<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875</id><updated>2012-03-02T01:11:56.068+05:30</updated><category term='मां'/><category term='सेना'/><category term='बरखा दत्त'/><category term='भोपाल'/><category term='अन्ना'/><category term='सेंसेक्स'/><category term='जल'/><category term='हॉट सिटी'/><category term='इश्क'/><category term='होली'/><category term='शेयर बाजार के चोर'/><category term='शरद पवार'/><category term='मनमोहन सिंह'/><category term='कुत्ता'/><category term='कारगिल'/><category term='सिमी'/><category term='कश्मीर'/><category term='अरूंधती'/><category term='डीजीपी'/><category term='अश्क'/><category 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टूट / झूठ मूठ मत अब रूठ।......  रघुबीर सहाय। लिखने से जी चुराता रहा हूं। सोचता रहा कि एक ऐसे शहर में रोजगार की तलाश में आया हूं, जहां किसी को किसी से मतलब नहीं, किसी को किसी की दरकार नहीं। लेकिन रघुबीर सहाय जी के ये पंक्तियां पढ़ी तो लगा कि अपने लिये ही सही लेकिन लिखना जरूरी है।</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>119</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-3644237026007305250</id><published>2011-11-27T13:41:00.003+05:30</published><updated>2011-11-27T17:26:49.786+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीम अन्ना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='केजरीवाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किरणबेदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिटेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एफडीआई'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुमारविश्वास'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्ना'/><title type='text'>और वो दिन आ ही गया।</title><content type='html'>देश के मीडिया में टीम अन्ना और सरकार के बीच की अंताक्षरी चल रही थी। मुझे लग रहा था ऐसा कुछ भी है जो कमरों और फाईलों के अंदर चुपचाप चल रहा होगा। सरकार के सेक्रेट्रीज ने रिटेल में एफडीआई को बिना किसी शोरशराबे के पास कर दिया। मीडिया को इतना बड़ा फैसला दिखा नहीं या जानबूझकर देखा नहीं- दोनों बातें अलग है। मेरा मत है जानबूझकर देखा नहीं। और अब मंत्रिमंडल ने भी इस बिल को मंजूरी दे दी है। चार करोड़ लोगों के रोजगार को खत्म करने और उस पर पलते बीस करोड़ हिंदुस्तानियों को भिखारी की हैसियत में लाने की दुर्भावनाओं से भरे बिल को मंजूरी। एनआरआई और कॉरपोरेट घरानों के इशारों पर नंगा नाच करती हुई दिख रही है सरकार। नूरा कुश्ती लड़ते हुए बेशर्म जातिवादि नेता विपक्ष में होने का माखौल उड़ाते हुए। लेकिन इस बिल की पृष्टभूमि आंदोलन के समय ही रख दी गई थी और मुझे लगता है कि ये बात मुझे जरूर करनी चाहिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केजरीवाल और किरण बेदी की टीम के साथ उत्तर भारतीयों के लिए अजनबी अन्ना हजारें रामलीला मैदान पर धरना दे रहे थे। लहराते हुएं तिरंगे के बीच अन्ना और बाद में नामित हुई टीम अन्ना के लोग हुंकार भर रहे थे। देश के मीडिया के फन्नें खां रामलीला मैदान को अपने ज्ञान और जोश के जज्बें से सराबोर कर रहे थें। देश के युवा अभिव्यक्ति के नये माध्यमों से इस पूरी मुहिम को अंजाम देने में जुटे थे। भ्रष्ट्राचार में आकंठ डूबे भावुक नौकरी पेशा लोग पूरी तरह से आंदोलित थे। टीवी चैनलों के ज्ञानी पत्रकारजन कदमताल करते हुए भीड़ का आकलन कई गुना कर रहे थे। इस दौरान सबसे खास बात थी कि इस शोर में विवेक की आवाज नहीं थी। जो भी आवाज गूंज रही थी वो या तो समर्थन में अंधी थी या फिर विरोध में। लेकिन इस पूरे माहौल को बनने से पहले ही मेरे एक दोस्त ने  धीरे से कहा था कि देश का युवा अगले चार-पांच महीने बाद एक सामूहिक अवसाद में डूबने वाला है। बेहद अजीब सी प्रतिक्रिया थी। इस बारे में किसी से कोई शब्द सुना नहीं था। ये बात लगभग चार अप्रैल की थी। जंतर-मंतर पर धरने की तैयारी चल रही थी। मैंने उस दोस्त से बात को थोड़ा स्पष्ट करने को कहा। उसका आकलन था देश में भ्रष्ट्राचार से आदमी परेशान है। मीडिया के पूरी तरह कॉरपोरेट के हाथों में खेलने या फिर उनके साथ साठ-गांठ करने के बावजूद कभी-कभी समीकरण गड़बड़ाने के चलते खबर छप ही जाती है। ऐसे में जो सूचना आम आदमी तक कानाफूंसियों के माध्यम से जाती थी अब वो सीधे पहुंच रही है। और उसके पहुंचने का समय भी बहुत कम हो गया। ऐसे में आम आदमी का रियेक्शन भी बहुत तेजी से आ रहा है। इतनी उथल-पुथल के बीच ऐसे आदमी जिनका कार्य अपर मीडिल क्लास का रहा हो या फिर जिनकी जिंदगी ऐओ-आराम से कट रही हो वो लोग भ्रष्ट्राचार से परेशान लोगों के नायक बनकर कदमताल कैसे कर सकते है। देश के युवा के पास इस वक्त कोई आदर्श नहीं है। मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया जैसे नायकों ने देश में आजादी से पहले और आजादी के बाद का अंतर ही खत्म कर दिया।  आंदोलन को देख कर देश का युवा जरूर आदर्श की तलाश में इससे जुडेगा।  युवाओं के लिए देश और परदेश में अंतर नहीं रह गया है और उसको हॉलीवुड की फिल्मों और देश के टीवी मीडिया से उपजी देशभक्ति की नयी धारा कि मौका मिलते ही तिरंगा लहराओं की धारणा को मजबूत करने लिए  तेजी से इस आंदोलन के साथ जुड जाएँगा। लेकिन जैसे ही इस आंदोलन में शामिल लोगों की हकीकत सामने आएंगी वो तेजी से अवसाद में चला जाएंगा। मेरे दोस्त की बातों का आधार था 1975 का जेपी मूवमेंट और उसके रणबांकुरों की गाथा। आय से अधिक संपत्ति के आरोपों से घिरे लालू यादव महज जातिवादी राजनीति का एक चेहरा भर है। कभी भदेस बातों और पहनावे से अपने आप को गरीब जनता से जोडने वाले लालू यादव अपने गालों की चमक भर देख ले तो खुद शीशे से मुंह मोड़ ले। फिर दूसरा युवा आंदोलन हुआ वीपी सिंह का भ्रष्ट्राचार विरोधी मामला। लेकिन इस सफल लड़ाई का अंत हुआ मंडल के नाम पर उभर आएं जातिवादी राजनेताओं के हुजूम को ताकत मिलने से। &lt;br /&gt;जेपी मूवमेंट के जहां महज 15 साल बाद जहां दूसरा आंदोलन खड़ा हो गया था वहां पूरे 22 साल लग गए दूसरे आंदोलन से जुड़ने वालों युवाओ की पीढ़ी सामने आने में। &lt;br /&gt;इस आंदोलन को लेकर अपनी राय रखने वाले मित्र की राय आंदोलन का नेतृत्व संभाल रहे केजरीवाल, किरणबेदी, प्रशांत और कुमार विश्वास के बारे में अपनी पुरानी जानकारियों के आधार पर थी। केजरीवाल खबरों में रहने के बेहद शौकीन है और उसके लिए कुछ भी कर सकते है किरण बेदी के खिलाफ अपनी बेटी के मेडीकल में एडमिशन के लिए मिजों कोटे का इस्तेमाल करने का आरोप था। दोस्त का कहना था कि जिस अन्ना को ये लोग खोज कर लाएं है उसका जादू कैमरों के आगे जबान खोलते ही टूट जाने वाला है। प्रशांत और शांतिभूषण की ईमानदारी पर सवाल उठाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। उन लोगों ने यदि पूरा टैक्स भी ईमानदारी से दिया है तो उसकी कीमत भी अरब में है। ऐसे में 30 परसेंट टैक्स देने के बाद जो संपत्ति बची उसकी कीमत कई अरब रूपये होगी। क्या इतनी मोटी कमाई करने वाले लोगों को गरीब लोगों के कष्ट में कितना दर्द होगा ये तो आप समझ सकते है। मेरे मित्र का आकलन था कि ये आंदोलन अन्ना के टीवी कैमरों पर मुंह खोलते ही खत्म हो जाएंगा। टीवी चैनल्स ने अपने मुनाफे के लिए इस आदमी को जोकर में तब्दील कर देंगे। ऑन कैमरा और ऑफ कैमरा की जंग में एक दोयम प्रतिभा का आदमी सामने आ खड़ा होगा। तब इस पूरी लड़ाई के भेडियाधंसान में जाने का काम शुरू हो जाएंगा। किरण बेदी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने के बाद केजरीवाल के छुट्टियों पर घूमने औऱ उसका पैसा माफ करने की चिट्ठियों के बाद ये बात तो साफ हुई कि बौने लोग क्रांति का आह्वान कर रहे थे। क्रांति विफल हुई। टीम में एक गवैया गा रहा था होठों पर गंगा और हाथों में तिरंगा। बाद में पता चलता है कि कॉलिज में पढ़ाने की बजाय वो शख्स कवि सम्मेलनों और मंचों पर अपना वक्त गुजारता है। नोटिस जारी किया गया कॉलिज से। ये तमाम नायक जब सामने आयेंगे तो सरकार इनको पूरी तरह बदनाम कर देंगी। और फिर यूथ का वो बेशकीमती गुस्सा जो किसी भी देश की तकदीर बना सकता है जाया हो जाएंगा। अपने में घिर कर उस युवा को ये समझ नहीं आयेगा कि के उसको बेवकूफ किसने बनाया-बौने नायकों ने विदेशी ताकतों के इशारों पर एनआरआई की तरह व्यवहार कर रही सरकार ने या फिर हमेशा अपने को जनता की आवाज बताने वाले बौने से मीडिया ने। इसके बाद वो युवा अपने खोल में सिमट जायेगा और या फिर अवसाद का शिकार होकर रास्ता भटक जाएंगा। आज इस बात को खत्म हुए लगभग 7 महीने हो गये और लगता है कि दोस्त ने अपना आकलन कुछ ज्यादा ही सही किया था। एक बात और इस पूरी बातचीत के दौरान टीम अन्ना के एक साथी भी हमारे साथ थे जिनका ये मानना था कि जनता का दबाव उनके बौनों की लंबाई बढ़ा देगा। अब दोनों में किसका आकलन सही निकला ये आप सोच सकते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.मैं तो सिर्फ जर्मन कवि हांस माग्नुस एंत्सेंसबर्गर की एक कविता मध्यमवर्ग का शोकगीत से बात खत्म करता हूं..&lt;br /&gt;हम फरियाद नहीं कर सकते/हमबेकार नहीं हैं/ हम भूखे नहीं रहते&lt;br /&gt;/हम खाते हैं/ घास बाढ़ पर है/ सामाजिक उत्पाद/नाखून/अतीत/सड़कें खाली है/ सौदे हो चुके हैं/ साइरन चुप हैं/यह सब गुजर जायेगा/&lt;br /&gt;मृतक अपनी वसीयतें कर चुके हैं/ बारिश ने झींसी की शक्ल ले ली है/युद्ध की घोषणा अभी तक नहीं हुई है/उसके लिए कोई हड़बड़ी नहीं है/&lt;br /&gt;हम घास खाते हैं/हम सामाजिक उत्पाद खाते हैं/हम नाखून खाते हैं/हम अतीत खाते हैं/हमारे पास छिपाने को कुछ नहीं है/हमारे पास चूकने को कुछ नहीं है/ हमारे पास कहने को कुछ नहीं है/हमारे पास है/ घड़ी में चाबी दी जा चुकी है/बिलों का भुगतान किया जा चुका है/ धुलाई की जा चुकी है/आखिरी बस गुजर चुकी है/ वह खाली है/ हम शिकायत नहीं कर सकते/हम आखिरकार किस बात का इंतजार कर रहें हैं ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-3644237026007305250?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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है&lt;br /&gt;वो धीमें से हिलाता है अपने हाथ-पांव&lt;br /&gt;आवाज के भारी पर्दें गिराता-उठाता है&lt;br /&gt;इधर-उधर घूमती नजर में कोई शिकायत नहीं&lt;br /&gt;उम्मीद रहती है&lt;br /&gt;वो आया है &lt;br /&gt;दुनिया की ऐसी गोद से &lt;br /&gt;जहां वो शिकायत कर जिंदा नहीं रह सकता था&lt;br /&gt;वहां सिर्फ उम्मीद थी&lt;br /&gt;अंधेंरों में डूबे उन महीनों ने &lt;br /&gt;सायक को सिखाया है &lt;br /&gt;उम्मीद रखना &lt;br /&gt;चारों ओर से बंद दीवारों में &lt;br /&gt;भी सांस ली जा सकती है &lt;br /&gt;जिंदा रहने के लिए &lt;br /&gt;ली जा सकती है खुराक &lt;br /&gt;और जरूरत नहीं होती&lt;br /&gt;किसी इंसान के बनाएं किसी कपड़े की&lt;br /&gt;लेकिन कितनी जल्दी&lt;br /&gt;ये सब बदल सकता है&lt;br /&gt;ये दुनिया सायक को बदल देंगी &lt;br /&gt;उम्मीद की जिंदगी से&lt;br /&gt;शिकायत करते एक मासूम में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या सिर्फ यहीं है &lt;br /&gt;इस दुनिया के पास &lt;br /&gt;एक उम्मीद &lt;br /&gt;के बदले में&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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सोचने की जिम्मेदारी संभाल रखी है। &lt;br /&gt;अमेरिकी राष्ट्रपति को दुख हुआ या नहीं लेकिन मनमोहन सिंह को दुख हुआ है। मनमोहन सिंह लाटरी से बने प्रधानमंत्री है। उनके गले में प्रधानमंत्री का हार उनकी आम जनता से दूरी के चलते डला है। सोनिया गांधी जानती है कि पूरी कोशिशों के बावजूद जो शख्स अपनी मातृभाषा यानि पंजाबी राष्ट्रभाषा यानि हिंदी नहीं सीख पाया वो देश की हजारों जातियों में बंटी जनसंख्या का नायक कैसे बन सकता है। &lt;br /&gt;यानि इतिहास में एक बड़े गुलजारी लाल नंदा के तौर पर दर्ज हो जाएंगा। ऐसे प्रधानमंत्री को हर साल हजारों बच्चों की अकाल मौत पर दर्द नहीं होता। दुख नहीं होता। किसान भूख से मर रहे है। आत्महत्या कर रहे है। रोज अखबार में कई पन्नों पर सड़कों पर मारे गये लोगों के बच्चों की बेबस सी फोटो दिखती है। किसी पर प्रधानमंत्री को दर्द नहीं हुआ। एक लाख साठ हजार लोगों एक्सीडेंट में सड़कों पर दम तो़ड़ते है कभी प्रधानमंत्री का दर्द नहीं दिखा्। &lt;br /&gt;लेकिन ये विषय से भटकना हुआ। बात स्टीव जॉब्स की है। एक ऐसा आदमी जो भारत के बारे में कोई अच्छी राय नहीं रखता हो। ऐसा आदमी जिसे प्रधानमंत्री भारत रत्न न दे पाएं लेकिन भारत की तरक्की में एक मददगार माने। &lt;br /&gt;अब जरा सच देखे। मीडिया एक झूठ के बादल की तरह हो रहा है जो रोज सिर्फ झूठ रच रहा है। और सौ बार बोला गया झूठ सच में तब्दील हो रहा है। स्टीव जॉब्स ने जो भी बनाया कंपनी के मुनाफे के लिए बनाया। उस आदमी ने भरपूर कीमत वसूली अपने आविष्कारों की। हमारे देश ने हर मोबाईल को पैसा देकर खऱीदा। हर चीज पर पैटेंट का पैसा दिया। उसने ऐसी कोई चीज नहीं बनाईँ जो हमारे देश के किसी गरीब आदमी को रोटी हासिल करने में मदद दे। सिर्फ आईफोन जैसी चीजों से दुनिया नहीं चल रही है। ये दर्द उन्हीं बेशर्म लोगों का और दलाल मीडिया का है जिसको 32 रूपये रोज कमाने वाला गरीब नहीं दिखता । लेकिन 32 हजार का आईफोन खरीदने वाले के जरा से दर्द पर पेट में मरोड़ उठ जाती है। ऐसे में सिर्फ एक ही बात कही जा सकती है कि ये मीडिया देश के लोगों का नहीं स्टीव जाब्स जैसों की आवाज जिंदा रखने के लिए है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-865606537975826174?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/865606537975826174/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=865606537975826174' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/865606537975826174'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/865606537975826174'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='काश स्टीव जॉब्स हमारे बाप होते'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-9134526558082059723</id><published>2011-08-11T07:55:00.001+05:30</published><updated>2011-08-11T08:00:29.340+05:30</updated><title type='text'>काश इनके पास बाप होता :</title><content type='html'>पॉर्लियामेंट में मंहगाई पर हाल ही में बहस हुई। एक ऐसी बहस हुई जिसके होने के लिए ये देश हजारों करोड़ रूपये खर्च करता है। बहस होनी थी तो हुई। इस बहस में निकला बस अंडा। हर बार यही निकलता है। विपक्षी पार्टी हाय-हाय चिल्लाती है और सत्तारूढ़ पार्टी आंकड़े गिनवाती है। भूख से मरते हुए लोगों को संसद से कोई वास्ता नहीं है और न ही संसद को उनसे। एक सालाना नाटक है। गंभीरता से खेला जाना चाहिए। &lt;br /&gt;कोई झोल-झाल नहीं। संसद में डीपी यादव है। नहीं जानते अरे हत्याओं और लूट के दर्जनों लिखित और अलिखित मुकदमों का आरोपी। मधु कोड़ा है, कलमाड़ी है, ए राजा है-उनकी करीबी कनिमोझी है। प्रणव मुखर्जी है, जिसके पास आकंडें ही आंकडें है। ये सिर्फ बानगी है। नाटक की हर बार एक निर्धारित स्क्रिप्ट होती है। लेकिन ये अलिखित है और परंपराओं पर चलती है। नया डायलॉग आ जाता है कभी-कभी।&lt;br /&gt;इस बार के नाटक का सबसे शानदार डायलॉग बोला है सलमान खुर्शीद साहब ने। सलमान खुर्शीद के इतिहास के बारे में आप जाने न जाने - लेकिन ताजा जानकारी ये है प्रधानमंत्री के अजीज है। सलमान साहब पर प्रधानमंत्री की नवाजिशों का दौर जारी है। कॉरपोरेट अफेयर्स से होते हुए अब कानून मंत्रालय संभाल रहे है। हर ऐसी कमेटी में शामिल है जिसमें प्रधानमंत्री की दूसरी आंख यानि कपिल सिब्बल साहब है। काश हमारे देश को आज भी ब्रिटेन से लार्ड जैसी उपाधि हासिल होती थी कपिल सिब्बल आज लार्ड कपिल सिब्बल के नाम से जाने जाते। खैर कपिल साहब इस बार गच्चा खा गये। डायलॉग सलमान खुर्शीद की जबान पर था।&lt;br /&gt;संसद में मंहगाईँ की बहस के दौरान सरकार की लाचारी का बयान करते हुए सलमान साहब ने दीवार का मशहूर डायलॉग दोहराया। मेरे पास मां है। अब सरकार में और भी मंत्री है तो मां सिर्फ सलमान साहब के पास ही नहीं हो सकती है। लिहाजा सलमान साहब ने कहा कि हमारे पास यानि तमाम सरकार के पास मां है यानि अर्थशास्त्र के जानकार मनमोहन सिंह है। दुनिया में अगर कोई भी आदमी काम देखकर नौकरी देता तो मनमोहन सिंह को ऑफिस में भी नहीं आने देता कि अर्थशास्त्र का इतना ज्ञान और देश में भूख से तड़प रहे लोग बच्चे बेच रहे है आत्महत्या कर रहे है बाढ़ में डूब रहे है कर्ज में मर रहे है बीमार है औऱ ये साहब बता रहे है कि विकास हो रहा है।   &lt;br /&gt;बात मां की थी। दीवार फिल्म में माफिया डान अमिताभ को जवाब देते हुए ईमानदार पुलिस अफसर कहता है कि उसके पास और कुछ नहीं तो क्या मां तो है। लेकिन सलमान साहब की उच्च शिक्षित एड्वोकेटस है। अपने सहयोगी कपिल सिब्बल की तरह से प्रधानमंत्री की किचन कैबिनेट में शामिल है। ऐसे में हिंदी फिल्म के डायलॉग को उन्होंने ऐसे ही इस्तेमाल कर लिया कि इससे संसद में तालियां बजेगी। लेकिन उन्होंने फिल्म नहीं देखी है शायद फिल्म में उन दोनों का बाप नहीं होता है। अमिताभ को कई बार दुनिया चोर के बेटे के तौर पर जानती है। ऐसे में आपको ये परेशानी खड़ी हो सकती है कि पहले तो इन लोगों का बाप कौन है। ऐसे में सरकार के पास मां है तो शीलादीक्षित, विलासराव देशमुख, अशोक चव्हाण कौन है। बाप का इस्तेमाल क्यों नहीं किया। दरअसल सलमान साहब देख नहीं पाएं उन्होंने कैसी मां चुना है जो दूसकों के बच्चों को लूटकर लाने वाले अपने बच्चों को सजा देने की बजाय इनाम दे रही है। एक ऐसी मां है सलमान साहब के पास जो एक बड़ी हवेली की आया रखी गयी थी लेकिन ये आया हवेली को लूट-लूट कर खा रहे अपने बच्चों को देख कर उनके बचाव के रास्ते देखती रहती है। और जब भी कोई सवाल उठता है तो खड़ी हो जाती है अपनी ईमानदारी की कहानी लेकर। &lt;br /&gt;दरअसल सलमान खुर्शीद ने एक अधूरा डायलॉग बोला है। उनके पास एक मां ही नहीं बल्कि एक मामा भी है। लोगों को लग सकता है कि मोटेंक सिंह अहलूवालिया की भूमिका को अगर सलमान खुर्शीद देश को बताना चाहे तो इससे बेहतर रिश्ता अब वो कुछ नहीं बता पाएंगे। मनमोहन सिंह और मोटेंक सिंह अहलूवालिया ये ही जोड़ी है जो पिछले सात सालों से इस देश में चल रहे हर अर्थशास्त्र के फैसले के पीछे है। जिस भी नीति की घोषणा होती है जिसमें रूपये-पैसे का मामला होता है उसमें मनमोहन सिंह और मोटेंक सिंह की समझ शामिल होती है ऐसा ये देश मानता है। &lt;br /&gt;देश को इनकी अर्थशास्त्र की समझ का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। कोई ये कहने को तैयार नहीं कि जनाब पिछले दो दशक से ये गरीब देश आपकी तारीफ कर रहा है। अखबारों और टीवी चैनलों ने रोज टट्पूंजियें नेता से लेकर देश के शिरोमणि तक मनमोहन सिंह कि ईमानदारी की तारीफ करते है। उनके अर्थशास्त्रिय ज्ञान के बारे में कशीदें पढ़ते है। लेकिन इसी दौरान दो लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली। देश भर में भूखमरी और बीमारी ने कब्जा जमा लिया। गरीबी रेखा से नीचे लोगों का जीना दूभर हो गया। मंहगाईं ने आसमान तक पहुंचने की ठान ली। लेकिन इन जनाब को कुछ सिरा नहीं मिला। कोई अंधा आदमी भी समुद्र की आवाज सुनकर बता सकता है कि पानी की लहरें कितनी है लेकिन ये जनाब सिर्फ किताबों में पढ़ी और सुनी गई कहानियों की तरह से देश को देख रहे है। ये तो इनकी अर्थशास्त्र की समझ का मामला है।