मेरे लोगो:
दुख से समझौता न करना-वरना दुख भी कड़वाहटों की तरह
तुम्हारे जायके का हिस्सा बन जाएंगा
तुम दुख के बारे में गौर करना.....
मेरे लोगो,
दुख को जब पहचानोंगे तो उसका कर्ज उतारोगे....................
इस समय देश में लूट का महोत्सव जारी है। कोई भी मंत्री अरबपति से कम नहीं है। खुली लूट है। कोई पूछने को तैयार नहीं है। समापन यूं ही चल रहा है आजकल हर आम आदमी की बातचीत का। प्रदेश हो या फिर केन्द्र सरकार पूरी तरह से लूटने में लगी है। कोई भी पॉलिसी ऐसी तैयार नहीं हो रही है जिसमें देश की दो तिहाई आबादी का दर्द या उसका अक्स दिखता हो। हां प्रोजेक्ट रोज पास हो रहे है। एक चीज ओर दिखती है कि रोज प्रोजेक्ट की कॉस्ट में ईजाफा होता जा रहा है। पहले एक हजार करो़ड़ का प्रोजेक्ट होता था तो बड़ी बात होती थी। आज छोटे से छोटे राज्य में पांच-से पचास हजार करोड़ के प्रोजेक्ट पास हो रहे है। देश में बहस जारी है कि लोकपाल बिल कैसा हो। संसद में भूमि अधिग्रहण कानून किस रूप में पास हो। बाबा रामदेव और उसके साथी आचार्य बालकृष्ण किस तरह से ढ़ोंगी है। योगी होकर भी राजनीति करते है। संसदीय लोकतंत्र को खतरा बढ़ता जा रहा है। इस तरह के वक्तव्य रोज जारी कर रहे है सरकार के प्रवक्ता। देश का बौना माफ करना नेशनल मीडिया इस को कवर कर रहा है। मीडिया की इस भेडिया-धसान में किसी भी विदेशी को लग सकता है कि देश में एक सरकार है जो रोज उपद्रवियों से जूझ रही है। मंत्रियों को एक ऐसे विपक्ष से सामना करना पड़ रहा है जो सरकार के खिलाफ विदेशों से पैसा ले रहा है। बाबा और सिविल सोसायटी नाम की संस्था लोकतंत्र पर कब्जा कर इसे विदेशियों के हवाले करना चाहती है। लेकिन देसी आदमी को हैरानी हो रही है कि आखिर लाखों करोड़ का बजट चलाने वाली सरकार को एक बाबा और उसके चेलों या फिर सिविल सोसायटी जैसे संगठनों से निबटने के लिए रोजाना अंत्याक्षरी करने की क्या जरूरत है।
आप को समझना है। मीडिया में अंत्याक्षरी से बाबा रामदेव टीआरपी बनाता है। अन्ना हजारे सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से का बायस बनता है। लेकिन हकीकत ये लगती नहीं है। दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के एक मंदिर में घर बना कर रहने वाले अन्ना हजारे में और महात्मा गांधी में हजारों जन्मों का नहीं तो सैकड़ों जन्मों का अंतर जरूर होगा। अपने हर भाषण में भगतसिंह और सुभाष चन्द्र बोस का नाम लेने वाले रामदेव में और देश के लिए मरमिटने वाले क्रांतिकारियों में जमीन और आसमान से भी ज्यादा फर्क होगा। फिर ऐसा क्या है कि सरकार इन सबको उतना चढ़ा रही है। कारण साफ है देश में ऐसा कुछ चल रहा है जिसको सरकार छुपा रही है और अपने इशारे पर नाचने वाले बौनों के सहारे छोटी-छोटी घटनाओं को इतना बड़ा दिखा रही है कि आप इधर-उधर देखने की बजाय सिर्फ अंत्याक्षरी देंखें।
