दो दशक से पुलिस की निगाहों से दूर और हर मुठभेड़ में साफ बच निकलने वाले अमृतलाल को लगने लगा था कि पुलिस की गोली और उसके सीने के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है। शक्की मिजाज अमृतलाल बेरहम भी हो उठा। युद्दानगर और नवलपुरा की दो मुठभेड़ों में उसको बेहद नुकसान उठाना पड़ा। उसको अपने ही गैंग मेंबर दौलतरसिंह के भाई मंगलसिंह पर संदेह हुआ। मंगलसिंह को गैंग से निकाल दिया गया था। गुस्से से भरे अमृतलाल ने अपने वफादार दौलत सिंह को तड़पा तड़पा कर कत्ल किया। कत्ल के दिन गैंग में फूट पड़ गई। और अमृतलाल के दो बाजू सुल्तान सिंह और देवीलाल शिकारी गैंग से टूटकर चले गए थे।
अमृतलाल ने अपने गैंग में बहनोई मोतीराम को शामिल किया। मोतीराम को एक केस में सजा होनी थी तो अमृतलाल ने उसके दुश्मनों को बेरहमी से कत्ल कर दिया। मोतीराम भी बद्री की बहन पर नजर रखे था। इसके बाद दोनो ही बद्री किरार को परेशान किये हुए थे। इसी बीच बद्री पुलिस के साथ मिल कर दोनों का गेम बजाने का प्लान तैयार कर चुका था। 
बद्री गैंग में शामिल हो गया लेकिन उसने लहरी सिंह के प्लॉन के मुताबिक ये जाहिर नहीं होने दिया कि वो किसी भी हथियार को चलाना जानता है। जब भी उसको कोई हथियार लेने के लिए कहा जाता वो कह देता कि नहीं उसको तो लाठी ही पसंद है। और फिर एक दिन जब अमृतलाल ने उसको कहा कि आज रात उसको बद्री की बहन के साथ गुजारना है। बद्री महीनों से इस दिन को टाल रहा था लेकिन अय्याश अमृतलाल ने उसको विवश कर दिया कि वो अपनी बहन को आज अमृतलाल को सौंप दे। बद्री ने कहा कि गोपालपुर में उसकी बहन आज की रात रहेंगी।
पूरा गैंग गोपालपुर की ओर चल दिया। रास्ते में अमृतलाल ने बद्री पर खुश होकर उसको शिवपुरी के डीएम का वो पर्चा भी दिखाया जिस पर अमृतलाल के सिर पर बीस हजार रूपए के इनाम की घोषणा लिखी हुई थी। बद्री का इरादा पक्का हो चुका था बस मौके की तलाश थी।
18 अगस्त 1959। मुंह अंधेरे से चला हुआ गैंग चलते चलते थक चुका था। भरी दोपहर में गोपालपुर से कुछ दूर पहले ही महुवा के पेड़ों के नीचे गैंग ने आराम करने का तय किया। मोतीराम और अमृतलाल दोनो खुश थे। गैंग के लोगो के लिए पास के गांव से बकरा लाकर काटा गया और शराब का लंबा दौर चला। खाने के बाद गैंग मेंबर तालाब के किनारे सो गए। बीच में अमृतलाल और मोतीराम सो गए और उनके पास बद्री किरार बैठ गया। बद्री ने जानबूझकर खाना नहीं खाया था। तबीयत खराब होने का बहाना किए हुए बद्री को पहली बार अमृतलाल ने अपनी राईफल थमा दी। शायद ये अमृतलाल की पहली और आखिरी भूल थी। 
 
कुछ देर बाद जब गैंग के लोग सो गए तो बद्री ने सबकी राईफले और बंदूके उठाकर तालाब में फेंक दी और अमृतलाल की राईफल से उसको सटाकर एक गोली चला दी। चंबल में चली लाखों गोलियों में से सबसे कीमती गोली। एक ही गोली अमृतलाल को चीरते हुए मोतीलाल के सीने में धंस गई। एक गोली दो शिकार। चंबल के इतिहास में किसी डाकू का अपनी ही गोली से ऐसा अंत इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा। 
गोली की आवाज से उठे गैंग के मेंबर जैसे ही आगे बड़े । बद्री ने गोलियों की बौंछार कर दी। निहत्थे गैंग के सदस्य जान बचा कर जंगल की ओर भागे। बद्री ने मोती की राईफल भी उठाई और दोनो राईफलों को टांग कर गोपाल पुर जा धमका। थाने में जाकर लहरी सिंह को कोड वर्ड में सदेंश भेजने की गुहार की। काली गाय मिल गई।
थानेदार गजाधर सिंह ने भगा दिया लेकिन जल्दी ही उनको शक हुआ तो फौरन बद्री को बुलाया गया और बद्री उनको लेकर पुलिस पार्टी के साथ मौका ए वारदात पर पहुंच गया। मौके पर दो लाशे थी जिसमें से एक लाश पच्चीस साल से चंबल के सीने में धसें हुए कांटे यानि अमृतलाल की थी।  पुलिस प्रमुख के एफ रूस्तम जी ने पत्रकारों को कहा कि ये एक चालाक लोमडी़ का अंत है। एंड ऑफ ए क्लेवर फॉक्स। और अमृतलाल की मोटी फाईल में आखिरी शब्द दर्ज हो गए। 
thus ended the criminal career of a man who. starting from thieving, committed almost every serious crime known to law. in his active career of 23 years he committed hundreds of serious offences in, UP,Rajasthan and M.P and collected an enormous sum of money, his death will relieve the people of a large tract of central India from the fear of dacoity.