&lt;br /&gt;रही बात ईमानदारी की। देश के साठ साल के इतिहास की सबसे भ्रष्ट्र सरकार का मुखिया है मनमोहन सिंह। ये रकम इतनी है कि आम तौर पर सड़क पर बिकने वाले कैलकुटर में तो समाएंगी भी नहीं। एक-एक घोटाला खरबों रूपये का। रकम का आंकड़ा दिमाग खराब कर देता है। दो लाख करोड़ एट्रिक्स-इसरो, पौने दो लाख करोड़ टेलीकॉम, सत्तर हजार करोड़ कॉमनवेल्थ घोटाला। नाक के नीचे और आंखों के सामने हुआ। हर घोटाले में पीएमओ की जानकारी भी सामने आ रही है। ये ईमानदारी का सबूत है। हर काम चल रहा है इन जनाब की जानकारी में और इनके जिस्म में कोई हरारत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सलमान साहब ने बात तो शायद सच कही है। कि प्रधानमंत्री के तौर पर इनकी पार्टी के पास एक मां है क्योंकि देश के ग्रामीण इलाकों में अक्सर बिगड़े बच्चों को देखकर बोला जाता है कि बचपन में इसको बाप की जूतियां नहीं पड़ी तभी इसको सही-गलत का पता नहीं है। ऐसे में हम जैसे तो सिर्फ ये ही कह सकते है कि काश इनका कोई बाप भी होता ........&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-9134526558082059723?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/9134526558082059723/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=9134526558082059723' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/9134526558082059723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/9134526558082059723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='काश इनके पास बाप होता :'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-7800093409280871196</id><published>2011-07-29T19:30:00.003+05:30</published><updated>2011-07-29T19:35:57.837+05:30</updated><title type='text'>टुकड़ों में कुछ</title><content type='html'>बहुत वक्त लगा इस शहर को जीने में यारों&lt;br /&gt;खंजर मेरी भी आस्तींन में था&lt;br /&gt;शमशीरों के इस शहर में &lt;br /&gt;दिल नहीं मिला किसी के सीनें में यारों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर चीज की कीमत यहां&lt;br /&gt;हर एक अहसास के दाम यहां&lt;br /&gt;शीशें से पत्थर तोड़ों&lt;br /&gt;खून बहाकर रिश्तें जोड़ों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुनर है तो मंजिल के लिए&lt;br /&gt;धोखा है मंजिल का नाम यहां&lt;br /&gt;धोखा खाया तो सीख लिया&lt;br /&gt;धोखा दिया तो जीत लिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंखों में चमक की कमी नहीं &lt;br /&gt;मुस्कुराहटों में बस नमी नहीं&lt;br /&gt;हमने भी बहुत सीखा-भूला&lt;br /&gt;पर अपनी बिसात जमी नहीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुष्पेन्द्र ग्रेवाल के एक लेख में लिखी गईं&lt;br /&gt;एक सीरियाई कवि निजार कब्बानी की कुछ पंक्तियां&lt;br /&gt;।&lt;br /&gt;अगर हम अपनी जमीन /और मिट्टी के सम्मान /की हिफाजत करते हैं/&lt;br /&gt;अगर हम अपने और अपनी जनता के/ बलात्कार के खिलाफ/ विद्रोह करते है  &lt;br /&gt;अगर हम अपने आसमान के/ आखिरी सितारे की हिफाजत करते है..&lt;br /&gt;अगर यह पाप है/तो कितनी खूबसूरत है दहशतगर्दी/ &lt;br /&gt;इस सब के लिए मैं/अपनी पुरजोर आवाज बुलंद करता हूं/&lt;br /&gt;मैं दहशतगर्दी के साथ हूं/जब तक नयी विश्व संरचना/ &lt;br /&gt;मेरी संतानों को जिबह करके/ उन्हें कुत्तों के आगे परोसती रहेगी&lt;br /&gt;इन सबके खिलाफ मैं आवाज उठाता रहूंगा/ मैं दहशतगर्दी के साथ हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न कोई वादे वफा&lt;br /&gt;न खतो-किताबत&lt;br /&gt;इस तरह भी कोई जाता है&lt;br /&gt;महफिल से रूठकर।&lt;br /&gt;लहर से बच गयी तो क्या&lt;br /&gt;वक्त की हवा थी जो ले गई&lt;br /&gt;रेत की तस्वीर थी उसकी याद &lt;br /&gt;गिरी औऱ बिखर गई टूटकर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-7800093409280871196?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/7800093409280871196/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=7800093409280871196' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7800093409280871196'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7800093409280871196'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/07/blog-post_29.html' title='टुकड़ों में कुछ'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-5483671423016508333</id><published>2011-07-24T16:29:00.003+05:30</published><updated>2011-07-24T17:24:04.902+05:30</updated><title type='text'>लुटेरों का लॉग मार्च</title><content type='html'>निवेशकों ने नोएडा में लॉगमार्च किया। अपने घर का सपना संजोंएं हुए हजारों निवेशकों ने नोएडा की सड़कों पर जूलुस निकाला। हाथों में उठाएँ हुए कार्डबोर्ड पर लिखा था कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिले पैसे नहीं -घर चाहिए। ये सब वो लोग थे जिन्होंने अपने लाख-दो लाख रूपये और कुछ बैंकों से लोन लेकर बिल्डरों को देकर अपने लिए घर पक्का किया था। देश के आंख-नाक और कान में तब्दील हो चुके मीडिया पर इसका सचित्र प्रसारण जारी रहा। बौने से रिपोर्टर उछल-उछल कर निवेशकों के सपने टूट जाने और या फिर ऐसी ही लाईनें कि किसी ने अपनी जमा-पूंजी लगा दी है, या मां-बाप के जीपीएफ का पैसा लगा दिया है जैसी मध्यमवर्ग का दर्द जगाने वाली बाईट्स चला रहे थे। ऑफिसों में भी जो बातचीत चल रही थी उसमें भी ज्यादातर बौंनों का कोरस यही था कि बेचारे निवेशक लोगों का क्या कसूर।&lt;br /&gt;पहली नजर में ये ही लग सकता है कि ये पांच हजार लोग अपने फ्लैट छीन जाने से दुखी है। लेकिन आपको बस इतना करना है पर्दे पर बौने मीडिया की ईबारत मिटानी है। और उसके बाद कोरी स्लेट पर अपने दिमाग से इस पूरे खेल को समझना है।&lt;br /&gt;इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच ने देश में चल रही लूट का पर्दाफाश करने के लिए बस पर्दे ही हिलाए थे कि देश को लूट के लिए इस्तेमाल कर रहे बिल्डर माफिया, भ्रष्ट्रराजनेताओं और नौकरशाहों का मजमा जुट गया अदालत के आदेश की ऐसी की तैसी करने में। पहले आदेश के खिलाफ पहुंचें सुप्रीम कोर्ट में। करो़ड़ों रूपये की फीस के सहारे दूसरे के बाप को अपना बाप साबित करने को तैयार दलालों की एक पूरी फौंज ने पैरवी की कि ये गलत हो रहा है। लगभग इसी अंदाज में को देश की सबसे बड़ी अदालत ने जानना चाहा कि क्या गलत हो रहा है तो उनका जबाव था हजारों निवेशकों के साथ अन्याय हो रहा है ये बताने को कोई तैयार नहीं था कि भाई किसानों का क्या हो रहा है। कोर्ट ने भी देखा कि लूट के लिए किस तरह का शानदार प्लान तैयार किया जा रहा है। और कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।&lt;br /&gt;इस पूरी कवायद में कोर्ट ने देश के उन हजारों लोगों का संवैधानिक अधिकार बरकरार रखते हुए कि जिन का पैसा बिल्डरों ने लिया है उनका पैसा वापस किया जाएगा और ये रकम सूद समेत वापस की जाएंगी। अगर निवेशक ईमानदार होते या फिर उनका देश के गरीब और असहाय किसानों से और देश के कानून से कोई रिश्ता होता तो बात यहीं खत्म हो गयी थीं। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। &lt;br /&gt;इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद सबसे पहले निवेशकों के पैसे का दर्द का रोना बिल्डरों के एडवर्टाईजमेंट से चलने वाले बौंनों ने रोया। मासूमियत के साथ सवाल बस इतना था कि निवेशकों की गाढ़ी कमाईं का पैसा कौन वापस करेगा। टीवी देखने वाली मध्यमवर्ग की जनता के लिए ये दर्द बहुत बड़ा दर्द है। आखिर में आंसूओं से भरी बाईट्स चलने लगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने तो इस योजना पर ही पलीता लगा दिया कि पैसे से खरीदी गई बाईट्स से पिघल जाएगी देश की सबसे बड़ी अदालत।  अदालत ने आदेश दिया कि पैसा वापस हो जाएंगा सूद समेत। &lt;br /&gt;अब आपसे एक सीधा सवाल है कि यदि आपकी लगाई गई लागत मय ब्याज के आपको वापस मिल रही है तो क्या ये आपके साथ अन्याय है। यानि जिन लोगो ने देश में लूट के लिए अपना निवेश किसी बिल्डर के पास नहीं किया बल्कि बैंक में किया वो लोग बेवकूफ है। उन के पास बस लूट में हिस्सेदारी के लिए केवल ढाई लाख रूपये लगाने का कलेजा होना चाहिएं था फिर वो भी इस वक्त भ्रष्ट्राचार के भगवान बने हुए बिल्डरों के साथ गरीब, किसान या असहाय लोगों को लूटने के वहशियाना खेल में शामिल हो सकते थे। एक नया शब्द है जो इंग्लिश पत्रकारों में काफी चलन में है ब्लड मनी यानि खूनी पैसा इसका अनुवाद सही नहीं है आप समझ नहीं सकते है। इसको इस तरह समझा सकते है कि ऐसा पैसा जो खूनी लूट का हिस्सा हो। इन इनवेस्टर यानि निवेशकों को वहीं ब्लड मनी यानि देश के खूनी लूट में अपना हिस्सा चाहिएँ। और इस खबरों को दिखाने का अपना पुनीत कर्तव्य निबाह रहा बौना मीडिया बिल्डरों के टुकड़ों पर अपनी निगाह गढ़ाऐँ बैठा है। ये तो सिर्फ आम सीन है जो आप मीडिया की स्लेट से हट कर पढ़ कर सकते है। लेकिन इससे  आगे की कहानी भी आपको दिख सकती है।&lt;br /&gt;एक-एक इनवेस्टर यानि निवेशक ने पचास-पचास या सौ सौ से ज्यादा फ्लैट बुक कराएं हुए है। देश में इस दलाली को पनपाने वाले आर्थिक नीति के समर्थकों ने जब सबसे पहले एक परिवार को एक मकान की शर्त गायब कराई थी तब से पैदा हुई हजारों लाखों करोड़ की रकम ने लगभग करो़ड़ के पार ऐसे नये अमीर पैदा कर दिये थे जो ऐसे लूट में बिल्डरों की ढ़ाल बन कर इस साजिश को कामयाब करते रहते है। ये ट्रिकल डाउन थ्योरी की नाजायज औळाद है जो हिंदुस्तान में गरीब आदमी के लिए रोटी से दूर करने में अपना योगदान दे रही है।&lt;br /&gt;जाति के ठेकेदार से राजनेताओं में तब्दील लुटेरों का गठजोड़ और पर्दे के पीछे छिपे नौकरशाहों के दिमाग के सहारे किसानों की जमीने रातो-रात बिल्डरों के हाथों में पहुंच रही है। किसी मीडिया हाउस को नहीं दिखा कि कैसे हजारों एकड़ जमीन का लैंड यूज पलक झपकते ही बदल गया। ऐसा नहीं कि किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई। मीडिया में बहुत से रिपोर्टरों को इसका हाल मालूम था लेकिन या तो चैनल और अखबार ने छापा नहीं या फिर रिपोर्टर ने अपने लिए कुछ इंतजाम कर लिया। फिर ये खेल शुरू हुआ। फिर बिल्डरों को एक और सहूलियत दी गई कि आप जमीन का पैसा दस साल में दस किस्तों में दें सकते हो। यानि जमीन के लिए सिर्फ दस परसेंट और नेताओं की रिश्वत का पैसा देना था बाकि अरबों रूपये के बारे-न्यारें। इनमें से कई बिल्डर्स के पुराने प्रोजेक्ट अभी अधूरे पड़े हैं लेकिन नोएडा एक्टेंशन में तो लूट की आंधी थी लिहाजा पहले इसके आम अपनी टोकरी में डाल लेने थे बाकि तो अपने बगीचे में फल है ही। इसी तर्ज पर लूट चल रही थी। बैंकों ने धड़ा-धड़ लोन करने शुरू कर दिएं एक ऐसी जमीन पर जिसका पूरा पैसा तो असली मालिक ने भी नहीं चुकाया था। इस लूट में जिनता आप गहरा उतरते है उतनी ही आपकी आंखें हैरत से फटती चली जाती है। ये लूट केन्या,सोमालिया और रवांडा जैसे देशों को भी शर्मा सकती है। नौकरशाह और टके के कबीलाईं नेता ने लूट को इस तरह से अंजाम दिया कि कोई भी कानून शर्मा जाएं।&lt;br /&gt;रही बात बिल्डरों की तो उनका खेल साफ है। पैसा किसी कीमत पर नहीं देना है। लूट के लाखों करोड़ रूपये को हजम करने के बाद उसको उगलना एनाकोंडा के लिए आसान होगा लेकिन बिल्डरों से निकलवाना काफी मुश्किल है। लूट में दुनिया के इतिहास में अपनी जगह दर्ज करा चुके यूपी के नौकरशाहों और राजनेताओं के गठजोड़ से एक भी रूपया रिश्वत वापस नहीं होंगी। तब वो क्या करेंगे। रास्ता साफ है मीडिया का हल्ला साफ है। आप को दिख रहा है कि ये इनवेस्टर के हक की बात कर रहा है। ऐसा नहीं है दरअसल मीडिया के इस हल्ले का सच है कि पैसे वापस करने के खेल में बिल्डर का साथ दे सरकार और सरकारी बैंक। यानि सरकार पैसा वापस करने में बिल्डरों का हिस्सा बटाएं और उनको कुछ बैंकों से कम दर पर ब्याज दिलादें। अब ये समझने की बात है कि ये सरकार क्या है जिसका हल्ला मीडिया मचाता रहता है। ये पैसा कहां से लायेगी। पैसा लाएंगी सड़क पर तन बेचकर रोटी खाने वाली और परिवार चलाने वाली औरतें। दिन भर दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर और साल भर मेहनत कर मिलमालिकों और आड़तियों की तिजोरियों को भरने वाले किसान। क्योंकि टैक्स लगाकर ही तो इस रकम की भरपाई हो सकेंगी। यहीं है पूरा खेल मीडिया के इस हल्ले का और इनवेस्टर्स के वेष में मार्च कर रहे लुटेरों का। इसका क्या मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट कह रहा है ये जमीनें अवैध तौर पर जुटाईं गई है लोगों की रोजी-रोटी छीनी गयी है उनसे सवैंधानिक तौर पर राहजनी की गयी है लेकिन इससे इन लुटेरों को क्या। ये तो लूट में अपना हिस्सा चाहते है। &lt;br /&gt; कहानी साफ न हो तो इसको यूं समझें कि एक अपराधी चरित्र के आदमी ने वादा किया कि वो एक लड़की को ला रहा है  उससे मुजरा कराएंगा और देह व्यापार कराएंगा। कुछ धनवान लोगों ने पैसा दे दिया। लड़की आने ही वाली थी कि खरीददार पकड़ा गया और पता चला कि वो उस लड़की को शादी का धोखा दे कर ला रहा था और किसी कारणवश उसकी पोल खुल गयी। कानून ने उससे धनवान लोगों के पैसे भी दिलवा दिएं लेकिन उनकी जिद है कि वो तो उस औरत से अब जिना करके ही मानेंगे क्योंकि उन्होंने पैसे इसी शर्त पर दिए थे कि उनकी रात रंगीन होगी। अब ये रात रंगीन करने के लिए वो आदमी यानि बिल्डर चाहते है कि उनकों रिहा कर दिया जाएं। &lt;br /&gt;एक और खबर पर आपकी नजर रहनी चाहिएं कि सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में सरकार और सबसे अहम योजना आयोग को एक पहेली सुलझाने के लिये कहा है कि कैसे 17 रूपये से ऊपर रोज कमाने वाला गरीबी रेखा से ऊपर है। यानि 17 रूपये में 2400 कैलोरी कैसे आ सकती है इसको हलफनामें बताने को कहा है। देश को अपनी बाजीगरी से अमेरिकी उपनिवेश में बदल चुके मोंटेक सिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह की जोड़ी कौन सी चाबी से इस ताले को खोलेंगी देखना दिलचस्प होगा। एक बार फिर श्रीकांत वर्मा की ये कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं।&lt;br /&gt;चेचक और हैजे से /मरती है बस्तियां/&lt;br /&gt;कैंसर से/ हस्तियां/ वकील/ रक्तचाप से/&lt;br /&gt;कोई नहीं/ मरता /अपने पाप से&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-5483671423016508333?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/5483671423016508333/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=5483671423016508333' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5483671423016508333'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5483671423016508333'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/07/blog-post_24.html' title='लुटेरों का लॉग मार्च'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-6223769929865473126</id><published>2011-07-16T08:15:00.000+05:30</published><updated>2011-07-16T08:16:55.687+05:30</updated><title type='text'>मुंबई में आतंकी हमला और युवराज का बयान</title><content type='html'>जंगल में एक आवारा राक्षस का आतंक था। लोगों ने तय किया कि राक्षस को हर रोज एक आदमी रोज राक्षस को खाने के लिए भेज दिया जाएं। इससे राक्षस भी खुश और शहर का कामकाज भी चलता रहेगा।......कहानी आगे भी है। लेकिन राहुल गांधी को सिर्फ इतना ही याद रहा। अपनी भाषा से इतर रहने के कुछ नुकसान होते है ये नुकसान भी कुछ ऐसा ही है। मुंबई में हुए बम धमाकों के बाद कांग्रेसियों के कल की सुनहरी उम्मीद यानि युवराज राहुल गांधी ने बयान दिया कि ऐसे आतंकवादी हमले रोके नहीं जा सकते। एक दो हमले तो होते रहेंगे। तब ये कहानी याद आ गयी। बस अब करना ये है कि राहुल  गांधी को अपने चाटुकार नंबर बन दिग्विजय सिंह को ये जिम्मेदारी दे सकते है कि वो देश में ऐसे लोगों की पहचान कर ले जिनको आतंकवादियों के सालाना हमले में बलि के लिए पेश करना है। उन मासूम बच्चों की तस्वीरें और उन बेसहारा रह गये बूढ़ों को राहुल गांधी अपनी मासूमियत से समझा देंगे कि देश के लिए उनके बाप या बेटों की बलि जरूरी थी। दुनिया का सबसे ज्यादा डिसीप्लीन्ड प्रधानमंत्री मुआवजें की घोषणा कर देगा। चाहे तो जनार्दन दि्वेदी और सत्यव्रत चतुर्वेदी उन बलि के बकरों को संघ का आदमी बताकर मुआवजा भी बचा सकते है। &lt;br /&gt;मुंबई पर हमले जंगल में होने वाली मौत की तरह से है। हल्ला मचा, बंदरों इधर से उधर कूदे। चिडियों ने शोर मचाया और उड़ गयी। मौत किन्हीं मासूमों को झपट्टा मार कर गायब हो गयी। जंगल शोक नहीं मनाता और न ही मुंबई। मुंबई के लोगों ने अगले दिन बाजार खोला। ट्रेनों में यात्राएं की। अपने कामकाज किये। और देश की लंबाई में सबसे बौने यानि नेशनल मीडिया के लिए बाईट्स मुहैय्या कराई। शेअर मार्किट हमेशा की तरह से ऊपर चढ़ गया। ये हैरानी की बात है कि 26/11 में भी शेअर मार्किट ऊपर चढ़ गया था। आतंकी हमले और मासूमों की मौत से शेअर मार्किट का रिश्ता देश के दलालों से देश के रिश्ते को जाहिर करता है। हमला होता है तो बयान देने का सिलसिला जारी हो जाता है। कोई भी बयान जारी करता है। और उन बयानों पर सबसे पहले नेता-राजनेता और फिर मीडिया के बौनों की बारी होती है।&lt;br /&gt;देश का गृहमंत्री बयान देता है कि पुलिस की चूक नहीं है। इंटेलीजेंस की कोई कमी नहीं। पुलिस ने 31 महीने से हमला नहीं होने दिया। बेचारे गृहमंत्री को याद ही नहीं रहा कि आतंकवादियों ने पिछले 31 महीने से देश में कई जगह हमले किये। लेकिन गृहमंत्री को पिछले कुछ दिनों से याद है तो बस 2 जी स्पेक्ट्रम में अपना नाम  न आ जाए बस यही कवायद। चिदंबरम की छवि को इस तरह से बनाया गया कि ये सुरक्षा के ताम-झाम नहीं रखते। रात दिन काम करते है। लेकिन ये छवि फाईनेंस मंत्रालय में क्या कर रही थी।&lt;br /&gt;ए राजा जब देश के लाखों करोड़़ रूपये भ्रष्ट्र बिजनेसमैन के साथ मिलकर लूट रहे थे तो ये ही चिदंबरम साहब उसको वैधानिक बनाने में जुटे है। इनके मेहनताने को खोजने में जुटी है सीबीआई और ये उसको छुपाने में। ऐसे में आपको उम्मीद हो कि ये बताएंगे कि देश को आतंकवादियों से बचाने के प्रयासो में विफलता मिली हो या न मिली हो लेकिन चिदंबरम को कानून का फंदा अपने से दूर रखने में जरूर कामयाबी मिली है।&lt;br /&gt;ये पुलिस वही है जो बेगुनाहों को पकड़ कर आतंक के केस खोल सकती है। ये वही पुलिस है जिसने मुंबई ट्रेन ब्लास्ट में जाने किन को पकड़़ कर केस खोल दिये। दिल्ली के सरोजनीनगर ब्लास्ट में पकड़ लिए हवाला डीलर और भी कई केस खोल दिये।&lt;br /&gt;आम जनता को उन अफसरों के भरोसे छोड़ दिया है जो सिर्फ जुगत भिड़ा कर मुंबई में पैसा वसूली में जुटे है। जुहू में पुलिसकर्मियों के आवास के लिए आरक्षित एक प्लाट को आईपीएस अफसरों के ग्रुप ने अपनी सोसायटी बनाकर हासिल किया उसमें मंहगें फ्लैट बनाये। और इसके बाद सबको किराये पर दे दिया। बिल्डिंग का ग्राउंड फ्लोर एक निजि कंपनी को दिया है। लगभग 72 लाख रूपये महीना किराये पर। 