सालों तक रिटेलिंग में आने को बेकरार विदेशी कंपनियों को इक्यावन फीसदी निवेश की अनुमति दे दी गई। अमेरिका से एक दो दस नहीं बल्कि पचास हजार करोड़ रूपये के रक्षा सौदे कर लिए गए। परमाणु ऊर्जा पर समझौते के लिए जो सपने दिखाएं गये थे वो एक-एक करके झूठे साबित हो रहे है। कभी परमाणु सौंदे का विरोध करने वाले और न दिखने वाले पर आसानी से समझ में आने वाले कारणों से बाद में सरकारी भोंपू बन कर इस सौदे को अंजाम देने वाले काकोदकर भी कह रहे है कि देश पर दबाव डाल रही है विदेशी ताकतें। कावेरी बेसिन में हजारों करो़ड़ रूपये के फायदे के सौदे देश के सबसे बड़े भिखारी(माफ करना अमीर) अंबानी की झोली में डाल दिये गए।
सरकार को इस बात से कतई खतरा नहीं है कि एक लोकपाल बन जाएंगा। क्योंकि कोई भी लोकपाल इस देश के मौजूदा संविधान के अंदर कभी वोट बटोरने वाले राजनेता को अंदर नहीं कर पाएंगा। ये धुव्र सत्य है। ये थामस की तरह से एक और सफेद हाथी साबित होगा। एक ऐसा हाथी जिसके खाने का इंतजाम सोनागाछी, कमाठीपुरा या फिर दिल्ली के जीबी रोड़ पर रोटी के लिए तन बेचने वाली औरते अपने पैसे से करती रहेगी। कई आईएस अफसरों के लिए नया ठिकाना बन जाएंगा। हजारों कर्मचारियों के लिए नौकरी का रास्ता खुल जाएगा। लोकपाल की मांग करने वाली सिविल सोसायटी के नुमाईंदों को देखने भर से लग जाता है ये किस तरह की लोकपाल की मांग कर सकते है। अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी ऐसे पद पर रह कर लौटे है जो मध्यमवर्ग के सपनों का आखिरी पड़ाव होती है यानि आईआरएस और आईपीएस। शांति भूषण और प्रशांत भूषण कई सौ करोड़ रूपये का तो टैक्स सरकार को दे चुके है। आज प्रशांत भूषण और शांति भूषण कमाना बंद कर दे तो भी सैकड़ों साल तक अपनी कार में पेट्रोल डलवा कर घूम सकते है। ऐसी उनके पास हैसियत और ताकत है। अन्ना साहब ने दोहराया कि ये अच्छे ड्राफ्ट करने के लिए जरूरी है। कोई भी कह सकता है कि बाबा जी इनसे बेहतरीन ड़्राफ्ट तो कोई क्लर्क भी कर सकता होगा जो पैसे वसूलने में बेहद दक्ष हो। हमको ड्राफ्टमैन नहीं सच्चे लोग चाहिए थे जिनको गरीबों से सहानुभूति नहीं समानुभूति हो। लेकिन ऐसे आदमी कहां से लाएं। जो राजा को नंगा कहने का साहस जुटा सके। लिहाजा ये भी सिर्फ जबानी जमा खर्च ही है।
रही बात बाबा रामदेव की तो 1995 में हरिद्वार में दवाईयां बनाने वाले बाबा आज हजारों करोड़ रूपये के मालिक है। इस पर कोई ऐतराज किसी को नहीं हो सकता है। उन्होंने अपने कामयाब चार्टड एकाउंटेंट्स की मदद से एक ऐसा जाल तो बुन ही दिया है कि अपनी सारी ताकत और हैसियत के बावजूद केन्द्र सरकार कुछ पकड़ नहीं पा रही है। आखिर सरकार में बैठे लोगों ने बाबा के यहां लंबे अरसे तक कार्निश की है। तो अपनी उस बुद्दि का सहारा जरूर बाबा को दिया होगा जिससे वो साठ सालों से देश को लूट रहे है बाकायदा संवैधानिक तौर पर मालिक बनकर। कोई भी आदमी चार जून की रात पुलिस की असंवैधानिक कार्रवाई का समर्थन नहीं कर सकता है। जिस पुलिस कमिश्नर को किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभी जेल में होना चाहिए था वो रिटायरमेंट के बाद यकीनन किसी भी राज्य में राज्यपाल बनने की तैयारी कर रहा होगा।