36 फ्लैट बने है जिनमें हर फ्लैट ऑनर को लगभग दो लाख रूपये महीना मिला। इसके अलावा उन फ्लैटों में रहने वाले देश के आईपीएस अफसरों ने फ्लैट किराएं पर दे दिये और खुद सरकारी फ्लैट में गरीब जनता का खून चूस रहे है। ये खबर किसी चैनल को नहीं दिखाई दी। एक न्यूज पेपर में दिखा कि कुछ अफसरों को महीने में लगभग चार लाख रूपये महीना भी मिल रहा है। ऐसे ही फ्लेट में रह रहे है महाराष्ट्र के राजा आईपीएस। इनमें से कोई आईजी है कोई डीआईजी कोई एडीजी इन्हीं के कंधों पर है देश की जिम्मेदारी। कोई भी साफ चैक कर सकता है कि कैसे ये अफसर लुटेरों को मात दे रहे है। लेकिन कानून में इन लोगों को देश का तारणहार बनाया गया। बिना किसी जिम्मेदारी के बस लूट ही लूट। जितना चाहे लूट लो। हैरानी है कि इस सोसायटी में उन आईएस अफसरों को भी शामिल किया गया है जिन-जिन के हाथों से सोसायटी की फाईल गुजरी। &lt;br /&gt;रही बात बौने मीडिया के लोगो की। आप सिर्फ किसी एक चैनल को लगातार देखते रहे। दो दिन तक उसकी खबरों को लिखते रहे या फिर रिकार्ड करते रहे। फिर आप देखेंगे कि पहले दिन जिस तरह मुंबई रो रही थी उनके शब्दों में अगले दिन वही मुंबई हौसला दिखाती है। कैसे दिखाती है मुंबई अपना हौंसला ये भी जान लीजिये उनके शब्दों में अपना रोज का काम करके। यानि घर में लाशें पड़ी हो और बेटा जाकर दुकान खोल ले तब उसको नालायक बताते है ये लोग-लेकिन वहीं मुंबई के बेमुरौव्वत लोग अपने घर में पड़ी लाशें से बेशर्मी से दूरी बनाते हुए अपने काम पर चलते है रोजाना- ये हौसला है तो वाकई काबिले तारीफ हौसला है। बाकि दुनिया में मैंने कभी नहीं देखा कि ऐसा हौसला कोई दूसरा नहीं दिखाता।&lt;br /&gt;दरअसल ये देश का आतंकवाद के प्रति नजरिया है। जो चाहता है सिर्फ वहीं रोएँ जिनके मर गये है। बाकि के लिए या तो वो बेचारे है, कुछ जिंदा बाईट्स और टीआऱपी है या फिर कुछ के लिए वोट है। अगर मुंबई के लोग एक दिन जिंदगी थाम ले। सड़क पर निकल कर मरने वालों के लिए दो बूंद आंसू बहा दे तो शायद उसको इस का मर्म मिल जाए कि क्यों जूता और जबान एक हो गयी है नेताओं की। &lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह के बयान पर नजर डाल लो-सरकार सक्षम थी और उसने बहुत दिन तक आतंकवादियों का मंसूबा फेल रहा। ऐसे में ये विलाप ऐसा ही लगता है जैसे किसी की बेटी के साथ रेप हो जाएँ और वो आदमी इस बात के लिए खुश हो रहा हो कि चलो वो नाना तो बन जाएंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-6223769929865473126?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/6223769929865473126/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=6223769929865473126' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6223769929865473126'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6223769929865473126'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/07/blog-post_16.html' title='मुंबई में आतंकी हमला और युवराज का बयान'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-5522183785806935262</id><published>2011-07-10T21:23:00.000+05:30</published><updated>2011-07-10T21:27:22.174+05:30</updated><title type='text'>बौनो का कोरस-लोकतंत्र का संकट</title><content type='html'>मेरे लोगो:&lt;br /&gt;दुख से समझौता न करना-वरना दुख भी कड़वाहटों की तरह&lt;br /&gt;तुम्हारे जायके का हिस्सा बन जाएंगा&lt;br /&gt;तुम दुख के बारे में गौर करना.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लोगो,&lt;br /&gt;दुख को जब पहचानोंगे तो उसका कर्ज उतारोगे.................... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस समय देश में लूट का महोत्सव जारी है। कोई भी मंत्री अरबपति से कम नहीं है। खुली लूट है। कोई पूछने को तैयार नहीं है। समापन यूं ही चल रहा है आजकल हर आम आदमी की बातचीत का। प्रदेश हो या फिर केन्द्र सरकार पूरी तरह से लूटने में लगी है। कोई भी पॉलिसी ऐसी तैयार नहीं हो रही है जिसमें देश की दो तिहाई आबादी का दर्द या उसका अक्स दिखता हो। हां प्रोजेक्ट रोज पास हो रहे है। एक चीज ओर दिखती है कि रोज प्रोजेक्ट की कॉस्ट में ईजाफा होता जा रहा है। पहले एक हजार करो़ड़ का प्रोजेक्ट होता था तो बड़ी बात होती थी। आज छोटे से छोटे राज्य में पांच-से पचास हजार करोड़ के प्रोजेक्ट पास हो रहे है। देश में बहस जारी है कि लोकपाल बिल कैसा हो। संसद में भूमि अधिग्रहण कानून किस रूप में पास हो। बाबा रामदेव और उसके साथी आचार्य बालकृष्ण किस तरह से ढ़ोंगी है। योगी होकर भी राजनीति करते है। संसदीय लोकतंत्र को खतरा बढ़ता जा रहा है। इस तरह के वक्तव्य रोज जारी कर रहे है सरकार के प्रवक्ता। देश का बौना माफ करना नेशनल मीडिया इस को कवर कर रहा है। मीडिया की इस भेडिया-धसान में किसी भी विदेशी को लग सकता है कि देश में एक सरकार है जो रोज उपद्रवियों से जूझ रही है। मंत्रियों को एक ऐसे विपक्ष से सामना करना पड़ रहा है जो सरकार के खिलाफ विदेशों से पैसा ले रहा है। बाबा और सिविल सोसायटी नाम की संस्था लोकतंत्र पर कब्जा कर इसे विदेशियों के हवाले करना चाहती है। लेकिन देसी आदमी को हैरानी हो रही है कि आखिर लाखों करोड़ का बजट चलाने वाली सरकार को एक बाबा और उसके चेलों या फिर सिविल सोसायटी जैसे संगठनों से निबटने के लिए रोजाना अंत्याक्षरी करने की क्या जरूरत है।&lt;br /&gt;आप को समझना है। मीडिया में अंत्याक्षरी से बाबा रामदेव टीआरपी बनाता है। अन्ना हजारे सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से का बायस बनता है। लेकिन हकीकत ये लगती नहीं है। दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के एक मंदिर में घर बना कर रहने वाले अन्ना हजारे में और महात्मा गांधी में हजारों जन्मों का नहीं तो सैकड़ों जन्मों का अंतर जरूर होगा। अपने हर भाषण में भगतसिंह और सुभाष चन्द्र बोस का नाम लेने वाले रामदेव में और देश के लिए मरमिटने वाले क्रांतिकारियों में जमीन और आसमान से भी ज्यादा फर्क होगा। फिर ऐसा क्या है कि सरकार इन सबको उतना चढ़ा रही है। कारण साफ है देश में ऐसा कुछ चल रहा है जिसको सरकार छुपा रही है और अपने इशारे पर नाचने वाले बौनों के सहारे छोटी-छोटी घटनाओं को इतना बड़ा दिखा रही है कि आप इधर-उधर देखने की बजाय सिर्फ अंत्याक्षरी देंखें।&lt;br /&gt;सालों तक रिटेलिंग में आने को बेकरार विदेशी कंपनियों को इक्यावन फीसदी निवेश की अनुमति दे दी गई। अमेरिका से एक दो दस नहीं बल्कि पचास हजार करोड़ रूपये के रक्षा सौदे कर लिए गए। परमाणु ऊर्जा पर समझौते के लिए जो सपने दिखाएं गये थे वो एक-एक करके झूठे साबित हो रहे है। कभी परमाणु सौंदे का विरोध करने वाले और न दिखने वाले पर आसानी से समझ में आने वाले कारणों से बाद में सरकारी भोंपू बन कर इस सौदे को अंजाम देने वाले काकोदकर भी कह रहे है कि देश पर दबाव डाल रही है विदेशी ताकतें।  कावेरी बेसिन में हजारों करो़ड़ रूपये के फायदे के सौदे देश के सबसे बड़े भिखारी(माफ करना अमीर) अंबानी की झोली में डाल दिये गए। &lt;br /&gt;सरकार को इस बात से कतई खतरा नहीं है कि एक लोकपाल बन जाएंगा। क्योंकि कोई भी लोकपाल इस देश के मौजूदा संविधान के अंदर कभी वोट बटोरने वाले राजनेता को अंदर नहीं कर पाएंगा। ये धुव्र सत्य है। ये थामस की तरह से एक और सफेद हाथी साबित होगा। एक ऐसा हाथी जिसके खाने का इंतजाम सोनागाछी, कमाठीपुरा या फिर दिल्ली के जीबी रोड़ पर रोटी के लिए तन बेचने वाली औरते अपने पैसे से करती रहेगी। कई आईएस अफसरों के लिए नया ठिकाना बन जाएंगा। हजारों कर्मचारियों के लिए नौकरी का रास्ता खुल जाएगा। लोकपाल की मांग करने वाली सिविल सोसायटी के नुमाईंदों को देखने भर से लग जाता है ये किस तरह की लोकपाल की मांग कर सकते है। अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी ऐसे पद पर रह कर लौटे है जो मध्यमवर्ग के सपनों का आखिरी पड़ाव होती है यानि आईआरएस और आईपीएस। शांति भूषण और प्रशांत भूषण कई सौ करोड़ रूपये का तो टैक्स सरकार को दे चुके है। आज प्रशांत भूषण और शांति भूषण कमाना बंद कर दे तो भी सैकड़ों साल तक अपनी कार में पेट्रोल डलवा कर घूम सकते है। ऐसी उनके पास हैसियत और ताकत है। अन्ना साहब ने दोहराया कि ये अच्छे ड्राफ्ट करने के लिए जरूरी है। कोई भी कह सकता है कि बाबा जी इनसे बेहतरीन ड़्राफ्ट तो कोई क्लर्क भी कर सकता होगा जो पैसे वसूलने में बेहद दक्ष हो। हमको ड्राफ्टमैन नहीं सच्चे लोग चाहिए थे जिनको गरीबों से सहानुभूति नहीं समानुभूति हो। लेकिन ऐसे आदमी कहां से लाएं। जो राजा को नंगा कहने का साहस जुटा सके। लिहाजा ये भी सिर्फ जबानी जमा खर्च ही है। &lt;br /&gt;रही बात बाबा रामदेव की तो 1995 में हरिद्वार में दवाईयां बनाने वाले बाबा आज हजारों करोड़ रूपये के मालिक है। इस पर कोई ऐतराज किसी को नहीं हो सकता है। उन्होंने अपने कामयाब चार्टड एकाउंटेंट्स की मदद से एक ऐसा जाल तो बुन ही दिया है कि अपनी सारी ताकत और हैसियत के बावजूद केन्द्र सरकार कुछ पकड़ नहीं पा रही है। आखिर सरकार में बैठे लोगों ने बाबा के यहां लंबे अरसे तक कार्निश की है। तो अपनी उस बुद्दि का सहारा जरूर बाबा को दिया होगा जिससे वो साठ सालों से देश को लूट रहे है बाकायदा संवैधानिक तौर पर मालिक बनकर। कोई भी आदमी चार जून की रात पुलिस की असंवैधानिक कार्रवाई का समर्थन नहीं कर सकता है। जिस पुलिस कमिश्नर को किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभी जेल में होना चाहिए था वो रिटायरमेंट के बाद यकीनन किसी भी राज्य में राज्यपाल बनने की तैयारी कर रहा होगा। &lt;br /&gt;इस समय देश में सरकार को बचाने की जिम्मेदारी है कपिल सिब्बल पर। कपिल सिब्बल इस वक्त मनमोहन के सबसे करीबी मंत्री है जो संगठन से ज्यादा इस समय प्रधानमंत्री की वकालत में जुटे है। लेकिन कई भारी-भरकम मंत्रालय संभाल रहे कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट के नामी-गिरामी वकील है। अपनी वकालत के कैरियर में उन्होंने कितने गरीब लोगों के लिए केस लड़े है और कितनी पीआईएल में वो पार्ट रहे है अगर पता करेंगे तो पता चलेगा कि एक भी नहीं या फिर आपके हाथ में उंगलियां ज्यादा होगी उनकी सहभागिता के केस कम होगें। वो देश की क्या सेवा कर रहे थे कि मंत्रीमंडल में उनको शामिल किया गया। उनका सार्वजनिक जीवन में इतना ही योगदान है कि उन्होंने अमीर और बड़े लोगों के करप्शन में उनका बचाव किया कानून की बारिकियां निकाल कर जिस कानून को बनाया गया था कमजोर और गरीब लोगों की रक्षा के लिये। यही एकमात्र योग्यता थी उनकी सरकार में शामिल होने की। क्योंकि उनको ये अच्छी तरह से मालूम है कि ताकत कहां है लिहाजा उसका फायदा उठाना आता है। किसी पानीदार आदमी से कहों कि आपने पंचायत में झूठ बोला था तो वो शर्म से गर्दन नहीं उठाएंगा। लेकिन इनको महारथ हासिल है झूठ बोलने में उसको दोहराने में और फंस जाने पर फिर कोई नया झूठ बनाने में। आखिर सीएजी में इन्होंने किस गणित से राजा की रक्षा की। इनके मुताबिक तो कोई नुकसान हुआ नहीं था देश को तो फिर इनके होते हुए राजा जेल में क्यों है। सीबीआई चार्जशीट क्यों कर रही है। इनकी आत्मा जरूर दुख रही होगी अमीर लुटेरों को जेल जाते देख कर। अब एक नयी कहानी सामने आई है रिलाइंस इन्फोकॉम को जुर्माने में राहत देने संबंधी। सच में झूठ बोलने वाले कपिल सिब्बल को बचाव नहीं सूझा तो बौनों को ही सलाह देने लगे कि सही तरह से कवरेज करें। किस तरह से कवरेज करे भाईसहाब बता दे। रिलायंस पर जुर्माना बढ़ाने की बजाय घटाने की तारीफ करे। जीं हां यही लूट का अर्थशास्त्र है जो देश में इस समय चल रहा है। कभी कोई ये कह सकता है कि कानून की इन बारीकियों को लिखा गया था अमीर लोगों को गरीबों का खून चूसने देने के लिए या फिर देश के उस सबसे गरीब आदमी की महाजनों से सुरक्षा के लिए।&lt;br /&gt;और अब कपिल सिब्बल को लग रहा है कि लोकतंत्र खतरे में है। क्योंकि बौंनों के कौरस में भी देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग जाग रहे है। सवाल कर रहे है और उनको किसी अन्ना के लोकपाल या फिर रामदेव के योग की नहीं सिर्फ जाति औऱ क्षेत्रवाद के खोल से बाहर निकल कर लुटेरों की पहचान करनी है। इसी खतरे की ओर इशारा कर रहे है देश के सबसे जहीन और महीन मंत्री कपिल सिब्बल साहब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं क्यों लेकिन मन कह रहा है कि पाकिस्तान की एक अनजान सी कवियत्री की उपर की पक्तिंयों को पूरा पढ़ना चाहिएँ...&lt;br /&gt;  मेरे लोगो&lt;br /&gt;दुख के दिनों में सूरज के रस्ते पर चलना&lt;br /&gt;उसके डूबने-उभरने के मंजर पर गौर करना&lt;br /&gt;मेरे लोगो झील की मानिंद चुप न रहना&lt;br /&gt;बातें करना,चलते रहना , दरिया की रवानी बनना&lt;br /&gt;मेरे लोगो&lt;br /&gt;दुख से कभी समझौता मत करना, हंसते रहना&lt;br /&gt;दुख के घोड़े की लगामों को पकड़ हवा से बाते करना &lt;br /&gt;ऊंचा उड़ना.....&lt;br /&gt;शाहिस्ता हबीबी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-5522183785806935262?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/5522183785806935262/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=5522183785806935262' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5522183785806935262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5522183785806935262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='बौनो का कोरस-लोकतंत्र का संकट'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-748162734712554416</id><published>2011-06-23T08:36:00.003+05:30</published><updated>2011-06-23T09:26:00.149+05:30</updated><title type='text'>मोंटेक और मनमोहन के अमीर की मौत</title><content type='html'>नेशनल हाईवे 58 से गुजर रहा था। सड़क के किनारे यातायात रूका हुआ था और भीड़ थमीं हुईं थीं। सुबह के आठ बजे थे। कार से उतर कर देखा तो एक बुजुर्ग महिला बेसुधी के आलम में रो रही थी। बुजुर्ग औरत ने अपनी धोती के पल्ले से एक लाश का चेहरा ढ़का था। लाश का चेहरा नहीं दिख रहा था। बराबर में एक टुटही साईकिल पड़ी थी। बुजुर्ग महिला लाश को अपना बेटा लाल और जिगर का टुकड़ा कह कह कर बेहोश हुई जा रही थी। थोड़ी सी दूरी बनाकर कुछ सिपाही और एक सब इंस्पेक्टर हाथ में डायरी लेकर बस खड़े थे। कुछ देर बाद एक पुलिस वाले ने मजदूर की जेब में हाथ डालकर एक काली सी छोटी डायरी और उसमें कुछ हिसाब लिखे पन्ने निकाले। जेंब में चंद सिक्कों के अलावा कुछ भी नहीं था। पूछने पर मालूम हुआ कि ये एक मजदूर था। जो यूपी के पूर्वी हिस्से से इधर गाजियाबाद मजदूरी करने आया था। उसको यदि काम मिलता था तो रोज 110 रूपया मिलता था। तब लगा कि अरे ये तो देश के एक गरीबी रेखा से उपर के आदमी की लाश है। एक ऐसे आदमी की लाश है जो मोंटेक सिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह की गरीबी रेखा के फार्मूलें को पार कर चुका है। ये तो एक अमीर आदमी की लाश है। जिस पर रोने के लिए एक भूखी, बीमार और उम्रदराज महिला के अलावा कोई नहीं है। उसको घर तक ले जाने के लिए व्यवस्था नहीं थी। उस अमीर आदमी के हाथों में सड़क के किनारे अमीर बनाने वाले पत्थरों की बनी सस्ती अंगूठियां थी। हाथों में गंडें और ताबीज भी बंधें थे। और एक प्यार करने वाली मां की दुआएं भी उसके साथ थी। लेकिन इन सबके बावजूद मोंटेक सिंह अहलूवालिया या इस देश के वित्त नीति के नियामकों की लाईं गयी नीतियों को नहीं हरा पाया। वो मौत के जाल में फंस गया। भूख और कुपोषण के चलते अकाल मौत के रास्ते चला गया। ये एक नये भारत के सपने के अंदर की एक छोटी सी तस्वीर है। ये उस भारत की तस्वीर है जिसने हाल ही में अमेरिका को कई अरब डॉलर दिए है सिर्फ युद्ध में काम हाने वाले हवाईजहाज हरक्यूलीस के सौंदे के लिए। ये उसी भारत का मोंटेकसिह अहलुवालिया का अमीर था जिसने हजारों करोड़ के सौंदे अभी रक्षा के लिए किये है। ये उसी भारत की तस्वीर है जिसने अभी कॉमनवेल्थ करा कर पूरी दुनिया में अपना डंका बजाया है। कई बार लगता है कि पता नहीं ये मजदूर मरने से पहले ये भी जान पाया है कि नहीं कि देश चन्द्रमा पर अपना चन्द्रयान भेजने वाला है। लेकिन ये तो मर गया। एक दो दस नहीं हजारों लोग रोज मर रहे है बिना मनमोहन सिंह के सपनों के जाने बिना। क्या कोई रास्ता है इन लोगों को मरने से पहले ये बताने का कि पूरी दुनिया में उनकी ताकत, हिम्मत और तरक्की की मिसाल दी जा रही है। दुनिया में अब वो महाशक्ति है। अमेरिका का राष्ट्रपति भी रोज उनका नाम लेता है और हाथ जोड़ कर अमेरिकियों की नौकरी बचाने की गुजारिश करता है। लेकिन इसमें एक गड़बड़ जरूर है कि इस मर गएं मजदूर का नाम तो मोंटेक सिंह को भी नहीं मालूम और मुझे भी नहीं मालूम तो दुनिया इसे किस नाम से धन्यवाद दे रही है इसका लोहा मान रही है ...पता नहीं।&lt;br /&gt;देश का वित्त मंत्री का ऑफिस बग्ड हो रहा है। पहले ऐसी खबर आती है। फिर पता चलता है कि दस महीने पहले की घटना है। फिर नया खुलासा होता है आईबी से पहले किसी निजि जासूसी एजेंसी को बुलाकर दिखा दिया गया। फिर तार जुड़ते है और मुड़ जाते है गृहमंत्रालय की ओर। यानि देश के एक मंत्री की जासूसी दूसरा मंत्रालय कर रहा है। बात खुलती है या खोल जाती है मालूम नहीं। हल्ला हो जाता है। तब वित्त मंत्री ऐलान करते है नहीं जासूसी नहीं च्यूंईंगम चिपगाई गयी थीं। और आईबी ने कहा था कि कुछ गंभीर नहीं है। आईबी गृहमंत्रालय के अंडर आती है। &lt;br /&gt;एक नया चिट्ठी आती है सीएजी से। देश के पेट्रोलियम मंत्रालय ने मुकेश अंबानी को दिए गएं के जी बेसिन के ब्लॉक नंबर 6 में हजारों करोड़ की रकम फालतू लगाकर खोज की और कुएं मुकेश को हैंडओवर कर दिए। ये रकम हजारों में करोड़ है। कभी जनमोर्चे के ईमानदार रहे बेचारे जयपाल रेड्डी का कहना है ये तो सीएजी का पहला ड्राफ्ट है अभी जल्दी न करें। हां जयपाल रेड़्डी जी को मालूम है उनके पहले मंत्रालय की निगरानी में हजारों करोड़ रूपये के कॉमनवेल्थ में कैसे बाद के ड्राफ्ट तैयार हुए है। इसका भी हो जाएंगा।&lt;br /&gt;फिर एक खबर आती है कि देश के निजि हो या सरकारी सभी बैंकों ने अपनी तय लिमिट से आगे जा कर मुकेश अंबानी और उनके भाई अनिल अंबानी को हजारों करो़ड़ में कर्ज दे दिए। खबर बस यही तक आती है आरटीआई के हवाले से। इसके बाद खबर कही नहीं है। अरबों रूपये दे दिये गए इन दोनों भाईयों की कंपनियों को। ऐसा क्या है इनमें जो उस रोज के 110 रूपये कमाने वाले अमीर आदमी में नहीं था जो सड़क पर मर गया। मुकेश और अनिल अंबानी और कोई नहीं बल्कि देश के वित्त चाणक्य मोंटेक सिंह अहलूवालिया और अपनी ईमानदारी का परचम ओढ़े घूमने वाले मनमोहन सिंह के गरीब आदमी है। इन लोगों के कल्याण के लिए सरकार रात-दिन अपने को हलकान किये हुए है। अरबों रूपये के घोटाले, लोन और काली कमाई से भी इनका पेट नहीं भर रहा है। सरकार पूरी तरह से हैरान है हालांकि साउथ ब्लॉक और नार्थ ब्लॉक के गलियारों में घूमने वाले दलाल और पत्रकार आपको आसानी से गिनवा देंगे कि मौजूदा वित्तमंत्री किस भाई से डिक्टेशन लेता है और पुराना वित्तमंत्री किस भाई से डिक्टेशन लेता था।&lt;br /&gt;भूख से थके बड़े भाई मुकेश ने तो सात हजार करो़ड़ रूपये का घर बनवा लिया है।ताकि भूख से निजात मिले। इसके लिए वक्फ की जमीन में घपला करने के आरोप लोग उन पर लगाने लगे। अंबानी मायने क्या है भाई ये तो लोग भूल ही जाते है। &lt;br /&gt;एक सरकार है जिसके मंत्री इस वक्त लोकपाल के मुद्दे पर लगे हुए हैं। कोई कहता है कि प्रधानमंत्री इसके अंदर आएंगे ही नहीं कभी कोई कहता है कि आम जनता तानाशाही कर रही है। दोनों ही समूह लोकपाल बनाने की नूराकुश्ती में लगे है लखनऊ के बांकों की तरह। दोनों ही समूहों में कोई भी ऐसा नहीं है जो उस नेशनल 58 पर गुमनाम की तरह मर गएं मजदूर की तरह अमीर हो। ये तमाम लोग खाएं-पिएं और अघाएं हुए लोग है। खेल चल रहा है सरकार खेल रही है। पर्दे पर दिख रहे बौंनों और जादूगरों के पीछे हंस रहे है सरकार के गरीब और सड़क पर आवारा कुत्तें से बदतर मौंत के शिकार हो रहे है मोंटेक और मनमोहन सिंह के नायाब फार्मूले से बिना कुछ भी कमाएं भूक्खड़ों से निकल कर नएं बने अमीर।&lt;br /&gt;हां एक बात और पुलिस उस मजदूर की लाश को घर भेजने के लिए न कोई गाड़ी मंगा रही थी न किसी कफन का इंतजाम कर रही थी। एक ऐसे इंसान के लिए कुछ करना पुलिस की भी बेईज्जती होती जिसकी जेंब से उसे कुछ भी नहीं मिला। &lt;br /&gt; देश के बकता नेता और सत्तारूढ़ पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की मौत पर बयान दिया था कि कि मरने के बाद ओसामा बिन लादेन जी का संस्कार धार्मिक रीति-रिवाजों और सम्मान से होना चाहिएं था। लेकिन ये यूपी है और माया की पुलिस इस मनमोहनी अमीर पर चार लीटर मिट्टी का पेट्रोल और पांच गज कफन का टुकड़ा क्यों बर्बाद करें..दिग्गी भी तो हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-748162734712554416?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/748162734712554416/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=748162734712554416' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/748162734712554416'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/748162734712554416'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_23.html' title='मोंटेक और मनमोहन के अमीर की मौत'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-4439030204231669377</id><published>2011-06-12T19:22:00.001+05:30</published><updated>2011-06-12T19:28:47.726+05:30</updated><title type='text'>रामलीला मैदान में यूपी का दंगल</title><content type='html'>पुरानी कहानी है कि एक ठग को दिल्ली के दरबार में पेश किया गया। राजा ने पूछा कि बता क्या खाओंगे 100 कोड़े या फिर 100 प्याज। ठग को लगा कि कोड़े खाने से बेहतर है कि प्याज खा ली जाएं। प्याज खाना शुरू हुआ और पांच दस प्याज के बाद ही ठग की हिम्मत जवाब दे गयी और वो चिल्लाया कि मुझे कोडे़ लगा दो।उसको कोड़े लगाने शुरू किये कि पांच-सात कोड़ों के बाद ठग चिल्लाया कि मुझे प्याज दे दो। फिर से प्याज खाना शुरू किया और कुछ देर में ही फिर से कोड़े मांगने लगा। कहानी का अंत तो इस तरह से हुआ कि ठग ने 100 प्याज भी खायें और कोड़े भी।&lt;br /&gt;यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी के नेता इस कहानी को दोबारा से देश को दिखा रहे है।&lt;br /&gt;लोकतंत्र को बचाने के नाम पर रात में सोते हुए लोगों पर ये बर्बर लाठीचार्ज किसी लोकतांत्रिक आस्था को हिला सकता है। लेकिन कांग्रेस सरकार के मंत्रियों और पार्टी के नेताओं ने इस के समर्थन में बेशर्मी से बयान दे रहे है। मीडिया के तमाम समर्थन के बावजूद सरकार या पार्टी ऐसा कोई सबूत नहीं दे पा रही थी जिससे लोगों को उनकी बातों पर यकीन हो। लेकिन फिर भी यूपीए के लोग इस पर टिके हुए है। कांग्रेस के बकता महासचिव दिग्विजय राष्ट्र को संघ के हमलों से बचाने के लिए इस लड़ाई को आखिर तक लड़ने की बात कर रहे है। लेकिन कोई भी आदमी इस बात को देख सकता है कि जो फ्रेम में जड़ा जा रहा है उस फोटों के लिए ये फ्रेम नहीं बनाया गया है। आखिरकार कारण क्या है कि जो पार्टी अपने उपप्रधानमंत्री प्रणवमुखर्जी सहित देश के सबसे योग्य मंत्री कपिल सिब्बल को स्वामी रामदेव से मिलने एअरपोर्ट भेजती है वही अगले दिन उसे ठग साबित करने जुट जाती है। रात में पचास हजार लोगों पर लाठियां भांजती पुलिस भेजती है। ऐसा सिर के बल खड़ा होने वाला करतब दिखाने के लिए पार्टी ने अपने को कैसे तैयार किया। जनसमर्थन से पैदल दिग्विजय सिंह एकाएक पार्टी के रणनीतिकार में कैसे तब्दील हो गये। कैसे कपिल सिब्बल अपना वाक्-चातुर्य खोकर एक उलट बांसी सुनाने लगे। एक योगी योग करे राजनीतिक आसन न सिखाएं। खुद सालों तक बेचारे कपिल सिब्बल सिर्फ वकालत करते रहे। लेकिन अब दोनों कर रहे है टेलीकॉम राजा से कागज के प्रधानमंत्री की वकालत तक। सब लोगों को अचानक दिखने लगा कि संघ इस तरह की आग भड़का रहा है। पहले स्वामी रामदेव का मुखौटा इन लोगों को दिखा फिर अन्ना हजारे को भी यूपीए के मंत्री वहीं मुखौटा पहनाने में जुट गए। एक दिन पहले पैर छूने वाले अचानक पैर पकड़ कर कैसे पटक कर मारने वाले बन गए। &lt;br /&gt;इस सवाल का जवाब आपको दिल्ली में नहीं लखनऊ में मिलेगा। यूपीए को हालिया लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश में चुनावी कामयाबी मिली थी उसने पार्टी को सेर से सवा सेर में तब्दील कर दिया। लेकिन उसके बाद युवराज राहुल की मेहनत की उनकी पार्टी के हवाई नेताओं ने हवा निकाल दी। पार्टी न अपना अध्यक्ष बदल पायी न ही माया से परेशान अपने कार्यकर्ताओं को कोई ठोस उम्मीद। कोढ़ में खाज वाली बात रही मुलायम सिंह का वापस मैदान में उतर कर फिर से ताल ठोंकना। दलाल की उपाधि से नवाजे गए अमरसिंह की पार्टी से बर्खास्तगी के बाद सपा अपने पुराने स्वरूप  में वापस आने की जी-तोड़़ कोशिश में जुट गयी। मुस्लिमों को अपने साथ जो़ड़ने की मुहिम में मुलायम को अप्रत्याशित कामयाबी मिल रही है। और यही वो कुंजीं है जो रामलीला मैदान में हुई रावणलीला का ताला खोल सकती है। &lt;br /&gt;कांग्रेस के अफलातूनी दिग्विजय सिंह जो मध्यप्रदेश में पार्टी को खत्म कर उत्तर प्रदेश के इंचार्ज बने है ने ये बात युवराज राहुल जी के दिमाग में उतार दी कि यूपी में जीत की कुंजी मुस्लिम वोटों के पास है। अगर रामदेव नाम के एक संयासी और स्वघोषित योगसम्राट जो जाति ये यादव भी है हमला बोला जाएं तो कोई संकट नहीं है। इसका राजनीतिक फायदा काफी है। इस योजना में दिग्विजय सिेंह को मदद मिली होंगी राहुल के आंख-नाक और कान यानि कनिष्क सिंह और भंवर जितेन्द्र सिंह के बिरादराना सहयोग से। पार्टी की मीटिंग्स में सोनिया को डराने के लिए ये बताना काफी था कि जितनी सीट यूपी में लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली थी उतनी संख्या भी विधानसभा चुनाव में नहीं छू पाएंगी। और यदि ऐसा हुआ तो युवराज राहुल की छवि को काफी नुकसान होगा। राहुल कांग्रेस के पूरे देश में नायक है लेकिन यूपी में तो वो कांग्रेसी सेना के घोषित कमांडर है। ऐसे में राहुल का मिशन प्रधानमंत्री भी खटाई में पड़ सकता है। अपने काम से ज्यादा कमजोर और दिशाहीन विपक्ष की बेवकूफियों के चलते सत्ता की मलाई काट रहे कांग्रेसियों को इससे ज्यादा कोई नहीं डरा सकता कि उनकी सत्ता की उम्मीद राहुल फेल हो सकते है। बस इस बात ने पूरी पार्टी को अपनी ही आत्मा के खिलाफ एकजुट होने के लिए मजबूर कर दिया। हो सकता है इस बारे में बहुत से ज्ञानियों को ये लग सकता है कि मुसलमानों के वोट को लेकर इतना दांव क्यों खेल रही है कांग्रेस तो उनको असम और केरल में हुए चुनावों के रिजल्ट पर निगाह डाल लेनी चाहिए।&lt;br /&gt;पहली बार किसी राष्ट्रीय अखबार ग्रुप(टाईम्स ग्रुप) ने मुसलमानों में वोटिंग में धार्मिक पार्टियों को एक मुश्त दिये गये वोट पर चिंता जाहिर की। लेकिन अपना कोई रिश्ता इस चिंता से नहीं है। कांग्रेस को जिस तरह की सफलता असम में जिस तरह से यूडीएफ और केरल में मुस्लिम लीग को वोट किया गया उससे अखबार ने चिंता जाहिर की थी कि मुस्लिमों सेक्यूलर पार्टियों की विश्वनीयता खत्म हो रही है। इस बात से हमारा कोई सरोकार नहीं है लेकिन यहीं वो आंकडां है जो कांग्रेस पार्टी में लोकतंत्र समर्थकों को अपनी जुबान बंद करने के लिए मजबूर कर रहा है। पार्टी ने अब पूरी तरह से मन बना लिया है क्यों कि वो जानती है यूपी में उसके पास हिंदुओं का कोई भी ऐसा वोट बैंक नहीं है प्रतिक्रिया में भारतीय जनता पार्टी को मिल जाएंगा। लेकिन मुस्लिम ने अगर पीस पार्टी जैसी छोटी पार्टियों और समाजवादी पार्टी जैसी एक परिवार की पार्टी को वोट दे दिया तो कांग्रेस के युवराज को राजनीतिक तौर पर दीवालिया होते देर नहीं लगेगी। ऐसे में कांग्रेस ने अपने पर वापस इमरजेंसी के रोल में लौटने में गुरेज नहीं किया। हालांकि देश को इसकी कीमत काफी चुकानी पड़ेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-4439030204231669377?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/4439030204231669377/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=4439030204231669377' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/4439030204231669377'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/4439030204231669377'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_9537.html' title='रामलीला मैदान में यूपी का दंगल'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-53162017648995259</id><published>2011-06-12T15:26:00.000+05:30</published><updated>2011-06-12T15:32:03.957+05:30</updated><title type='text'>यूं तो मैं बोल सकता था</title><content type='html'>यूं तो मैं कह सकता था,&lt;br /&gt;कि ये आवारा भीड़ नहीं है&lt;br /&gt;मुझे बोलने से पहले सोचना नहीं था&lt;br /&gt;इस भीड़ में कोई खतरा नहीं है.&lt;br /&gt;या ऐसा ही कुछ &lt;br /&gt;ये दीवानों का जमावड़ा &lt;br /&gt;तोड़ सकता है &lt;br /&gt;बनी-बनाईं व्यवस्था&lt;br /&gt;मेरे पास लाईंने थीं &lt;br /&gt;सीखें गएँ शब्द थे&lt;br /&gt;मेरे पास कलम भी थी &lt;br /&gt;और पेपर भी&lt;br /&gt;मुझे लिखना था &lt;br /&gt;और फिर उसे छाप देना था &lt;br /&gt;ऐसा ही जैसा मुझे बताया गया&lt;br /&gt;लेकिन मेरी आंखों में दर्द ज्यादा था&lt;br /&gt;न मैं लिख पाया &lt;br /&gt;न मैं बोल पाया।&lt;br /&gt;यूं तो मैं बोल सकता था&lt;br /&gt;बस और मत मुस्कुराओं मेरी तरफ&lt;br /&gt;अंतर नहीं कर पाता हूं मैं&lt;br /&gt;तुमहारी इन मुस्कानों में&lt;br /&gt;ये सब तरफ  से एक सी दिखती है&lt;br /&gt;कातिल की तरफ हो &lt;br /&gt;तुम्हारा चेहरा &lt;br /&gt;या फिर कत्ल हुएं की ओर&lt;br /&gt;बंद करों इस तरह दिखना&lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;दोनों में कोई फर्क दिखाईं न दें &lt;br /&gt;बंद करो इस तरह से मुस्कुराना&lt;br /&gt;लेकिन आवाज नहीं निकली&lt;br /&gt;यूं तो मैं कह सकता था&lt;br /&gt;कि किताबों में बंद बेजान अक्षरों में &lt;br /&gt;बंद नहीं की जा सकती है &lt;br /&gt;बेसाख्ता हंसतें हुए किसी बच्चें की तकदीर&lt;br /&gt;रोका नहीं जा सकता हवा में झूमना किसी फिरकी का&lt;br /&gt;गहराईं में धरती की गोद में &lt;br /&gt;समाएं हुए किसी पेड़ की जड़ नहीं उखाड़़ सकते &lt;br /&gt;हो महज काली लाईनों को पढ़कर &lt;br /&gt;लेकिन सोच ही नहीं पाया&lt;br /&gt;यूं तो बोल सकता था&lt;br /&gt;मैं इस खेल में शामिल नहीं हूं&lt;br /&gt;बंद करों &lt;br /&gt;ये गोटियां उछालना &lt;br /&gt;जिसकी हर चाल तुमकों मालूम है &lt;br /&gt;मत छनकाओं वो सिक्के &lt;br /&gt;जिसमें दोनों ओर तुम्हारे लिए ही जीत &lt;br /&gt;लिखी हो। &lt;br /&gt;लेकिन &lt;br /&gt;मेरी जुबान सर्द है &lt;br /&gt;मैं बस देख रहा हूं तुम्हारा सिक्का, गोटियां और मुस्कानें &lt;br /&gt;मैं बिक गया था,&lt;br /&gt;तुम जानते हो मेरे डर को और मेरी कीमत को  &lt;br /&gt;बिना किसी और के ये जाने........&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-53162017648995259?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/53162017648995259/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=53162017648995259' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/53162017648995259'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/53162017648995259'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_12.html' title='यूं तो मैं बोल सकता था'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-4667872343369912736</id><published>2011-06-11T16:47:00.001+05:30</published><updated>2011-06-11T16:53:14.733+05:30</updated><title type='text'>आधी रात को आजादी</title><content type='html'>एक खामोश सी चादर शहर पर है&lt;br /&gt;बोलते हुए लोगों के ऊपर&lt;br /&gt;शहर के बीचों-बीच मारे गये लोगों की निगाह&lt;br /&gt;टिक गयी शहर में बसे हुए लोगों पर।&lt;br /&gt;हिल गये अंतस में&lt;br /&gt;डूब गयी एक आवाज को दबाने में जुट गया शहर&lt;br /&gt;आवाज जो गले से निकली ही नहीं &lt;br /&gt;लेकिन कानों में बजती रही जोर से-&lt;br /&gt;- चोर है सब&lt;br /&gt;बुरी तरह पिट कर निकले लोगों की निगाह में&lt;br /&gt;ये शहर था जहां उनकी धुंधली सी आवाज &lt;br /&gt;अपने भाईयों के लिए &lt;br /&gt;घुट गए बचपन के लिए &lt;br /&gt;और गुमशुदा जवानियों के लिए&lt;br /&gt;निकल कर-&lt;br /&gt;गले गूंज बन जाती&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;शहर में खरीद कर लाएं गये बांस के डंडों में &lt;br /&gt;रूंध कर रह गयी।&lt;br /&gt;रात के तीसरे पहर में दौड़ते वक्त&lt;br /&gt;उनको &lt;br /&gt;याद नहीं रहा &lt;br /&gt;तिंरगा जो मचान पर खंभें के बांध दिया गया था&lt;br /&gt;नहीं दिख रहा था लालकिले का वो मचान &lt;br /&gt;जिस पर पचासियों बार प्रधानमंत्रियों ने &lt;br /&gt;माईक से आवाज बढ़ा कर&lt;br /&gt;गोरों के भाग जाने का आश्वासन दिया था।&lt;br /&gt;कांपते-हाथों और जाम की चढ़ गई गर्मी से &lt;br /&gt;नर्म गद्दे में धंस कर नाराज होते हुए कहा&lt;br /&gt;नींद खराब हो जाती है &lt;br /&gt;रामलीला मैदान से आते हुए खर्राटों से&lt;br /&gt;अंधेंरे में ढूंढ़ते हुए शत्रु शिविरों का&lt;br /&gt;आग लगाकर मिटा देना है नामो-निशान &lt;br /&gt;इतना आदेश बहुत था&lt;br /&gt;सदियों के अनुभव को अपने में समेटे हुए&lt;br /&gt;वर्दी के अनुशासन को।&lt;br /&gt;उधर पुलिस पर यकीन रखने वालों को नशे के बाद हरारत हुई&lt;br /&gt;गोपीनाथ बाजार में सपने डूबी लड़की &lt;br /&gt;जीने के अधिकार को सीने से लगाएं घूम रही थी&lt;br /&gt;उठाया&lt;br /&gt;रौंदा &lt;br /&gt;फेंक दिया&lt;br /&gt;उसी जगह पर&lt;br /&gt;सफेद से लाल हो गये खून से कपड़े &lt;br /&gt;एजेंसी को शक है &lt;br /&gt;जरूर किसी संगठन से रिश्ता है इसका&lt;br /&gt;लाल कपड़े पहने &lt;br /&gt;और आंखों में सपने लिए घूम रही थी &lt;br /&gt;अकेले&lt;br /&gt;राजधानी की सड़कों पर।&lt;br /&gt;इस बीच ढोंगियों को लगा दिया&lt;br /&gt;ठिकाने&lt;br /&gt;भगा दिया सड़कों पर &lt;br /&gt;बेघर बेचारों की तरह &lt;br /&gt;सड़कों पर दौड़ते &lt;br /&gt;नींद में इधर-उधर हाथ मारते &lt;br /&gt;लोगों के &lt;br /&gt;अंदर का राक्षस&lt;br /&gt;दिख रहा था संसद &lt;br /&gt;से &lt;br /&gt;लेकर अकबर रोड़ तक &lt;br /&gt;आखिर नंगें हाथ और&lt;br /&gt;भूख के सहारे&lt;br /&gt;खतरा बन सकते थे &lt;br /&gt;हजारों लोग&lt;br /&gt;मासूम दिखने वाले &lt;br /&gt;औरतों बच्चों और बूढ़ों के चेहरे।&lt;br /&gt;बदल गया फोकस कैमरे का &lt;br /&gt;फ्रेम में चीखतें बौंनों को&lt;br /&gt;दिखाई दे रहा था&lt;br /&gt;किसी पिरामिड के गणितीय ज्ञान की तरह&lt;br /&gt;कभी लगता है कि भीड़ आवारा नहीं है&lt;br /&gt;कभी लगता है ढोंगी बाबा के पास सरकार उड़ाने के बम है&lt;br /&gt;झूठ के सहारे चलती एकाउंटिंग में &lt;br /&gt;100 के चालान से बचने के लिए&lt;br /&gt;कमिश्नर तक की कुर्सी हिलाने वाले बौंनों को &lt;br /&gt;मैंदान में मिट्टी कुचलने वाले ढ़ोंगी के भक्तों के खिलाफ&lt;br /&gt;फ्रेम बनाने थे, कलम चलानी और ढूंढने थे ऐसे शब्द &lt;br /&gt;जो संसदीय लोकतंत्र को बचाने में मददगार रहे&lt;br /&gt;इसके लिए जूता दिखाने वाले को पिटते देखने से ज्यादा &lt;br /&gt;मजा है &lt;br /&gt;खुद जूता उतार कर जूतिया दिया जाएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रमश.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-4667872343369912736?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/4667872343369912736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=4667872343369912736' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/4667872343369912736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/4667872343369912736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_11.html' title='आधी रात को आजादी'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-104257830969236875</id><published>2011-06-07T09:40:00.002+05:30</published><updated>2011-06-07T09:44:30.523+05:30</updated><title type='text'>असली ईमानदार प्रधानमंत्री है भाई</title><content type='html'>"it is unfortunate that operation had to be conducted but quite honestly, there was no altenative" ये बयान देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का है। रामलीला मैदान में रात को सो रहे औरतों और बच्चों पर बर्बर पुलिसया एक्शन के बाद का पहला बयान। ये देश के प्रधानमंत्री का बयान है। एक ऐसे प्रधानमंत्री का बयान जो अपनी योग्यता से किसी वार्ड मेंबरी या गांव में सभासद का चुनाव भी नहीं जीत सकता था। एक ऐसा प्रधानमंत्री जो बेचारा अपनी कोई राय रखता होगा इस बारे में लोगो को संदेह है। प्रधानमंत्री से एक ऐसा ही बयान चाहिए था। क्या एक ऐसा आदमी जो सिर्फ खडाऊं उठाने के लिए रखा गया था पार्टी के और अपनी ही सरकार के खिलाफ न्याय के पक्ष में खड़ा हो सकता है। नहीं कभी नहीं आम समझ और इतिहास इस बात की ताईद करता है। मनमोहन सिंह की योग्यता सिर्फ इतनी ही है कि वो कभी भी अपनी सत्ता नहीं बना सकते है और न ही देश के लोगों के दिलों मे जगह। मध्यमवर्ग के टुकड़ों पर पलने वाले बौंनों की मुहिम में मीडिया के एक वर्ग ने बेहद ईमानदार आदमी के तौर स्थापित किया था मनमोहन सिंह को। लेकिन एक ऐसा ईमानदार आदमी जो जानता है कि देश का प्रधानमंत्री पद का वो किसी भी तरह से हकदार नहीं है फिर भी बैठा है कितना ईमानदार है भाई। एक विदेशी महिला को जिसको देश की जनता ने अपने दिल में और सिर पर बैठाया सिर्फ इस लिये क्योंकि उसके साथ गांधी या फिर नेहरू खानदान का नाम जुड़ा था। इसके अलावा और कोई योग्यता इस महान नेत्री सोनिया गांधी में है ये तो बेचारे दिग्विजय सिंह भी नहीं गिनवा सकते है।&lt;br /&gt;लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है कि रात के अंधेंरे में पुलिस ने सोए हुए मासूम बच्चों, बेगुनाह औरतों और बूढ़ों पर हमला किया। यहां सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या सरकार अपनी तानाशाही में किसी भी आदमी को जब चाहे फना कर सकती है। क्या कोई आवाज जो सत्ता में शामिल पार्टी के खिलाफ है उठाने की इजाजत नहीं मिलेंगी।&lt;br /&gt;ये वो सरकार है जो अपना इकबाल दिखाना चाहती है लेकिन उसको जगह नहीं मिलती। मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री पद पर चुनाव इस देश के लोकतंत्र को पहली चोट थी। देश के तमाम प्रधानमंत्रियों के नाम गिनवाने से बचते हुए ये कहा जा सकता है कि मनमोहन सिंह राजनीतिक तौर पर चौधरी चरण सिंह, चन्द्रशेखर, देवेगौड़ा या फिर इंद्र कुमार गुजराल जितनी भी हैसियत नहीं रखते है। लेकिन इनको युवराज के बालिग होने तक चरण पादुकाओं को सर पर रख कर चलने की इजाजत दी गयी थी। कोई दिग्विजय सिंह जैसे चाटुकार ये चरण पादुकाओं को युवराज को पहनाने से पहले उनमें कांटे भर सकते है। &lt;br /&gt;जनार्दन द्विवेदी जैसे लोग सर्टिफिकेट बांट रहे है कि कौन साधु है और कौन शैतान। ये जनार्दन द्विवेदी कौन है भाई एक और परजीवि। गांधी नेहरू फैमली के किचन कैबिनेट में शामिल दिग्विजय सिंह की जगह हासिल करने की जुगत भिड़ाता हुआ एक बेचारा राजनीतिज्ञ। हम लोग व्यक्तिगत न हो तब भी इन लोगों के बयान अच्छे-खासे आदमी को परेशान कर सकते है। &lt;br /&gt;दूसरों लोगों की शराफत की ओर इशारा करने वाले इन नेताओं ने रामलीला मैदान की कार्रवाई पर क्या सफाई दी है ये सुन लेते है।