इस समय देश में सरकार को बचाने की जिम्मेदारी है कपिल सिब्बल पर। कपिल सिब्बल इस वक्त मनमोहन के सबसे करीबी मंत्री है जो संगठन से ज्यादा इस समय प्रधानमंत्री की वकालत में जुटे है। लेकिन कई भारी-भरकम मंत्रालय संभाल रहे कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट के नामी-गिरामी वकील है। अपनी वकालत के कैरियर में उन्होंने कितने गरीब लोगों के लिए केस लड़े है और कितनी पीआईएल में वो पार्ट रहे है अगर पता करेंगे तो पता चलेगा कि एक भी नहीं या फिर आपके हाथ में उंगलियां ज्यादा होगी उनकी सहभागिता के केस कम होगें। वो देश की क्या सेवा कर रहे थे कि मंत्रीमंडल में उनको शामिल किया गया। उनका सार्वजनिक जीवन में इतना ही योगदान है कि उन्होंने अमीर और बड़े लोगों के करप्शन में उनका बचाव किया कानून की बारिकियां निकाल कर जिस कानून को बनाया गया था कमजोर और गरीब लोगों की रक्षा के लिये। यही एकमात्र योग्यता थी उनकी सरकार में शामिल होने की। क्योंकि उनको ये अच्छी तरह से मालूम है कि ताकत कहां है लिहाजा उसका फायदा उठाना आता है। किसी पानीदार आदमी से कहों कि आपने पंचायत में झूठ बोला था तो वो शर्म से गर्दन नहीं उठाएंगा। लेकिन इनको महारथ हासिल है झूठ बोलने में उसको दोहराने में और फंस जाने पर फिर कोई नया झूठ बनाने में। आखिर सीएजी में इन्होंने किस गणित से राजा की रक्षा की। इनके मुताबिक तो कोई नुकसान हुआ नहीं था देश को तो फिर इनके होते हुए राजा जेल में क्यों है। सीबीआई चार्जशीट क्यों कर रही है। इनकी आत्मा जरूर दुख रही होगी अमीर लुटेरों को जेल जाते देख कर। अब एक नयी कहानी सामने आई है रिलाइंस इन्फोकॉम को जुर्माने में राहत देने संबंधी। सच में झूठ बोलने वाले कपिल सिब्बल को बचाव नहीं सूझा तो बौनों को ही सलाह देने लगे कि सही तरह से कवरेज करें। किस तरह से कवरेज करे भाईसहाब बता दे। रिलायंस पर जुर्माना बढ़ाने की बजाय घटाने की तारीफ करे। जीं हां यही लूट का अर्थशास्त्र है जो देश में इस समय चल रहा है। कभी कोई ये कह सकता है कि कानून की इन बारीकियों को लिखा गया था अमीर लोगों को गरीबों का खून चूसने देने के लिए या फिर देश के उस सबसे गरीब आदमी की महाजनों से सुरक्षा के लिए।
और अब कपिल सिब्बल को लग रहा है कि लोकतंत्र खतरे में है। क्योंकि बौंनों के कौरस में भी देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग जाग रहे है। सवाल कर रहे है और उनको किसी अन्ना के लोकपाल या फिर रामदेव के योग की नहीं सिर्फ जाति औऱ क्षेत्रवाद के खोल से बाहर निकल कर लुटेरों की पहचान करनी है। इसी खतरे की ओर इशारा कर रहे है देश के सबसे जहीन और महीन मंत्री कपिल सिब्बल साहब।
पता नहीं क्यों लेकिन मन कह रहा है कि पाकिस्तान की एक अनजान सी कवियत्री की उपर की पक्तिंयों को पूरा पढ़ना चाहिएँ...
मेरे लोगो
दुख के दिनों में सूरज के रस्ते पर चलना
उसके डूबने-उभरने के मंजर पर गौर करना
मेरे लोगो झील की मानिंद चुप न रहना
बातें करना,चलते रहना , दरिया की रवानी बनना
मेरे लोगो
दुख से कभी समझौता मत करना, हंसते रहना
दुख के घोड़े की लगामों को पकड़ हवा से बाते करना
ऊंचा उड़ना.....
शाहिस्ता हबीबी
Sunday 10 July 2011
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