&lt;br /&gt;दिग्विजय को लगा कि बाबा ठग है। जनार्दन द्विवेदी को लगा कि बाबा औरतों के भेष में भागा। कपिल सिब्बल को लगा कि बाबा योग करे राजनीति नहीं। और प्रधानमंत्री का बयान आप को इस लेख के शुरू ही मिला।&lt;br /&gt;एक ठग के बुलावे पर आएं हजारों मासूमों को ये सरकार लाठी-डंड़ों और अश्रूगैस का उपहार देंगी। ये लोग क्या मांग कर रहे थे देश के गरीब और किसानों के लूटे गये धन को वापस देश में लाने की कार्रवाई करने की मंशा जाहिर करे सरकार। बस इतनी सी मांग पर गुस्सा गये जूते साफ करने की राजनीति करने वाले ये लोग। ओसामा बिन लादेन की मौत पर गुस्साएं दिग्विजय सिंह के बयान पर ध्यान देना बेवकूफी है। ऐसा पहली नजर में लग सकता है लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के महासचिव है इसीलिए जो भी कहते है उसमें कोई न कोई वजन तो जरूर होगा। लेकिन इन बेचारे की पार्टी में नहीं चली। चार-चार मंत्री जिनमें प्रणवमुखर्जी भी शामिल थे ठग का सम्मान करने गएं। लेकिन बेचारे दिग्गी की औंकात नहीं कि ठग का सम्मान करने वालों से इस्तीफा मांगे।&lt;br /&gt;जनार्दन द्विवेदी की सरकार थी जो मुंबई हमलों का सामना कर रही थी। क्या उसको लग रहा था कि बाबा फिदाईन हमला करने आया है। क्या उसको भागने से बेहतर अपनी लाश जनार्दन के घर के सामने पहुंचा देनी थी। ये आदमी बात कर रहा है लोकतांत्रिक मर्यादाओं की हैरानी की बात हो सकती है कि मीडिया के बौंने कैसे मारने भागे जब एक आदमी ने इस पर जूता उठाया।&lt;br /&gt;कपिल सिब्बल का तो कहना ही क्या है। पार्टी के ट्रबल शूटर है। हर बार नयी ट्रबल के साथ आते है। खुद बेचारे वकालत करते थे अब राजनीति कर रहे है वकालत भी कर रहे है। पत्नी इम्पोर्ट -एक्सपोर्ट के धंधें में है। लेकिन दूसरा कैसे राजनीति कर सकता है ये बताना नहीं भूलते। ये वो है जो इतनी शर्म भी नहीं रखते कि सीएजी पर आरोप लगाने के बाद माफी मांग ले। सीएजी भी सरकार की है और सीबीआई भी। दोनो ने न केवल माना बल्कि इनके दोस्त राजा साहब जेल में है। लेकिन साहब फिर देश के सामने बेशर्मी का नया नारा ले कर आये है कि योगी है तो योग करें। फिर भाई आप अदालत के बाहर क्या कर रहे है। &lt;br /&gt;बात व्यक्तिगत आरोप लगाने की नहीं है। लेकिन मन बहुत दुखी है। इस बात पर नहीं कि एक बाबा के समर्थकों पर हमला हुआ है। दुख इस बात पर है कि लोकतंत्र की इस सरेआम हत्या पर भी लोग बहाना ढूंढ रहे है। कुछ दिन पहले इसी ब्लाग में एक लेख में इस बात का अंदेशा जताया था कि बौंने मीडियावाले इस देश में एक हिटलर की तलाश कर रहे है लेकिन ये हिटलर इतनी जल्दी आएंगा ये लिखने वालों को भी अंदेशा नहीं होगा। &lt;br /&gt;आखिर में ये कुछ पंक्तियां है उन्हीं कांग्रेसियों को समर्पित जिनकी पार्टी के नेता ने ही ये लिखी हैं।&lt;br /&gt;महामहिम |&lt;br /&gt;डरिए। निकल चलिए।&lt;br /&gt;किसी की आंखों में &lt;br /&gt;हया नहीं,&lt;br /&gt;ईश्वर का भय नहीं,&lt;br /&gt;कोई नहीं कहेगा, &lt;br /&gt;"धन्यवाद"&lt;br /&gt;सबके हाथों में,&lt;br /&gt;कानून की किताब है, &lt;br /&gt;हाथ हिला पूछते है,&lt;br /&gt;किसने लिखी थी, &lt;br /&gt;यह कानून की किताब ?&lt;br /&gt;"श्रीकांत वर्मा"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-104257830969236875?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/104257830969236875/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=104257830969236875' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/104257830969236875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/104257830969236875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_07.html' title='असली ईमानदार प्रधानमंत्री है भाई'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-2229584487636513413</id><published>2011-06-05T10:49:00.002+05:30</published><updated>2011-06-05T11:03:52.396+05:30</updated><title type='text'>लोकतंत्र के हत्यारें-</title><content type='html'>इस वक्त कैसा अहसास हो रहा है। बता नहीं सकता। घर में किसी की मौत हो गयी हो और तब आपको मर्सिया लिखना हो ऐसा ही लग रहा है। देश में लोकतंत्र की सरे-राह हत्या। एक लोकतंत्र जो किसी भी कीमत पर गरीब आदमी का लोकतंत्र नहीं था। लेकिन उस पर्दे को भी इस बे-पैंदी के प्रधानमंत्री की सरकार ने फाड़ दिया। रात के अंधियारें में आराम कर रहे हजारों लोगों पर पुलिस का लाठीचार्ज अश्रु-गैस के गोले बरसाये गये। &lt;br /&gt;ये पुलिस वाले वहीं है जो पहले यूनियन जैक के नाम पर इस देश के लोगों पर अत्याचार किया करते थे और अब तिरंगे के नाम पर कर रहे है।&lt;br /&gt;भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आंदोलन में दिल्ली आएँ इन देशवासियों पर कुछ हजार पुलिस वालों ने सरकार में बैठे बौंनों के आदेश में हमला बोल दिया। साफ तौर पर दिख रहा है कि आजादी के बाद भी इस देश की पुलिस ने कुछ नहीं सीखा। सत्ता में बैठे लोग चार जून से ही सदमें में थे कि क्या चल रहा है। राजधानी में कुछ लोग आ गये और पैसे वालों के खिलाफ कार्रवाई की बात कर रहे है। ये क्या बात हुई। पिछले साठ सालों से खाकी वर्दी के दम पर राज में हिस्सेदारी कर रहे लुटेरों के खिलाफ आंदोलन। मैं कई बार इस बात समझने में नाकाम रहा कि मीडिया ऐसे वक्त में क्यों चूक जाता है कि उसे किसका साथ देना है। टीवी चैनलों और अखबारों में ऐसी खबरें साया हो रही थी कि जैसे रामदेव नाम का ये बाबा पाकिस्तान का एजेंट है और इसके तंबू और कनात का पैसा आईएसआई ने दिल्ली में बैठे आरएसएस नाम के संगठन की मार्फत भेजा है। हो सकता है रामदेव के ट्रस्ट्र के खिलाफ कई शिकायतें हो फिर ये शिकायतें उसी वक्त को आती है जब वो भ्रष्ट्राचार के खिलाफ कोई आंदोलन कर रहा होता है। ये उसी वक्त क्यों आती है जब भ्रष्ट्राचार की नाभि में हमला करने की बात होती है। रामदेव के खिलाफ लोग मुझे एक बात से मुत्तमईन करना चाहते है कि ये बाबा कभी साईकिल पर चलता था तब मैं एक सवाल करता हूं कि क्या उन लोगों के बाबा हवाई जहाज में बैठ कर चलते थे। &lt;br /&gt;इस पूरे मामले में दो किस्म की खीझ थी एक कि ये बाबा कभी साईकिल पर चलता था अब इसके पास हजारों करोड़ रूपये का ट्रस्ट है और दूसरी कि इससे लोकतंत्र को खतरा है। अरे शांति पूर्ण विरोध करना किस देश के लोकतंत्र में अवैध है। एक मैदान में बैठकर अनशन करना किस देश के कानून का उल्लंघन है। इस बारे में कोई बोल नहीं रहा है। &lt;br /&gt;मैंने इस बात को समझने की कोशिश की चलो बाबा के खिलाफ हो सकता है भ्रष्ट्राचार के मामले हो लेकिन क्या इससे ही वो भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता है। &lt;br /&gt;ये तर्क देने वालों से एक बात पूछना चाहता हूं कि रोटी के लिए जीबी रोड़ पर बैठकर जिस्म बेचने वाली औरत अगर बाजार में उतरती है तो क्या हर आदमी को उससे बलात्कार करने का अधिकार मिल जाता है।&lt;br /&gt;मैं आजतक एक बात ही समझता रहा कि लोकतंत्र का मूल ये बात है जो किसी पश्चिमी विचारक ने कही थी।&lt;br /&gt;"मैं आपकी कही बात से पूर्णतया असहमत हूं लेकिन आपके कहने की अधिकार की रक्षा के लिए अपने खून की आखिरी बूंद भी बहा दूंगा।"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-2229584487636513413?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/2229584487636513413/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=2229584487636513413' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2229584487636513413'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2229584487636513413'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_6924.html' title='लोकतंत्र के हत्यारें-'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-6153058136486742146</id><published>2011-06-05T07:07:00.001+05:30</published><updated>2011-06-05T07:09:32.817+05:30</updated><title type='text'>ये बौंने युवराज की पुलिस है</title><content type='html'>ये बौने युवराज की पुलिस है। ये उत्तर प्रदेश पुलिस नहीं है युवराज। ये उसकी अपनी दिल्ली की पुलिस है जहां शीला दीक्षित राज करती है। अगर बुद्धि कमजोर है तो फिर ये याद कर लो कि दिल्ली देश की राजधानी है। इस राजधानी में आधी रात को सोते हुए लोगों पर लाठियां चलाने वाली पुलिस कहां से आयी है। बौने युवराज को पता लग जाना चाहिएं। मैं हमेशा से ये मानता रहा हूं कि इस देश में राज कर रहे बौने या तो पैसे वालों के एंजेट है या फिर सीधे दलाल है। ज्यादातर नौकरशाहों के बच्चों या फिर उन राजघरानों की संतानें है जो देश की आजादी की ओर से भौंकतें थें। &lt;br /&gt;ये उन लोगों की औंलादें है जो विदेशों में पढ़कर इस देश के करोड़ों-करोंड़ लोगों की नुमाईंदगी का दावा करते थे। ये वो लोग है जिनका ताकत अनपढ़ और गरीब लोग थे लेकिन ताकत का मजा ये खुद अंग्रेजों के साथ मिल कर बांच रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस आंदोलन पर लाठीचार्ज देश के फर्जी लोकतंत्र के खात्में की शुरूआत है। पहले से ही कौन सा लोकतंत्र इस देश में था। ये सवाल हर बार किसी भी आदमी को सोच में डाल देता था।सारे कानून बनाने वाले अग्रेंजों की फेंकी गई कतरनें पहन कर फैशनेबल बने थे और बाकि जगह  गली के गुंडों के लिए छो़ड दी थी। क्या कोई ये सोच सकता है कि शाहबुद्दीन, सूरजदेव सिंह, डी पी यादव, अमरमणि और हरिशंकर तिवारी माननीय हो सकते है। ये सब लोग माननीय थे है औऱ रहेंगे। कभी भी देश जातिवाद से मुक्त नहीं हो पाया। और यही वो ताकत थी जो दिग्गी जैसे चिंदीचोर को देश का प्रवक्ता बना देती है। किसी भी बाहर के आदमी को देखकर झटका लग सकता है कि इस आदमी या इसके खानदान का देश को क्या योगदान है। लेकिन ये आदमी देश की दिशा तय करने में योगदान देता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-6153058136486742146?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/6153058136486742146/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=6153058136486742146' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6153058136486742146'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6153058136486742146'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_1283.html' title='ये बौंने युवराज की पुलिस है'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-3381150817327502406</id><published>2011-06-05T06:47:00.001+05:30</published><updated>2011-06-05T06:49:37.194+05:30</updated><title type='text'>दिग्विजय से लोग क्यों नहीं डरते,</title><content type='html'>"अगर सरकार किसी से डरती तो वो जेल के अंदर होता है।" कुछ ऐसा ही बयान दिया है  बाबा (रामदेव) के आंदोलन के बारे में कांग्रेस के कारामाती महासचिव दिग्विजय सिेंह ने। अमरसिंह के नये अवतार है दिग्विजय सिंह। बेचारे जबां की खारिश की चपेट में है। सोचते है कि वो जो बोलते है वो गजब का होता है। एक के बाद एक बयान देश सुन चुका है। मध्यप्रदेश को छोड़कर दिग्विजय की पहचान देश में राज कर रही पार्टी के महासचिव की है और मध्यप्रदेश में कांग्रेस को एक पार्टी के तौर पर राज्य से गायब करने की। सारे वक्तव्य याद दिलाने की जरूरत नहीं है। दिग्विजय का मुंह मीडिया का कैमरा देखते ही खुल जाता है इसके बाद आपके मुंह से जो निकले वो ही खबर है। सो इस बार भी खुल गया। और देश की उस जनता के सामने जो दिग्विजय में एक मसखरें को देखती एक नया मसाला मिल गया। &lt;br /&gt;ये सरकार भी गजब की है। एक दो नहीं चार-चार मंत्री बाबा रामदेव का स्वागत करने एअरपोर्ट पहुंचते हैं। बाबा रामदेव के साथ वार्ता करते है। उनसे आंदोलन वापस लेने के लिए बात करते है। उसी पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह बयान जारी करते है कि योग गुरू के नाम से प्रसिद्ध रामदेव को योग नहीं आता है। दिग्विजय को लगता है बाबा खुद अरबपति हो गये और गरीबों की बात करते है। बेचारे दिग्विजय की परेशानी है कि बाबा ने माल काट लिया और हिस्सा भी नहीं मिला।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-3381150817327502406?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/3381150817327502406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=3381150817327502406' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/3381150817327502406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/3381150817327502406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post_05.html' title='दिग्विजय से लोग क्यों नहीं डरते,'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-6424264541432852099</id><published>2011-06-03T20:46:00.001+05:30</published><updated>2011-06-03T20:49:28.214+05:30</updated><title type='text'>मीडिया के बुद्ध और जनता की ममता</title><content type='html'>अबीर-गुलाल उड रहा था। कोशिश थी कि रंग हरा ही हरा दिखें। लेकिन  गुलाल-अबीर में लाल रंग बचा है सो दिख रहा था। कोलकाता या कहिये सारा बंगाल मस्ती के आलम में था। ये बंगाल के रंग बदलने की मस्ती थी। लाल बंगाल हरा हो गया। चौंतीस साल तक जो बंगाल लाल था वो अब हरा है। बुद्ध के देवत्त से बंगाल ममता की छांव में आ गया। मीडिया के गपौड़ियों और बे-सिर पैर के तर्क देने वाले बक्कालों के पास बहुत सारी कहानियां रातो-रात आ गयी। ऐसी कहानियां जिनके मुताबिक लेफ्ट ने अपनी नीतियां खो दी थीं। वो आम जनता से दूर हो गया था। इसके लिए उनके पास बहुत सारे उदाहरण भी है। वामपंथियों को सबसे ज्यादा गरिया रहे रिपोर्टर कम एंकरों के पास जो सबसे बड़ा मुद्दा है- परमाणु मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेना। इन लालबुझक्कड़नुमा पत्रकारों के पास हर चीज का प्रोम्पटर पर लिखा हुआ समाधान है। ये सर्वज्ञानी है। ये अलग बात है कि जिस कोर्स से पढ़ कर आएँ हैं उसमें थर्ड डिविजन से पास होंगे और या फिर आईएएस का एक्जाम फेल कर यहां पहुंचे होंगे। यदि मार्क्सवादियों का सबसे बड़ा दोष यहीं है तो फिर टीवी चैनल्स और अखबारों ने तब हल्ला क्यों मचाया जब जापान में सुनामी की चपेट में आएं परमाणु बिजलीघरों की सुरक्षा का मुद्दा उठा। न इन बेचारों को परमाणु मुद्दे का पता न बंगाल का। बस इनको रन डाउन के हिसाब से बोलना था। परमाणु मुद्दें पर बहस करने वाला ऐंकर अगले ही पल गांव में पंचायती फैसलों पर होने वाली हिंसा पर बोलने के लिये तैयार था। क्या गजब का विस्तार है इनकी समझ का। लेकिन माफ करना हम यहां बात बंगाल की कर रहे है। तो वहीं पर बात करते हैं। बात शुरू हुई कि वामपंथी क्यों के हारे के मीडिया चिंतन पर।&lt;br /&gt;मीडिया के मार्किट के दलालों की भूमिका का सबसे बड़ा और आसानी से समझ में आने वाला उदाहरण है ममता की गलतियां बताने वाला एक आर्टिकल। नवभारत टाईम्स के मुताबिक ममता ने टाटा को बंगाल के बाहर का रास्ता दिखाकर अपनी राजनीतिक अपरिक्पक्वता का परिचय दिया। अब मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें अपनी भूल सुधारनी होंगी। इस वक्त्वय के दो मतलब है। एक कि ममता ने टाटा का विरोध किया -गलती की। तब टाटा का समर्थन करने वाले वामपंथियों को इसका फायदा क्यों नहीं मिला। माना वामपंथियों की गलतियां ढ़ेर सारी थीं इसीलिए इस का फायदा नहीं मिला तो दीदी की पार्टी को दूसरी बार उस इलाके से इतना भारी जनसमर्थन क्यों मिला। इसका कोई जवाब दलाल पत्रकार नहीं दे पाएंगे। इसके लिए उनको ईमानदारी से काम करना होगा। लेकिन वो कर नहीं सकते। सत्ता की दलाली, देश को लूट रही मल्टीनेशनल कंपनियों के एडवर्टाईजमेंट का लालच और दूसरे मालिकों की हित साधना ये ऐसे रोड़े है जो बेचारे दलाल पत्रकार का गला दबाते रहते हैं। &lt;br /&gt;बात फिर ममता दीदी पर। इस देश में दिया लेकर कर खोजनें पर भी सत्ता में ऐसी ईमानदारी ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगी। 14 बाई 12 के लगभग की उस खोली में रह रही दीदी सालों से सत्ता में ताकतवर भूमिका में रही है। लेकिन उनका लाईफस्टाईल आज भी वहीं है। सूती धोती-हवाई चप्पल पहनने वाली दीदी उन सबके मुंह तमाचा है जो पत्थर के हाथियों को खड़ा कर गरीब दलितों का दर्द या अपने लिए हजारों जोड़ी जूतियों खरीद कर राज्य के करोंड़ों नंगें पैरों का दर्द दूर करने वाली महारानियों की तारीफ करते हैं। इस देश को ममता की छांव की जरूरत हैं। उसी ममता की छांव जिसने यादव शिरोमणि या आय से अधिक संपत्ति की रेल में बैठने वाले लालू के झूठ का पर्दाफाश किया। सालों तक दलाल पत्रकारों और लुटेरी मल्टीनेशनल कंपनियों और भ्रष्ट्र नौकरशाहों के दबावों को झेलते हुए गरीब आदमी का रेल किराया नहीं बढ़ाया। ऐसी ममता दीदी देश के करोड़ों गरीब आदमियों की आखिरी उम्मीद है लेकिन दलाल पत्रकार उनके दिमाग में ये बैठाने में जुट गएं है कि आपको क्या करना है क्या नहीं। ये वही दलाल पत्रकार है जो अब दीदी को ये समझाने में जुट गएं है कि आप जिसे अपनी ताकत समझ रही हो वो आपकी ताकत नहीं है। जो हम बता रहे है वो आपकी ताकत है। और ये उनको दलाली की भाषा समझा रहे है। चूंकि न तो दीदी को इन लेखों को पढ़ना है न ही अपनी समझ उस जननेता को समझाने की है लेकिन हमारी समझ में दीदी पहली गलती कर चुकी है, अमित मित्रा जैसे पुराने घाघ अर्थशास्त्री को वित्त मंत्री बनाकर। ये उन्हीं लोगों में शामिल है जो देश में लाखों किसानों की मौत की जिम्मेदार नीतियां बनाने के लिए जिम्मेंदार है अब वहीं किसानों के हक में नीतियां बनाएंगें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-6424264541432852099?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/6424264541432852099/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=6424264541432852099' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6424264541432852099'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6424264541432852099'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='मीडिया के बुद्ध और जनता की ममता'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-8625472867058463594</id><published>2011-05-29T10:54:00.001+05:30</published><updated>2011-05-29T10:59:33.659+05:30</updated><title type='text'>मनमोहन सिंह का वार्ड नंबर 6</title><content type='html'>हॉस्पीटल में घुसते ही बदबू का भभका नाक में घुस गया। सब लोगों के मुंह पर रूमाल बंधे थे। वही बैठे एक सिक्योरिटी गार्ड से पूछा कि वार्ड नंबर 6 कहां है। 23-24 साल के उस सिक्योरिटी गार्ड की आवाज में बेहद ऊब थी और उसने बता दिया की उल्टे हाथ से जाआों और फिर सीधे हाथ मुड़ जाना- वार्ड नंबर 6 लिखा दिख जायेगा। वार्ड नंबर 6 तक के रास्तें में बेहद बदबूदार पानी फैला हुआ था। उसको पार करते ही एक गैलरी में दाखिल हुआ। गैलरी में साईड में सामान रखा फैला हुआ था। खून के पुराने पड़ चुके धब्बों और धूल से अट गयी ये चादरें इस बात का इशारा भर कर रही थी कि ये चादरें जब बनी थीं तो सफेद थीं। एक व्हील चेयर पर इंसानी ढांचा निकल रहा था। उसके कुर्तें की बांहे जैसे उनमें लटक रही थी। व्हील चेयर को लेकर चल रही महिला के चेहरे में उदासी का पूरा जीवन दिख सकता था। लेकिन उसके सूख गये चेहरे में जीवंत थी तो आंखें जिसमें वो अपने करीबी की जिंदगीं की आस के साथ इस अस्पताल में थीं। जैसे ही दाखिल हुआ तो लगा कि कहां आ गया। चारों तरफ गंदें बेड़ पर लेटे हुए लस्त-पस्त इंसान। उनके पास बैठे घर के लोग जो बेहद खामोश है या फिर अगले दिन के ऑपरेशन पर बात कर रहे है। &lt;br /&gt;मेरे मन में बेहद खौंफ भर गया। अपने परिचित को देखने के बाद भी मैं संयत नहीं हो पा रहा था। हालांकि उसके ऑपरेशन की बात मैं कर जरूर रहा था लेकिन रास्ते में शवगृह में जाते हुए स्ट्रेचर को दिमाग से नहीं निकाल पा रहा था। ये अस्पताल देश की किसी प्रांत या आदिवासी इलाकों में नहीं बना हुआ है। पेशे से वकील मेरे दोस्त बता रहे थे कि अस्पताल में बेड़ की समस्या है। इससे बावजूद कि मरीज मर कर बेड़ खाली कर रहते है। ये अस्पताल है लाला रामस्वरूप टीबी हॉस्पीटल। राजधानी दिल्ली में टीबी यानि तपेदिक का सबसे ज्यादा अहमियत वाला अस्पताल। इसकी दीवारें अगर दो तीन रेड लाईट्स पार कर लेती है तो एनसीआरटीई और देश के सबसे शानदार संस्थान आईआईटी से मिल जाएंगी। &lt;br /&gt;इस अस्पताल में घुसने के बाद ही आपके स्नायुतंत्रों को लकवा मार सकता है। ये देखकर कि देश में तपेदिक के इतने सारे पोस्टर लगाने वाली और निजि मीडिया से लेकर सरकारी मीडिया को एडवरटाईजमेंट से पाट देनी वाली सरकार ने सुविधा के नाम पर इस अस्पताल को क्या दिया। मैंने किसी भी साईट्स पर जाकर इस अस्पताल के बारे में रिसर्च नहीं की है। मैंने इस संस्थान के अधिकारियों से भी जानने की कोशिश नहीं की। क्योंकि जो भी था वो आंखों से दिख रहा था। इस हॉस्पीटल में मरीजों की संख्यां कितनी थी उसका अंदाजा इतने से लग सकता है कि अपने मरीज की भर्ती के लिए संस्थान के डायरेक्टर को कई बार फोन करना पड़ा। और जैसे ही मैं देखने गया तो पांव तले की जमीन खिसक गयी। इसीतरह से लड़ रही है सरकार इस महामारी से।&lt;br /&gt;ये वही सरकार है जो देश की इज्जत के नाम पर सत्तर हजार करोड़ रूपये दिल्ली पर लगा सकती है। ये वहीं सरकार है जो एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के घोटाले पर आंख मूंद कर बैठ सकती है और जब दलालों की महारानी का भांडा-फोड़ हो जाएं तो साझा सरकार की मजबूरी बता सकती है। एक ऐसा व्यक्ति प्रधानमंत्री हो सकता है जिस पर जनता को इतना विश्वास है कि कांग्रेस की आंधी में भी चुनाव हार गया। देश की सत्ता में जीत कर आएं नेताओं से ज्यादा भऱोसा जताया था सोनिया गांधी ने उस पर तब भले हीमीडिया के बौनों ने लिखा हो कि ये योग्य है। लेकिन योग्यता बढ़ती मंहगाईं के कारण हर रोज गुम होते आदमी की जद्दो-जहद में दिखती है।&lt;br /&gt;मैं बार-बार बहक रहा हूं। मुझे याद आ रहा है मेरा गांव का दोस्त सतेन्दर उर्फ पटवारी। अपने शहर तो जाता रहता हूं लेकिन गांव जाना अब कम हो गया है। गांव में भी उन दोस्तों के साथ बातचीत और भी कम हो गयी जिनके साथ मई-जून की गर्मियों में सालों तक जानवर चुगाता रहा। ऐसे ही दोस्तों में शामिल था सतेन्दर। गांव की कुनबे और खानदान की परंपरा में मेरे कुनबे में आऩे वाला सतेन्दर पतला-दुबला तो बचपन से ही था। कभी का बड़ा किसान परिवार रहा सतेन्दर का परिवार अब पुरखों के खेतों की कहानियां और दूसरे किसानों के खेतों में मजदूरी के सहारे दिन काट रहे थे। सतेनदर के साथ रहने में घर वालों को एक ऐतराज और था कि मौका लगते ही सतेन्दर के पिता और बड़े भाई दूसरे के खेतों से फसल काट लेने के लिये भी बदनाम थे। लेकिन दोस्ती चलती गयी। सतेन्दर मुझे  हमेशा अपने लिए एक ऐसा दोस्ता मानता रहा जो उसके साथ शहर की बातें भी बांटता था। &lt;br /&gt;इधर हम लोग उमर में बड़े होते गये और हमारी मुलाकातें छोटी होती गयी। सालों तक यायावरी की और फिर देश की राजधानी में डेरा जमा लिया। अमेरिका की नीतियों से लेकर अफगानिस्तान के बामियान के बारे में जानकारी बढ़ी  तो दोस्तों के बारे में जानकारी और भी कम हुई। लेकिन फिर भी सतेन्दर के बारे में पता चलता रहा कि उसका परिवार गांव से पलायन कर गया। पानीपत में कपड़ों के कारखानों में मजदूरी कर रहे उसके परिवार के किसी सदस्य से वास्ता अप्रैल -मई के महीनों में ही पड़ता था जब वो लोग बटाई पर दिये गये अपने खेतों से गेंहू काटने आते थे। फिर एक दिन गांव से आएँ मेरे भतीजे ने बताया कि चाचा जी आपके दोस्त पटवारी ने शादी कर ली। मैं बहुत खुश हुआ। पटवारी पानीपत से एक महिला से शादी कर गांव चला आया था। मैं गांव गया और पटवारी से मिला। रिश्तें में बड़ा होने के नाते मैं पटवारी की पत्नी का चेहरा नहीं देख सकता था। मुंह पर पल्ला डाले एक औरत के पटवारी के आंगन में घूमते देखकर मैं बेहद खुश था। लेकिन जैसे ही पटवारी पर नजर पड़ी तो मैं हैरान रह गया लंबा पटवारी अब बस हड़्डियों का ढांचा भर था। उसकी आवाज बेहद नर्म हो गयी थी। मेरे साथ बात करते हुए पटवारी ने इस बात का बेहद ख्याल रखा कि मैं ये न भूल सकूं कि पटवारी मेरे से बेहद नीचे का आदमी है। मैं जैसे ही पटवारी से ईलाज की बात करता वो औऱ अपने में सिमटता जाता था। खैर बेहद उदास मन से मैं वापस लौट आया। मैं कुछ दिन पहले गांव गया तो मेरे भतीजे ने बताया कि सतेनदर नहीं रहा। उसको टीबी थी। ईलाज कराने के लिये शहर के अस्पताल में जा रहा था लेकिन फायदा नहीं हो रहा था। मैने सतेन्दर के भाई पवन को काफी भला-बुरा कहा कि क्यों नहीं सतेन्दर के लिए दिल्ली आएँ। मैं वहां के शानदार सरकारी अस्पतालों में उसका ईलाज कराता। वो बेचारा कहता रहा कि भाई क्या करते उसकी मौत तो बुला ही रही थी। मैने पूछा तो पता कि सतेन्दर की बीबी चली गई कहां कोई नहीं जानता।&lt;br /&gt;मैं बेहद अफसोस में था कि दिल्ली चला आता तो पटवारी बच सकता था। लेकिन दिल्ली के इस सबसे बेहतर सरकारी अस्पताल की इस हालत को देखकर मुझे लगा कि अच्छा हुआ था कि पटवारी दिल्ली नहीं आया। पवन के मुताबिक आखिरी दिनों में अक्सर पटवारी ये बोलता था कि अगर वो वक्त से दिल्ली चला जाता तो उसका दोस्त बबलू उसका ईलाज करा देता। मुझे तो बस इतना ख्याल आ रहा है कि बेचारा दवाईयों के लिए भटकता पटवारी कॉमनवेल्थ खेल देख लेता तो मरने से पहले ये तो सिदक रहता कि कॉमनवेल्थ के सही तरह से होने से देश की ईज्जत बच गयी पटवारी की जिंदगी का क्या वो तो वैसे भी रास्ते का पत्थर थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-8625472867058463594?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/8625472867058463594/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=8625472867058463594' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8625472867058463594'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8625472867058463594'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/6.html' title='मनमोहन सिंह का वार्ड नंबर 6'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-117673181091609467</id><published>2011-05-27T09:18:00.003+05:30</published><updated>2011-05-27T09:32:45.632+05:30</updated><title type='text'>अमेरिका में मोर नाच रहा है, मीडिया को दिख रहा है।</title><content type='html'>हिंदुस्तान का नेशनल मीडिया इस वक्त खबरों की एंड्रीनेलीन के नशे में है। अमेरिका के शिकागों में डेविड कॉलमेन हैडली और तहव्वुर राणा पर मुकदमा चल रहा है।  इस मुकदमें का भारत से ताल्लुक इतना है कि इन दोनों ने भारत में अब तक के सबसे बड़े आतंकवादी हमले की साजिश रची थी। ये जानकारी भी हिंदुस्तानियों को अमेरिकी सरकार ने सायास नहीं दी थी अमेरिका से अनायास ही मीडिया के जरिए मिल गई थी। दुनिया की सबसे उभरती हुई अर्थव्यवस्था और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के हिंदुस्तान ने तो इस हमले को आमिर अजमल कसाब पर खोल कर विजय हासिल कर ली थी।  हिंदुस्तानियों की गाढ़ी कमाई के हजारों करोड़ रूपये की रकम पर पलने वाली हिंदुस्तानी जांच एजेंसियां का सबसे नायाब कारनामा था ये। महीनों तक इस देश के तथाकथित खोजी रिपोर्टर जो किसी भी झूठ को सच बना सकते है बिना किसी नियामक एजेंसी से या कोर्ट से डरे हिंदुस्तानी एजेंसियों की तारीफ के डंके बजाते रहे।&lt;br /&gt;एक दिन अचानक अखबार में एक खबर छपी कि अमेरिका में  आतंकवादी साजिश रचने के आरोप में हैडली और तहव्वुर राणा नाम के दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इन दोनों लोगों की गिरफ्तारी के हिंदुस्तान के लिए क्या मायने है इस बारे में अमेरिका ने हिंदुस्तान को कब बताया ये मालूम नहीं। हो सकता है ये रहस्य भी  ये नार्थ ब्लाक के उन तहखानों में दफन हो जहां इस देश के उजले लोगों के काले कारनामे दफन है हमें मालूम नहीं। फिर अखबारों में धीरे-धीरे ये खबर साया होने लगी और रिकंस्ट्रक्शन के सहारे या फिर घटिया स्केच ग्राफिक्स के सहारे जोकरनुमा ऐंकरों ने पूरे देश को ये कह कर चेताना शुरू कर दिया कि हैडली और राणा ही है असली गुनाहगार मुंबई हमले के।   &lt;br /&gt;ऐसा ही हुआ इस मामले में। अमेरिका ने बेहद गिड़गिडाने के बाद हिंदुस्तानियों को हैडली और तहव्वुर राणा की सूचनाओं तक पहुंच दी। हालांकि उनसे पूछताछ करने का एक सपना अधूरा ही रह गया। खैर इसपर अमेरिका में ये जद्दो-जहद हुई की हम राणा और हैडली का क्या करें। फिर उनको अमेरिकी कानूनों के तहत उन पर मुकदमा चल रहा है। अब उस मुकदमें रोज नये खुलासे हो रहे हैं। और समाचार जगत बल्लियों उछल रहा है। अहा क्या बात है। पाकिस्तान का हाथ, आईएसआई की साजिश सब कुछ तो है इस खबर में। न्यूक्लियर प्लांट की भी रेकी की गई थी। ये बात तो न्यूज रूम में बैठे एडिटर्स को और भी खुशी देने वाली है। &lt;br /&gt;घटिया से घटिया किताब में इससे बेहतर लिखा जाता होंगा जो न्यूज चैनलों के स्क्रिप्ट राईटर लिखते है। स्क्रीन पर लिख कर आता है पाकिस्तान होगा बेनकाब, आज फूटेगा पाकिस्तान का भांडा..पाकिस्तान की खतरनाक साजिश। &lt;br /&gt;एक दम वाहियात और पूरे देश को धोखा देने वाली पत्रकारिता का शर्मनाक नजारा है ये। कोई ये पूछने को तैयार नहीं कि मुंबई हमले के वक्त लापरवाही बरतने वाले आईबी, रा, और दूसरी जांच एजेंसियों के अफसरों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। किसी अखबार या चैनल को याद नहीं कि मुंबई हमले में इस्तेमाल हुए फोन नंबर पहले ही आईबी को दे दिये गये थे कि इन नंबरों को किसी आतंकवादी नेटवर्क ने खरीदा है।लेकिन दिल्ली और राजधानियों में ऐश काट रहे आईबी के काले साहबों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। मंत्री वहीं है संतरी वही है तो फिर बदला क्या।वही अफसर अभी भी देश को आतंकवादियों से बचाने की रणनीति तैयार कर रहे है जो बेचारे सालों से बचा रहे है। कई सौ लोगों की मौत के जिम्मेदार इन अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने या उसके लिए खबर लिखने का ख्याल इस देश में किसी को नहीं। &lt;br /&gt;ये कैसा देश है जो बेचारा विदेशियों से शिकायत करता घूमता है कि पाकिस्तान ये कर रहा है पाकिस्तान वो कर रहा है। हम तो गांधी के देश के है। हमारी पुलिस सिर्फ गांधीवादी आदर्शों पर चलती है। उसके सैकड़ों फर्जी एनकाउंटर देशी लोगों के लिए है उसका बेरहम लाठीचार्ज सिर्फ मजदूरों के लिए है। &lt;br /&gt;सवाल सिर्फ इतना ही होता है कि पार्टियों में बैठकर गप करने वाले अधिकारियों के लिए हिंदुस्तानी कब तक अपनी जेब से टैक्स देते रहेंगे। हजारों करो़ड़ रूपये की लूट ऱकरने वाली कंपनियों पर नजर रखने वाली एजेंसियों के अधिकारी मौज में अपने घर जाते है अपने बच्चों के लिए हराम के पैसे से खरीदे गये ऐशो-आराम के साधनों पर नजर डालते हुए दारू पीकर सो जाते है। उधर जीबी रोड़ -सोनागाछी या फिर ऐसे ही बाजार में दस रूपये के लिए जिस्म बेचती है औरतों पर जिम्मेदारी आ जाती है जन-गण-मण अधिनायक जया है गाने की और इसके सम्मान के लिए अपना जिस्म बेचकर कमाएं गएं पैसे से टैक्स भरकर काले साहबों का ऐशो-आराम जुटाने की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-117673181091609467?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/117673181091609467/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=117673181091609467' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/117673181091609467'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/117673181091609467'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html' title='अमेरिका में मोर नाच रहा है, मीडिया को दिख रहा है।'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-7943993516742528359</id><published>2011-05-26T08:16:00.004+05:30</published><updated>2011-05-26T08:23:33.502+05:30</updated><title type='text'>मैं नहीं डरता था, बिके हुए डर से</title><content type='html'>मेरे बचपन में,&lt;br /&gt;मैं डर सकता था किसी से भी&lt;br /&gt;मेरे वक्त में नहीं बिका था डर&lt;br /&gt;ऐसे में मुझे ही तय करना था&lt;br /&gt;बचपन को रंगीन करने के लिए &lt;br /&gt;किससे डरना है मुझे।&lt;br /&gt;मैं गांव के किनारे बने रेत टीलों से डरा&lt;br /&gt;घरों में सुनसान पड़े कमरों से भी डरा&lt;br /&gt;मैंने डर कर देखा पीपल के पेड़ों को&lt;br /&gt;अंधेंरे में तेज हवा से झूलते &lt;br /&gt;हल्के-फुल्के पेड़ों से भी डर लिया कभी-कभी&lt;br /&gt;रात को घेर में सोते वक्त &lt;br /&gt;मुझे &lt;br /&gt;अहसास हुआ कि कभी भी आ सकता है &lt;br /&gt;सिर कटा हुआ भूत, या बैचेन डायन&lt;br /&gt;मैंने पसीने से भीगी रात काट दी &lt;br /&gt;मां की बगल में या पिता के साथ लिपट कर&lt;br /&gt;सारे डर की बनी डोर में &lt;br /&gt;जो सच्चा डर था&lt;br /&gt;ताऊजी की पिटाई का,&lt;br /&gt;या &lt;br /&gt;कभी कभी मैं कुछ सामान टूट जाने से&lt;br /&gt;मां से भी डर सच्चा होता था।&lt;br /&gt;डर के हजार आईनों में देखता था &lt;br /&gt;तो सबसे बड़ा डर मां ने दिया &lt;br /&gt;झूठ बोलना यानि पत्थर हो जाना&lt;br /&gt;किसी प्यासे को पानी न देना &lt;br /&gt;यानि अगले जन्म में प्यासा रहना&lt;br /&gt;भिखारी को डांटना &lt;br /&gt;मतलब कई जन्मों तक&lt;br /&gt; भूख के रेगिस्तान में भटकना&lt;br /&gt;ऐसे डर के बहुत से  रंगों से &lt;br /&gt;बुनता रहा जिंदगी की चादर&lt;br /&gt;मेरी जिंदगी में डर का दायरा &lt;br /&gt;मेरे डर से भी छोटा था&lt;br /&gt;जिसकी सीमा में आ जाते थे &lt;br /&gt;गांव के सूने पड़े मंदिर &lt;br /&gt;शहर के बीच में बना स्कूल&lt;br /&gt;जिसमें खूबसूरत जीनों से फिसलते वक्त&lt;br /&gt;आत्माराम मास्टर जी का डंडे का डर&lt;br /&gt;याद न करने के बावजूद &lt;br /&gt;भूल जाना क्लास में &lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;आज टेस्ट है जिसके नंबर पिताजी की मेज पर रखने है&lt;br /&gt;इस सब डर से निकल कर महानगर पहुंच गया।&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;पांच साल के बेटे की जिंदगी में &lt;br /&gt;जब भी दखल देता हूं&lt;br /&gt;लगता है कि डर भी डर नहीं है उसका&lt;br /&gt;जल के डर बाजार के बडे होने के साथ ही बदल गये&lt;br /&gt;अब उसको कोई बूढ़ी औरत नहीं डरा पाती है&lt;br /&gt;उसको डर नहीं लगता है किसी अंधेंरे कमरे से &lt;br /&gt;बिल्डर ने हर कमरे में रोशनी के लिए प्लान बनाया है&lt;br /&gt;इस शहर में बिना पोस्टर लाउड्स्पीकर के कोई मंदिर नहीं है&lt;br /&gt;वीरान पड़े घर किताबों में सिमट गये।&lt;br /&gt;अब उसको डरना पड़ता है &lt;br /&gt;हर उस डर से जो बिक सकता है।&lt;br /&gt;डोर में कीआई नहीं है &lt;br /&gt;सिक्योरिटी के कैमरे नहीं है कॉलोनी में,&lt;br /&gt;नया पैगासिस आया है &lt;br /&gt;बहुत खतरनाक&lt;br /&gt;घर के बाहर आवारा गाडियों से डर है &lt;br /&gt;कुचल सकते है गाडियों में चलने वाले राक्षस&lt;br /&gt;भीख मांगने वाले उठा सकते है&lt;br /&gt;खाकी वर्दी वाले उठाकर बेच सकते है&lt;br /&gt;अंग बेचने वाले, &lt;br /&gt;इंसानी जिस्म को बेचने वाले &lt;br /&gt;ऐसे तमाम डर से घिरा &lt;br /&gt;आयुध&lt;br /&gt;उसके पास एक भी डर ऐसा नहीं है जो &lt;br /&gt;उसने भरा हो अपने बचपन के कैनवस पर&lt;br /&gt;आलीशान और एअर कंडीशन्ड &lt;br /&gt;आफिसों में तैयार हो रहा है डर&lt;br /&gt;घर में चल रहे टीवी के &lt;br /&gt;हर फ्रेम में उतर रहा है डर&lt;br /&gt;सच की रोशनी में सदियों के भूतों की &lt;br /&gt;झूठी समझी गई कहानियों से &lt;br /&gt;सिल्वर स्र्कीन के सहारे &lt;br /&gt;उसके दिमाग में भर दिया डर&lt;br /&gt;अब डर जीने से फिसलने पर नहीं &lt;br /&gt;रिपोर्ट कार्ड में गिरने से लगता है&lt;br /&gt;प्रलय की झूठी खबरों के बीच&lt;br /&gt;दुनिया तबाह करने के रोजमर्रा के &lt;br /&gt;खबरी झूठों के बीच जनमता है डर&lt;br /&gt;ऐसा डर जिसमें उसका कुछ भी नहीं है&lt;br /&gt;सिवा उस डर के जो उसके बीच समा &lt;br /&gt;गया है खबरों के स्ट्रिंगर की तरह&lt;br /&gt;वो नहीं डरता है मेरे डर से &lt;br /&gt;मैं हर पल डरता रहता हूं उसके डर से&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-7943993516742528359?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/7943993516742528359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=7943993516742528359' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7943993516742528359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7943993516742528359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_26.html' title='मैं नहीं डरता था, बिके हुए डर से'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-2886854264524206140</id><published>2011-05-22T21:41:00.001+05:30</published><updated>2011-05-22T21:46:41.219+05:30</updated><title type='text'>साधो ये मुर्दों का देश ?</title><content type='html'>एक देश है। देश है तो संविधान भी होगा। संविधान है तो चलाने वाले भी होंगे। चलाने वाले हैं तो गलतियां भी होंगी। गलतियां होंगी तो फिर वो लोग भी होंगे जिनसे गलतियां होती हैं। और वो लोग भी होंगे जो लगातार गलतियों को माफ करते हैं। देश हमारा है गलतियां आम आदमी करते हैं। और माफ करने के लिए राजनेता है। देश के मंत्रिमंडल में एक से बढकर एक मंत्री हैं। एक से बढ़कर एक। एक है कि हर घोटाले में सलिंप्त मिलते है, खुद नहीं तो अपनी बेटी-दामाद के सहारे या फिर भतीजे का रोल निकलता है। दाल से लेकर क्रिकेट तक कोई भी घोटाला हो उनकी मेहरबानी जरूर होती है। देश के अमीर राजनेताओं में भी अमीर। ऊपर वाले से गजब का इम्यून सिस्ट्म बनवाकर लाए है। &lt;br /&gt;देश है तो फिर विदेश भी होगा। लिहाजा एक विदेशमंत्री है। विश्व संसद में दूसरे देश का बयान पढ़ देते है जनाब। पता ही नहीं चलता। उनको लगा चुनावी मेनीफेस्टों की तरह है कि पहला पन्ना उखाड़ दो तो बनाने वाले को भी पता न चले कि किस पार्टी के लिए बनाया था। लेकिन वो विश्व संसद की तरह माने जाने वाला यूएनओ था लिहाजा हल्ला हो गया। लेकिन उन्होंने कहा कि कोई बड़ी गलती नहीं थी। पूरी दुनिया में मजाक हो गया लेकिन वो गरीब-गुर्बों और बेहद पिछडे़ लोगों के देश का हुआ होगा। उनके लिए तो एक बेहद मामूली सा मजाक था। किसी की नौकरी नहीं गयी।&lt;br /&gt;एक गृहमंत्री है। पॉलिशिंग ऐसी की हर कोई हैरान हो जाएं। बौने से मीडिया से इस तरह से अपनी लंबाई बढ़ाई है कि हर कोई कायल उनके काम करने का। किसी को लगता है कि गजब का काम करते है। दिल्ली में आतंकवादी फायरिंग करके निकल गएं लगभग साल होने को किसी को मालूम नहीं। बनारस के घाट पर बम विस्फोट हो गया लेकिन कोई सुराग नहीं। और अब पाकिस्तान को दी गई देश की मोस्ट वांटे़ड़ लिस्ट में एक के बाद एक गलतियां लेकिन जनाब की नजर में ये बेहद मामूली गलती है। एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने कहा कि ये लिस्ट एक रूटीन है बल्कि देने का कोई फायदा नहीं। यानि आठ साल से एक नाटक देश के सामने खेला जा रहा था। अगर मौजूदा गृहमंत्री की माने तो पहले सभी प्रधानमंत्री और मंत्री देश के सामने लिस्ट का एक नाटक खेल रहे थे। एक ऐसा नाटक जिसमें बेहद संजीदगी का अभिनय किया जाता है। यहां देश का मीडिया लिस्ट् को लेकर बेचारा हलकान होता जा रहा था। कभी एक्सक्लूसिव करता था तो कभी विशेष कोई पूछने वाला नहीं था। अब भेद खुला कि भाई ये तो बांकों का नाटक था।&lt;br /&gt;एक मंत्री है। कानून मंत्री है। कानून भी जानते है। पैसे दो और किसी को भी उनकी भाषा में दूध धुला बनवा लो। उनके पास दूसरे भारीभरकम मंत्रालय भी है। साहब को सरकार बचाने की जिम्मेदारी लेनी थी। लिहाजा सुप्रीम कोर्ट ने जिस राजा को प्रथम दृष्टया चोर ठहरा कर सलाखों के पीछे भिजवा दिया उसकी इनसे शानदार पैरवी कौन कर सकता था। देश की संवैधानिक संस्था को गलत ठहरा दिया। बिना उस संस्था के प्रमुख के खिलाफ मामला दर्ज कराएं। बात इतनी तरीके से की एक नया गणित का फार्मूला निकाल दिया। और उस फार्मूले के मुताबिक देश को उस घोटाले में कोई नुकसान नहीं हुआ जिसको सरकार की एक संस्था एक लाख छिहत्तर करोड़ का तो देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी भी तीस हजार करोड़ के बराबर का ठहरा रही है। अब तो सब साफ हो गया लेकिन मंत्री जी नवरत्नों में शामिल है।&lt;br /&gt;एक मंत्री है जो अब पेट्रोलियम संभाल रहे है। उससे पहले शहरी विकास मंत्रालय देख रहे थे। बेचारे जनमोर्चा संभालतें हुए कांग्रेस विकास मंत्रालय संभाले हुए थे। सत्तर हजार करोड़ रूपये के घोटाले में धृतराष्ट्र बने रहे। उनके अफसर घोटाला करते रहे और वो बेचारे मूक दर्शक बनते रहे। जनाब कलमाड़ी साहब तो तिहाड़ में पहुंच गए अपनी बारात के साथ लेकिन मंत्री जी की तरक्की हो गयी।&lt;br /&gt;राजा साहब की बात करना बेकार है। नाम ही राजा रखा गया था पैदा जरूर मध्यम वर्ग में पैदा हुए थे। बेचारे बड़े हुए राजा नाम से लेकिन जनतंत्र में राजा कैसे। फिर एक राज्य में बेहद भावुक और नारों से खेलने वाले लोकतांत्रिक राजा की बेटी के करीब आ गये और बन गए राजा। एक हजार दो हजार नहीं पूरे पौने दो लाख करोड़ का घोटाला कर बैठे। अब अपने राजा की बेटी के साथ तिहाड़ की अलग-अलग कोठरी में बाहर आने की जुगत बैठा रहे है।&lt;br /&gt;ये कहानी आप कितनी लंबी लिख सकते है। इसमें सिर्फ नाम बदलने है और हर कोई फिट बैठ जाएंगा। ये एक ऐसे देश का मंत्रिमंडल है जिसको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। जिसकी तरक्की के कारनामे दुनिया का हर देश गा रहा है ऐसा मीडिया के लोगों का कहना है।&lt;br /&gt;इस पूरे देश में एक बात साफ हो जाती है कि किसी भी अपराधी को आप जिन अपराधों के लिए पकड़ कर जेल में डाल सकते है उसकी आजादी पर रोक लगा सकते है उन्हीं अपराधों को करने पर नेताओं की तरक्की के रास्ते खोल सकते है। &lt;br /&gt;लिखना तो बहुत कुछ है लेकिन मेरी समझ में जो उलझन थी वो सबसे पहले हर्षद मेहता मामले को लेकर सामने आई थी। देश में पांच हजार करो़ड़ का घोटाला हुआ लेकिन इस घोटाले को रोकने की जिम्मेदारी न किसी मंत्री पर गई न किसी ब्यूरोक्रेट पर। किसी ने नहीं पूछा कि भैय्या इन महानुभवों को किस बात के लिए पाला गया देश के आदमियों ने अपने बच्चों के खून को पिला-पिला कर। उसी वक्त राजनेताओं और भ्रष्ट् बाबूओं की जमात को ये रास्ता मिल गया था कि उनके राजनैतिक और नौकरशाह पूर्वज इस देश को लूटने का इंतजाम करके गए है। और रही बात मीडिया की तो वो बेचारा चुनावों में हार- जीत में देश की जनता की समझदारी की तारीफ करने लगता है। ये जानते-बूझते हुए भी कि जातिगत गोलबंदी और छोटे-छोटे लालच के सहारे जीतते है ये राजनेता न कि जनता की किसी सामूहिक समझदारी पर। अगर जनता की समझदारी ही सामने आनी थी तो ये जानना जरूरी है कि इस देश में दहेज खत्म होने की बजाय बढ़ गया है। आर्थिक घोटालों की तादाद एजूकेशन की दर के साथ ही बढ़ रही है। सड़क पर मौतों की संख्या गाडियों की संख्या के साथ होड़ कर रही है। और सबसे बड़ी बात कि पैसठ साल की आजादी के बाद भी देश की राजधानी दिल्ली समेत सभी शहरों चलने वाले वेश्यालयों में गरीब, बेसहारा और जबरदस्ती धंधें में धकेली गईं औरतों की तादाद बढ़ रही है। हां इस बार देश के मीडिया के पास खुश रहने का एक और कारण आ गया देश में महिला राजनीतिज्ञों की बढ़ती हुई ताकत का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-2886854264524206140?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/2886854264524206140/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=2886854264524206140' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2886854264524206140'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2886854264524206140'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_22.html' title='साधो ये मुर्दों का देश ?'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-8989818016109719633</id><published>2011-05-18T10:37:00.003+05:30</published><updated>2011-05-22T08:40:43.146+05:30</updated><title type='text'>ये युवराज भी बौना निकला ?</title><content type='html'>नेशनल न्यूज चैनलों के दफ्तरों में अचानक सनसनी फैल गईं। राजनीति में टीवी चैनलों के सबसे बड़े ब्रांड औऱ देश के अघोषित युवराज बयान दे रहे है। किसानों की राजनीति के टाट में मखमल का पैंबद हो रहे है आजकल ये युवराज।हम भी टीवी के सामने जम गएं कि देखें युवराज की जुबांन से क्या निकलता है। कलावति और गन्ना किसानों के बाद अब युवराज की किस मांग से कांग्रेंस के चारण अपना गला तर करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। देश में राज कर रही पार्टी के युवराज है ये और लोकतांत्रिक भाषा में पार्टी के महासचिव और सांसद भी है। लेकिन उनकी जबान से निकले आरोप तो नगर निगम के पार्षद से भी गये-गुजरे थे।&lt;br /&gt;राजधानी से सटे हुए उत्तरप्रदेश के एक गांव की जमीनों पर बिल्डरों की निगाह है। देश के सबसे बड़े लुटेरों में बदल चुके ये बिल्डर भ्रष्ट्र मुख्यमंत्रियों और नौकरशाहों को जूतों की नोंक पर रखते है। ऐसे ही एक मामले में भट्टा पारसौल गांव के किसानों की जमीन को राज्य सरकार अधिगृहित कर एक कुख्यात बिल्डर को दे चुकी है। लेकिन किसानों ने बाजार भाव से मुआवजें की मांग की और जमीनें देने से इंकार कर दिया।  सत्ता के नशे में मदहोश दलित की बेटी और राज्य की मुख्यमंत्री के लिये तो ये अंग्रेजी राज में किए गए विद्रोहों से भी बुरी बात है। जातियों के दम पर चुनी गई सरकार के लुटेरों को ये बात नागवार गुजरी। आजादी के बाद से ही वर्दी में गुंड़ों के तौर पर काम कर रही पुलिस ने गांव पर हमला बोला दिया। कानून के दम पर किस किस्म की गुंडईं की गई इसके निशान टीवी चैनलों की फुटेज और अखबारों की फोटों से किसी को भी दिख जाएंगे। नादिरशाह ने दिल्ली को जिस तरह से रौंदा था उसी तरह से रौंदा गया होगा वो छोटा सा गांव।&lt;br /&gt;और मीडिया की सुर्खियों के बीच एक दिन युवराज वहां छिप कर पहुंच गएं। वहां से लौटकर प्रधानमंत्री से कुछ किसानों को मिलवाने के बाद मीडिया के आतुर कैमरों को  युवराज ने बयान दिया कि गांव में राख के ढ़ेर है जिसमें किसानों को जला कर राख कर दिया। पुलिस ने घर लूटे और औरतों के साथ बलात्कार भी हुए। देश के युवराज ने ये सब आरोप राष्ट्रीय मीडिया के सामने लगाएँ। हमेशा की तरह युवराज की जर्रानवाजी पर खुश मीडिया में से किसी ने ये सवाल नहीं किया कि क्या ये मंच है। केन्द्र सरकार को संविधान से शक्ति हासिल है कि वो गैरकानूनी काम करने वाली राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकती है। राष्ट्रपति शासन लगा सकती है।&lt;br /&gt;लेकिन युवराज को आरोप लगाना था और तीसरे दर्जे के सनसनीखेज बयानों से यूपी के चुनावों के लिए गिरे-पड़े और कूड़ादान में पहुंच चुके कांग्रेसियों को योद्धा की पोशाक पहनानी थी। लेकिन ये सवाल कहीं से नहीं आया कि पिछले 63 सालों से  पुलिस कानूनों में युवराज की पार्टी ने कभी बदलाव नहीं किया। किसानों से जमीनें लूट रही सरकारों के अधिग्रहण संबंधी कानूनों में बदलाव नहीं किये गये। बुनियादी किसी किस्म का बदलाव नहीं किया युवराज की पार्टी ने। सांसद उनके पास है केन्द्र सरकार उनके पास है। आजादी के 62 साल से ज्यादा के समय में ज्यादातर हिस्से में युवराज के पिता, दादी, और दादी के पिता ने राज किया है। लेकिन  किसी ने ये नहीं सोचा कि किसानों की जमीनों को किस तरह से लूट से बचाया जा सकता है। कैसे देश की आम जनता के लिए मुसीबत बन चुकी पुलिस को ब्रिटिश झंडें की सोच से मुक्त कराया जाएं। न ही ये सोचा गया कि आजादी के दीवानों के परिवार को गोलियों से भूनने वाले, उनके बच्चों को भाले की नोंक पर बींधने वाले और औरतों की सरेआम इज्जत लूटने वाली पुलिस के मैन्यूअल और कानूनों में आमूल-चूल बदलाव किया जाएं।एक बार सोचा तक नहीं गया कि कैसे फर्जी एनकाउंटर करने वाले अधिकारी, लूट में शामिल रहने वाले अधिकारी, बलात्कार और लड़कियों से छेड़छाड़ करने वाले अधिकारी अपनी नौकरियां पूरी कर शान के साथ पैंशन उठाते है। उनके ज्यादातर बच्चें अब विदेशों में पढ़ रहे है या फिर वहां सैटल हो गये है। ये कहानी सिर्फ आईपीएस अफसरों की ही नहीं है बल्कि कई थानेदारों के बच्चे भी विदेशों में जा चुके है। देश की लूट का क्या नंगा सीन है। लेकिन युवराज राज्य पुलिस पर ऐसे आरोप लगा रहे है जैसे उत्तरप्रदेश पाकिस्तान का हिस्सा है और वहां परवेज मुशर्रफ की सरकार शासन कर रही है। &lt;br /&gt;युवराज को हरियाणा में होंडा फैक्ट्री के मजदूरों पर हुए लाठीचार्ज के फूटेज याद नहीं होंगे तीन-चार साल पुरानी बात है। लेकिन महीने भर पहले जैतापुर में खुद उनकी पार्टी की सरकार के ही किसानों पर किये गएं गोलीकांड की याद नहीं ये बड़ी हैरान करने वाली बात है। लेकिन हैरानी उसको होगी जिसने युवराज की ऊंचाईं को मापा नहीं है। &lt;br /&gt;देश के ज्वलंत मुद्दों पर युवराज ने अब तक अपना कोई रवैया साफ नहीं किया है। घुन की तरह देश को खा रहे भ्रष्ट्राचार पर युवराज अपनी पार्टी लाईन पर खड़े होते है यानि विपक्षी पार्टी कर रही है तो भ्रष्ट्राचारी है और यदि अपनी पार्टी का नेता है तो फ्री का चंदन है घिसों और अपने और अपनों के लगाओं। युवराज ने ये नहीं बताया कि राज्य की अकाउँटैबिलिटी के बारे में उनकी क्या राय है। क्यों ये साफ नहीं होता कि फर्जी एनकाउंटर में अधिकारियों की नौकरियां फौरन खत्म होनी चाहिए और पुलिस अधिकारियों पर कानून तोड़ने पर सख्त सजा होनी चाहिएं। ऐसा कोई मौलिक बदलाव हो सकता है इसका कोई अंदेशा भी उनके बयानों से नहीं होता है।&lt;br /&gt; लेकिन एक हैरानी हमको नहीं कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को है कि देश युवराज के आरोपों पर ध्यान नहीं दे रहा। पहले कांग्रेस के युवराज एक करवट बदलते थे और देश के लोग धन्य हो जाया करते थे। आपके राष्ट्रीय चैनल्स और नेशनल अखबारों की कवरेज दिखाती थी ऐसा। पहली बार युवराज संसद में बोले यूपी के किसानों के चीनी मिलों पर बकाया पैसों को लेकर। अखबारों और चैनलों ने काफी प्रशंसा की। एक और बिलकुल गौरा-चिट्टा और हमारे लाट साहिबों के देश से पढ़कर आया युवराज किसानों पर बोला। कितना सुंदर और अभिराम दृश्य था वो जब देश के सबसे बड़े ऐशो-आराम में पला -बढ़ा हुआ एक युवराज गरीब किसानों पर बोल रहा था। कई कांग्रेसी नेताओं का गला रूंध गया बोल नहीं निकले और कुछ तो हर्षातिरेक रो पड़े। आखिर गूंगे युवराज ने मुंह खोला और वोटो की बारिश के लिए कांग्रेसी रो पड़े। &lt;br /&gt;देश के मीडिया ने काफी लिखा। और हमेशा की तरह टीवी का माईक देखकर मुंह खोल देने वाले राजनीतिक विश्लेषकों ने मौसमी बारिश की तरह से राजनीति में नयी बयार पर बयान दिये। कलावति को लेकर संसद में दी गई स्पीच ने युवराज के जनवादी और जननायक के चेहरे को काफी निखारा। इसके बाद भी कभी ट्रेन में आम यात्रियों के साथ यात्रा तो कभी किसी दलित के घर खाने की अदा ने टीवी चैनल्स और अखबारों के पत्रकारनुमा चारणों को मंत्र-मुग्ध किया। लेकिन यूपी में युवराज का गणित थोड़ा गड़बड़ा गया। लोकसभा के चुनावों में चमत्कार का दावा करने वाले कांग्रेसी जनों के पास अब यूपी में अब  कोई तुरूप की चाल नहीं है। वो हैरान है कि गोरे मुंह वाले युवराज की बात जनता नहीं सुन रही है। आखिर युवराज अंग्रेजी पढ़े है, विदेशों में रहे है और देश के जनतांत्रिक राजघराने से ताल्लुक रखते है। उनके दोस्त सब विदेशों से पले-बढ़े है और ज्यादातर अंग्रेंजों के जूते चाटने वाले राजाओं के वंशज है या फिर देश की लूट में सहायक रहे नौकरशाहों के बच्चें।  लेकिन यूपी जातियों का कबीला है। कबीले के नायक बदल चुके है। अपनी-अपनी जातियों के गणित के दम पर इस राज्य में जो राज कर रहे है वो किसी भी लुटेरे को अपनी लूट से आईना दिखा सकते है अपनी लूट को वैधानिक बनाने के प्रयासों से वो किसी भी तानाशाह को रूला सकते है। एक मुख्यमंत्री जो लूट के नये प्रतिमान गढ़ रही है। राज्य का दौरा करती है तो राज्य में अधिकारी कर्फ्यू लगा देते है ताकि कोई बच्चा राजा तो नंगा है वाली कहानी न दोहरा सके। राज्य में राजनीति के दूसरे नायक जो कांग्रेसी रहमो करम पर सुप्रीम कोर्ट में लगे हलफनामें के आधार पर कभी सरकार की तरफ तो कभी दूसरी तरफ दिखते है। जब राज्य के मुख्यमंत्री थे तो लूट में इतने बेशर्म थे परिवार के ज्यादातर सदस्य आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में कोर्ट में है इस बार राजनीति में ईमानदारी के नये नायक बन रहे है। &lt;br /&gt;अब इस ड्रामें में युवराज को कोई भूमिका चाहिएँ तो हीरो की। लेकिन जातिय गणित में वो कहीं फिट न होने के चलते युवराज को ऐसे बयान देने पड़ रहे है। और इन बयानों के सहारे ही सर्कस के उस जोकर की तरह दिख रहे है युवराज जो अपनी लंबाई बढ़ाने के लिए बांस के पैरों का सहारा लेता है और उस पर एक पाजामा ढक लेता है। युवराज के बयानों ने उसके बांस के पैरों पर लगाया गया उसके चारण कांग्रेसजनों और पिट्ठू मीडिया का पाजामा उघाड़ कर रख दिया है। जिसको देखकर एक ही शब्द मुंह से निकला " अरे ये युवराज भी बौना निकला"।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-8989818016109719633?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/8989818016109719633/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=8989818016109719633' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8989818016109719633'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8989818016109719633'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_7165.html' title='ये युवराज भी बौना निकला ?'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-5312071037051371795</id><published>2011-05-18T06:44:00.001+05:30</published><updated>2011-05-18T06:46:51.652+05:30</updated><title type='text'>अब दिन को बोता कौन है</title><content type='html'>सर्द रातों में. रजाईं के अंदर मुड़ें हुए सपनों की दुनिया में &lt;br /&gt;कुछ आवाजें आकर दस्तक देती थी&lt;br /&gt;धीमें-धीमें अँधेंरे में रोशनी को टटोलती आंखों को&lt;br /&gt;दिखता था बीच में रखा एक अंगार &lt;br /&gt;कुछ देर में दिमाग जागता था कि &lt;br /&gt;रात के आखिरी पहर में &lt;br /&gt;हुक्के की बंसी नाच रही है&lt;br /&gt;एक हाथ से दूसरे हाथ और बीच में सुलग रहा चिलम का अंगार&lt;br /&gt;हमेशा मुझे एक अचरज रहा कि कैसे अंधेंरे में &lt;br /&gt;खाटों के घेरे में  बैठें ये बुजुर्ग एक दूसरे के हाथ से ले लेते है हुक्के की बंसी&lt;br /&gt;उन्हीं आंखों के सहारे जिनसे दिन में भी कम दिखता है।&lt;br /&gt;फिर से मेरी आंखें मूंद जाती&lt;br /&gt;जब अम्मा की आवाज से आंखें खुलती तो देखता दिन चढ़ आया घर के कच्चे आंगन में&lt;br /&gt;ताऊजीं और चाचा सब तो जंगल चले गएं।&lt;br /&gt;एक दिन मैंने ताऊ जी से पूछ लिया &lt;br /&gt;क्या करते हो ताऊ जी आप रात के अंधेंरे में जब कोई भी नहीं दिखता बिस्तर के बाहर&lt;br /&gt;हंसी से बिखरते हुए ताऊजीं ने कहा &lt;br /&gt;कि हम दिन को बोते है तुम्हारे लिए &lt;br /&gt;ताकि वक्त का खूड़ तुमकों सीधा मिले।&lt;br /&gt;उनकी हंसी मेरे जेहन में बनी है आज भी &lt;br /&gt;जैसे घर के साफ आंगन में कोई बिखेर दे सफेद चावलों को चादर से उछाल कर।&lt;br /&gt;साल दर साल मैं बड़ा होता चला गया&lt;br /&gt;कम होता चला गया बंसी के हुक्के का घेरा&lt;br /&gt;और मेरा गांव आना जाना।&lt;br /&gt;राजधानी में कभी जरूरत नहीं पड़ी बोए हुए दिन को काटने की&lt;br /&gt;सालों बाद गांव में लौटा &lt;br /&gt;घेर में अकेले बैठे हुए तांबईं से चेहरे वाले ताऊजी को&lt;br /&gt;नौकर के हाथ से भरे हुए हुक्के की बंसी को हाथ में पकड़े हुए&lt;br /&gt;बेहद उदास आंखें, डूबी हुई आवाज से वक्त की डोर को पकड़े हुए&lt;br /&gt;मैंने देखा अब कोई संगी-साथी नहीं है उनके साथ।&lt;br /&gt;लेकिन कई बार बात करते हुए वो भूल कर अपना हाथ बढ़ा देते है अगली खाट की तरफ&lt;br /&gt;जैसे थाम लेगा कोई हुक्के की बंसी को उनके हाथ से&lt;br /&gt;फिर सहसा नींद से जागे हो जैसे वापस अपनी ओर खींच लेते है।&lt;br /&gt;रात को उसी आंगन में सोते वक्त सालों बाद देखा उगे हुए चांद को ठीक उसी तरह &lt;br /&gt;अपने छोटे से बेटे को बगल में लिटाएं&lt;br /&gt; रात भर देखता रहा एक अकेले बूढ़े इंसान की उलझन को&lt;br /&gt;मैं रात भर देखता रहा कब रात का आखिरी पहर हो &lt;br /&gt;कब ताऊं जी उठें औऱ कोई खाटों के बिछे घेरे से थाम ले हुक्के की बंसी &lt;br /&gt;फुसफुसाहटों के शोर से उठ जाएं मेरा बेटा &lt;br /&gt;और ये देख ले कि किस तरह से दिन को बोते है बुजुर्ग&lt;br /&gt;ताकि उसके लिए वक्त का खूड़ हमेशा सीधा रहे।&lt;br /&gt;ताऊ जी की खांसी की आवाज नौकर का उठकर चिलम भरना &lt;br /&gt;और मेरे अंदर जम गएं सन्नाटे में बस एक आवाज थी जिसको गले का रास्ता नहीं मिल रहा था।&lt;br /&gt;ताऊजीं एक बार फिर से दिन को बो दो &lt;br /&gt;मेरे बेटे के लिए ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-5312071037051371795?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/5312071037051371795/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=5312071037051371795' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5312071037051371795'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5312071037051371795'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_18.html' title='अब दिन को बोता कौन है'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-7793947971563955930</id><published>2011-05-09T10:49:00.001+05:30</published><updated>2011-05-09T10:52:37.726+05:30</updated><title type='text'>गोली किसानों पर और रोना डीएम के लिए</title><content type='html'>ईश्वर ने जब अपने बेटों की ओर देखा और सोचा कि इनमें से कौन सा बेटा बाकि सब का ख्याल रखते हुएं अपने छोटे भाईयों का पेट भरेगा। फिर उसने सबसे सीधे और विनम्र बेटे को कहा कि तुम्हें अपने भाईयों का ख्याल रखना है। ये तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तु्म्हारा कोई भाई तुम्हारी वजह से भूखा नहीं सोना चाहिए। और इस सबका पेट भरने के लिए जरूरी है कि तुम सबसे ज्यादा मेहनत करो। दुनिया तुम को किसान के नाम से जानेगी। किसान ने अपने भाईयों को लिया और उसके बाद उसने धरती का सीना चीर कर फसलें पैदा की और अपने भाईयों का उनके परिवार का पेट पाला।&lt;br /&gt;ये कहानी कितनी सच है ये तो नहीं मालूम है लेकिन मानव विकास के दौरान किसानों ने अपने खून-पसीने से इंसानी समाज को सींचा।&lt;br /&gt;लेकिन जब किसान के भाईयों ने  अपने रोजगार फैलाने शुरू किये तो उनको अपने उस भाई का ख्याल नहीं आया जिसने उनको जिंदा रखने में सबसे ज्यादा मेहनत की थी। दलालों, व्यापारियों और सरकारों के बाद किसान को लूटने की बारी बिल्डरों की है। जातियों के नायक बन कर सिर्फ समीकरणों के सहारे सत्ता चलाने का वैधानिक अधिकार हासिल करने वाले बौने नेता सकार बन गए। बौने नेताओं की लाठी बने ब्योरोक्रेट्स जिनको विेदेशी शासकों ने गुलाम हिंदुस्तान की लूट को सुगम बनाने के लिए पैदा किया था। इतने शक्तिशाली कि हजारों करोड़ की लूट के बावजूद उनपर मुकदमा चलाने के लिए अनुमति मिलने में सालों कभी कभी तो दस साल लग जाएं। इन दोनों ने जब किसानो को हर किस्म से निचोड़ लिया तो एक नयी कौम पैदा कर दी और इसका नाम दिया बिल्डर। छोटे-छोटे सौदों में दलाली खाने वाले प्रोपर्टी डीलर अब शहर बसा रहे है। शहर बसाने के लिए जो जमीन चाहिए वो सिर्फ किसान  के पास है लिहाजा उनके इशारे पर टके के राजनेता और रीढ़विहीन ब्यूरोक्रेट किसानों से जमीनें छीन कर उन हवाले कर दे रहे है।&lt;br /&gt;देश भर में किसानों और सरकारके बीच जमीन के अधिग्रहण को लेकर झगड़े-आन्दोलन और प्रदर्शन जारी है। इसी कड़ी में ग्रेटर नौएड़ा में शुक्रवार को जो फायरिंग हुई और दो किसान मारे गए। कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे इन किसानों के साथ झड़प में दो पुलिसकर्मियों की मौत भी हो गई। इस खबर को लेकर न्यूज चैनल्स और अखबारों ने काफी वक्त दिया। राजनीति पर बात करना ऐसे है जैसे कोढियों में खाज के गीत गाना है। सत्ता में जो पार्टी है उसको अपनी कार्रवाई को जायज ठहराऩा है विपक्ष में बैठी तमाम पार्टियां इस वक्त देवदूत की तरह से सरकार के खिलाफ बयान जारी करेंगी या कर चुकी होगी। इस पर बात करना भी उल्टी करने जैसा ही है। कि ये नेता जब सत्ता में थे तब क्या हुआ था। उस वक्त अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहे भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए उऩ लोगों ने क्या इस बारे में को जवाब नहीं मिलेगा और न ही कोई सवाल खड़ा करेगा। लेकिन मैं इस बारे में नहीं सोच रहा हूं। मेरे जेहन में सिर्फ वो खबर है जो न्यूज चैनलों ने दिखाईं और बार-बार दिखाईं। खबर थी ग्रेटर नौएड़ा के डीएम यानि जिलाधिकारी या जिला कलेक्टर को गोली लग गयी। तस्वीरों में ्चो कलेक्टर भाग रहे थे और उनका घुटना खून से सना हुआ था। पूरे न्यूज चैनल्स को लग रहा था कि गुंडों और बदमाश किसानों ने संभ्रात डीएम पर गोली चला दी। कई न्यूज चैनल्स सरकार को इसलिए कोस रहे थे कि किस तरह से कानून व्यवस्था चल रही है डीएम तक पर फायरिंग हो रही है। इसी कड़ी में अगले दिन एक अखबार में खबर थी कि डीएम की पत्नी ने अस्पतालमें गुस्से में मीडिया के कैमरे वगैरह छीन लिये थे। कवरेज को लेकर नाराज थी। लेकिन गांव में पुलिस ने किसानों की फसलें जला दी बुरी तरह से मार की। औरतें और बच्चों का क्या हुआ। इस सब के लिए आपको फोटों  और वीडियों दिख सकते है लेकिन इसकी वजह किसानों को बताया जायेगा प्रशासन को नहीं। मारे गए किसानों के बच्चों का भविष्य क्या होगा। किस तरह से उसकी पत्नी अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करेंगी क्या उसको भी इतना हक होगा कि वो अपने पति की लाश के फोटों खींच रहे फोटो जर्नलिस्ट के कैमरे छीन लेंगी। जवाब  में आपको शायद भी लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी आपका जवाब होगा बच्चें सड़कों पर पलेंगे और बीबी शहर में जाकर बर्तन मांज सकती है और बर्तन मांजने वालियों का कोई निजता नहीं होती। &lt;br /&gt;इस सबके बीच मीडिया की औकात नापने का पैमाना चाहिए तो देखिये कि जिस प्राईवेट कंपनी यानि जे पी गौर के लिए उत्तर प्रदेश सरकार दलालों की तरह से ये काम कर रही है उसका नाम तक लेने में अखबारों और न्यूज चैनलों के पसीने छूट रहे है। किसी विपक्षी नेता की औकात नहीं थी कि वो जे पी गौर की भूमिका की जांच करने की मांग करता। और अब ये भी जान लीजिये कि जिस एक्सप्रेस वे के लिए ये जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है उससे अमीरों के सिर्फ 90 मिनट बचेंगे। ये 90 मिनट कितने कीमती है इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सरकार हजारों किसानों के बच्चों को यतीम कर सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-7793947971563955930?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/7793947971563955930/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=7793947971563955930' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7793947971563955930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7793947971563955930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_09.html' title='गोली किसानों पर और रोना डीएम के लिए'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-9217757409504073933</id><published>2011-05-07T06:46:00.003+05:30</published><updated>2011-05-07T07:21:42.236+05:30</updated><title type='text'>बिन लादेन, दिग्विजय की जुबान और अमरसिंह के जूतें</title><content type='html'>सुबह-सुबह घर में बड़ा हल्ला-गुल्ला मचा था। सारे नौकर इधर से उधर भाग रहे थे। पीए भी पसीना-पसीना हो रहा था। आखिर मामला जूतों का था। वहीं जूते जिन को पहन कर एमपी अमरसिंह बयान जारी करते है। ठाकुर अमर सिंह से अफलातून हो जाने वाले बयान। ऐसे में अमर सिंह के वही प्यारे जूतें गायब हो तो परेशानी स्वाभाविक है। अमरसिंह की त्यौंरियां चढ़ी हुईँ थी आखिर उनकी जुबान माफ करना जूतें घर से कहां गायब हो गये। थोड़ी देर में एक नौकर ने आकर कहा  साहब जूतों का पता लग गया है। लेकिन अब जूतें घर में नहीं है।अमरसिंह ने पूछा कि कहां है जूते, नौकर ने डरते-डरते हुए कहा, टीवी देखिएं साहब। टीवी पर दिग्गी राजा का भाषण चल रहा  था। और उनकी जुंबा जो उगल रही थी उसके बाद अमरसिंह का शक गायब हो गया था कि अमरसिंह के जूतें माफ करना जुबान अब दिग्विजय के पास है। पिछले कुछ दिनों से राजनीतक रिपोर्टिंग कवर करनेवाले रिपोर्टर को समझ में नहीं आ रहा है कि अमर सिंह और दिग्विजय सिंह के बयानों में अंतर खोजना क्यों मुश्किल होता जा रहा है। अमरसिंह ने समाजवादी पार्टी में रहते वक्त अपने उल-जलूल बयानों से टीवी चैनलों में खूब सुर्खियां बटोरी थी। अब अमरसिंह राजनीति के कूडेंदान में है तो ये जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह ने अपने कंधों पर ली हैं। &lt;br /&gt;बचपन की एक कहानी याद आती है कि एक गांव में रामलीला चल रही थी। लेकिन राम का अभिनय कर रहे बच्चें की तबीयत खराब हो गयी। ऐसे में उस रोल के मुफीद कोई बच्चा नहीं मिला तो एक मजदूर के बच्चें को पकड़ कर उस दिन राम का रोल दे दिया गया। गांव में मुख्य अतिथि  जो इलाके का जाना-माना बदमाश को भी आना था। बच्चा जब लकड़ी  के तीर कमान जिन पर चमकीली पन्नी चढ़ी थी और पीतल का मुकुट पहन कर स्टेज पर पहुंचा तो गांव के हर आदमी ने खडे़ होकर कहा जय श्री राम। रामलीला शुरू होने से पहले बच्चें की आरती की गयी और परंपरा के मुताबिक मुख्य अतिथि यानी उस बदमाश ने भी बच्चें के पैर छुएं। बच्चा बहुत हैरान था कि रोज गालियों से नवाजने वाले ये लोग उसको आज इतना सम्मान क्यों दे रहे है। थोड़ी ही देर में उसने अपने दिमाग में तय कर लिया कि ये सब इस मुकुट और तीर कमान की वजह से है। अब उसने निश्चय कर लिया कि वो इस तीर कमान और मुकुट को चुरा कर भाग जाएंगा। रामलीला के खत्म होते ही वो बच्चा मुकुट और तीर कमान के साथ गायब हो गया। अगले दिन सुबह-सुबह बच्चा रात के मेकअप में जब निकला तो गांव के लोग उस पर हंसने लगे, ठहाके लगाने लगे, बच्चा चकरा गया कि ये लोग रात-रात भर में किस तरह से बदल गए है। अमर सिंह के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है। मुलायम सिंह के मजमें में कुछ दिन का मेहमान बनने के बाद अमरसिंह अपनी जुंबान और जूते के साथ भाग निकले लेकिन अब उनको कोई भाव नहीं दे रहा है। &lt;br /&gt;दिग्विजय सिंह का आजकल  हाल कुछ ऐसा ही है। राजनीति का ककहरा पढ़ने वाले भी जानते है कि दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश में कांग्रेस का भट्ठा बैठाने के बाद दिल्ली पहुंचे। उनको उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई। कुछ दिन बाद दिग्विजय की किस्तम का सितारा बुंलद हुआ और कांग्रेस के घोषित सेक्युलर सम्राट अर्जुन सिंह हाईकमान की नजर से उतर गए। और स्वास्थ्य संबंधी कारणों और उससे भी ज्यादा मुस्लिमों में अपनी अपील के खत्म होने से घर बैठ गए अर्जुन सिंह की जगह खाली हो गयी। अपनी राजनीति की शुरूआत अर्जुन सिंह के जूतों में बैठकर करने वाले दिग्विजय सिंह को मौका अच्छा लगा और एक दिन वो अर्जुन सिंह के जूतों में अपना पैर घुसा कर दिग्गी ने अपनी राजनीति के सेक्यूलर रथ की यात्रा शुरू कर दी। उसके बाद से उनके बहुत से अफलातूनी बयान आएं और लोगों को यकीन हो गया कि अर्जुन सिंह के जूतों में दिग्विजय सिंह के पैर सही नहीं जम पाएं। तब अमरसिंह के खाली रखे जूतों का ख्याल दिग्विजय सिंह को आ गया और एक रात उन्होंने वो जूते पहन कर शुरू कर दी अपनी जुबान यात्रा। खास तौर पर अण्णा की टीम पर भ्रष्ट्राचार को लेकर हमले शुरू कर दिए। ये बात अलग है कि दूसरों की भ्रष्ट्राचार की निंदा करने वाले दिग्गी की घिग्गी बंध जाती है जब उनके सामने शरद पवार और दूसरे उनकी खुद की पार्टी के नेताओं का काला चिट्ठा सामने आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौर करने की बात है कि काफी दिन तक दिग्गी और अमर दोनों नेताओं ने आपसी गाली-गलौज की जुगलबंदी करने के बाद गलबहियां शुरू कर दी। कारण अज्ञात है। लेकिन हालिया बयान दिग्गी का आया है। रही बात अमर सिंह तो वो अब पैसे देकर भी पत्रकारों को बुलाएं तो नहीं आते है। उनकी प्रेस क्रांफ्रैंस कुछ नाटक के कारण कभी-कभी चर्चा का विषय बन जाती है। बेचारे जन नेता तो कभी बन नहीं पाएं लेकिन टीवी के लिए मनोरंजन जुटाने में हद तक कामयाब हो गए थे। अब अमरसिंह की समाजवादी पार्टी से रूसवाई के साथ दफा होने के बाद से उनकी धार कम हुई तो मीडिया मनोरंजन का जरिया बन गएं दिग्विजय सिंह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद दिग्विजय सिंह को याद आया कि आतंकवादी या फिर कोई अपराधी मरने के बाद उसके शव को धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए उसका सम्मान करना चाहिएं। हां इस बात को और साफ कर देना चाहिये कि निजि तौर पर दिग्विजय सिंह से कोई वास्ता हमें नहीं है लेकिन हिंदुस्तान जैसे देश की सत्ता संभाल रही पार्टी के जनरल सेक्रेट्री की कोई तो हैसियत होती होगी। ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी की मौत के बाद उसके सम्मान का नारा लगाने वाले दिग्गी के इस बयान से पूरे देश को ही आपत्ति होगी। वोटों की फसल काटने की उम्मीद करने वाले दिग्गी को ये जवाब जरूर देना चाहिये कि अमेरिका को उनकी सरकार ने इस आंतकवादी की गिरफ्तारी या फिर मौत के लिए क्या इनपुट दिए थे। इनकी सरकार से क्या बातचीत की थी। इनका मिलिट्री सहयोग लिया था या फिर कोई दूसरा कारण कि अमेरिका को दिग्गी राजा के बयान पर ध्यान देना क्यों चाहिये था। ये ऐसे बयानवीर है कि ओबामा ने सुबह नाश्तें में जो मुर्गा खाया उसको हलाल किया या नहीं इस पर भी बयान दे सकते है। देश को इस पर क्यों ध्यान देना चाहिए सवाल तो ये भी है। लेकिन एक अरब लोगों वाले देश में एक सत्ता संभाल रही पार्टी का नेता ऐसे बेसिर-पैर के बयान देता है तो लोगों का चौंकना स्वाभाविक है। अमेरिका ने पाक-साफ देश नहीं है।लेकिन वो एक देश है जिसका अपने नागरिकों के लिए एक वादा है कि वो उनके लिए सब कुछ करने को तैयार है। &lt;br /&gt;ओसामा बिन लादेन को अमेरिकी कमांड़ों द्वारा इस तरह मारने के बाद हिंदुस्तानी तथाकथित नेशनल मीडिया को भी ये जोश चढ़ा हुआ है कि हिंदुस्तान को दाउद इब्राहिम को मारना चाहिएं। कभी सेनाध्यक्ष बयान देते है तो कभी पूर्व विदेश मंत्री। टीवी पर खूबसूरत मेकअप के बाद अपनी बेवकूफाना भरी बातों से देश को उल्टी-सीधी जानकारी देने वाले ऐंकर हाथों की आस्तींनें चढ़ाएं बस एक ही बात कर रहे है कि अमेरका की तर्ज पर पाकिस्तान में दाउद का इलाज करना चाहिएं और हां एक और शब्द उधार ले लिया है सर्जिकल स्ट्राईक। आधे से ज्यादा ऐंकर वो है जो निठारी कांड में मंनिनदर और कोली दोनों को किडना सप्लायर साबित करने में जुट गएं थे। बिना ये जाने कि भैय्या किडऩी और सेम का बीज अलग होता है ऐसा नहीं है कि एक की जेब से निकाल कर दूसरे कि जेंब में डाल दिया। हां इतना जरूर जान ले कि ऐंकर जो बोलता है वो सामने स्क्रीन पर पढ़ता रहता है। &lt;br /&gt;देश की सड़कों पर एक लाख से ज्यादा मौत सड़क दुर्घटनाओं में होती है। लेकिन अंग्रेजों के समय से पैसों वाले के मददगार कानून में इतने बदलाव के लिए तो मीडिया लड ले कि भैय्या एक्सीडेंट में किसी को मारने वाले की जमानत थाने से न हो। बेवकूफ बनाने वाले कानूनों से बेहतर है कि कोई सख्त कानून आएं ताकि अपनी मनमानी से किसी कि जान लेने वाले को थाने से जमानत न मिल जाएँ। अमरसिंह के जूतों से चल रहे दिग्गी बाबू को इस पर  ध्यान देना चाहिएं कि किसी आतंकवादी की मौत पर रोने से बेहतर है कि वो इस कानून पर सवाल उठाएं. लेकिन मुस्लिम वोटों को लेकर कुछ ज्यादा ही संजीदा हो तो एक काम कर सकते है ये सिर्फ सलाह है माने न माने उनका काम कि लादेन के नाम से राघोगढ़ में अपनी हवेली में एक मजार बना दे और रात दिन उस पर दिया जलाएं हो सकता है उनकी बंद दुकान में इस बहाने ही सही वोटों के ग्राहक आ जाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-9217757409504073933?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/9217757409504073933/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=9217757409504073933' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/9217757409504073933'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/9217757409504073933'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post_07.html' title='बिन लादेन, दिग्विजय की जुबान और अमरसिंह के जूतें'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-6664773985997979240</id><published>2011-05-02T08:56:00.003+05:30</published><updated>2011-05-02T09:02:01.907+05:30</updated><title type='text'>शाही चुंबन का दीदार, गुलामों का दिल बेकरार</title><content type='html'>एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के दफ्तर की लिफ्ट से उतर रहा था। लिफ्ट में एक बेहद जानी पहचानी सूरत भी थी जिसका नाम याद नहीं आ रहा था। लिफ्ट सफर में अलग-अलग मंजिल पर रूक रही थी। चेहरे डसे पहचानी सी उस महिला के साथ दूसरी महिला ने कहा कि ये दोनो किस पैतालिस सेकेंड के तो होंगे। अचानक याद आया कि ये तो देश की मशहूर लेखिका शोभा डे है। मेरी समझ में अंग्रेजी कम ही आती है लेकिन उस अंग्रेजी में ये भी ये महिला अपनी लेखनी कम उट-पटांग हरकतों और बेकार से वक्तव्यों के कारण ज्यादा जानी जाती है। शोभा डे का जवाब था कि नहीं किस पैतालीस सेकेंड का नहीं था दोनों चुंबन कुल मिलाकर लगभग पैतीस सेकंड के होंगे। और इस के बाद वो लिफ्ट के उस सफर में उन चुंबनों की मीमांसा करती रही। बाद में मालूम हुआ कि चैनल में हुए डिस्कशन में शामिल हो कर लौटी थी दोनो महिलाएं जो डिस्कशन दुनिया में सबसे बड़ी शादी के जश्न में भारत के न्यूज चैनल कर रहे थे। &lt;br /&gt;देश के बे लगाम और छुट्टे सांड की तरह से चल रहे इन न्यूज चैनलों के महान गणितज्ञों की सूचना है कि इस शादी को लगभग दो अरब लोगों ने देखा हैं। पूरी दुनिया की आबादी छह अरब के आस-पास है। इस आबादी में औरते, बच्चे भी शामिल है। हिंदुस्तानी न्यू नक्शें में तो अफ्रीका और एशिया के वो देश भी आते है जहां गरीबी और भूखमरी का साम्राज्य फैला हुआ है। ये अलग बात है कि इस के पीछे सबसे ज्यादा हाथ इंग्लैंड का ही है जिसकी तारीफों के पुल बांधते-बांधते हिंदुस्तानी मीडिया के नौनिहाल थक नहीं रहे है। खूबसूरत ऐंकर कम रिपोर्टर भाव विभोर हो रही है। गोरों के देश में ज्यादातर टीवी चैनलों ने जिन लोगों को भेजा होंगा उनका रंग भी कम से कम इतना गोरा तो होंगा ही कि वो बाकि हिंदुस्तानियों से अलग नजर आएं और बेहतर था कि वो लड़की हो तो फिर इस शादी की कवरेज में टीआरपी की लूट हो जाएं। &lt;br /&gt;मैंने रात को देखा कि न्यूज चैनल्स पर गोरी चिट्ठी एंकर अपने आपको लुभावने लगने वाले लेकिन घटिया से अंदाज में इन दोनों चुंबनों पर चर्चा में जुटी थी। पूरी दुनिया में विकसित देशों में अलग-अलग विषयों पर चर्चाओं का फैशन रहा है क्योंकि ये देश सालों पहले गरीबी और भूख की महामारी से बाहर आ चुके है, लेकिन उन देशों में जहां भूख और कुपोषण आज भी समस्या है वहां चुंबनों पर चर्चा कितनों लोगों में उत्तेजना जगाएंगी ये वाकई दिलचस्प होगा। हो सकता है इस बारे में लंबी बहस हो जाएं कि आखिर दुनिया का इतना बड़ा आयोजन है इसकी रिपोर्टिंग देश के दर्शक जरूर देखना चाहेंगे। लेकिन हमेशा की तरह एक बात जेहन में घूमती है कि कौन से दर्शक है जो इसको देखना चाहते है और देश की खबरों को नहीं। बाबा, अघोरी, तांत्रिक, हंसी, सास बहू और ,,,इसके अलावा बंदर भालू दिखाने वाले चैनल अपने आपको जनता का पहरूआ जब समझते है तो हैरानी होती है। इस शादी की चर्चा अगले दिन के सभी तथाकथित नेशनल न्यूज पेपर्स में भी पहले पेज पर थी। और कोई हैरानी नहीं थी कि शाही चुंबन का फोटो हर अखबार का बिकाऊ माल था। देश के एक तिहाई जिलों में भूख से तड़पते लोग है। बीमारियों से मरते लोग है, राशन और पीने के पानी के लिए भागते और इधर-उधर दौड़ते लोग अब चैनल्स के लिए बिकाऊं विज्यूअल्स नहीं रहे। वो दौर चला गया जब एनडीटीवी इस तरह के विज्यूअल्स दिखा कर टीआरपी बटोरा करता था। आज टीवी में एक दो पत्रकार इसको अपना ब्रांड बनाकर बेचते रहते है लेकिन उनको देखता कोई नहीं है हां तारीफ सब करते है।&lt;br /&gt;देश में चुंबनों पर इतना वक्त जाया करने वाले पत्रकारों को इस बात की याद कितनी है नहीं जानता कि सरकार में अभी भी इस बात की लड़ाई चल रही है कि देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की जनसंख्या को आंकने का फार्मूला क्या हो ताकि उनके नाम पर वोट भी मिलते रहे और उनके नाम पर आऩे वाली राहत राशि को डकारते भी रहे। आखिर कभी ये सवाल क्यों कोई टीवी चैनल नहीं पूछता कि जाम के वक्त गायब रहने वाले कांस्टेबल की तनख्वाह किस पैसे से आती है। यदि वो जाम के वक्त ही गायब है तो उसकी नौकरी की जरूरत ही क्या। शहर में जगह-जगह गर्मी में गर्मी में और सर्दी में सर्दी से दम तोड़ते इंसानों के आधार पर समाज कल्याण विभाग के अफसरों की संपत्ति जब्त क्यों नहीं होती। कभी इस बात पर भी चर्चा हो कि रोड एक्सीडेंट में हर साल अस्सी हजार से ज्यादा दम तोड़ने वाले लोगों के मामले में किसी को भी उम्रकैंद क्यों नहीं होती और तो और इंसान को मारने वाले ड्राईवर को जमानत सिर्फ थाने से ही क्यों मिल जाती है। &lt;br /&gt;बात तो आप चुंबन की कर रहे है फिर इस में गुलामों के हालात पर तरस खाना विधवा विलाप सा ही है। चलिएं यूं ही सही एक बार आप को फिर से शाही चुंबन याद तो रहा। वैसे भी अमेरिकी इशारों पर नाचने वाली सरकार ने इसको देखने के पैसे नहीं वसूले ये क्या मोंटेक सिंह अहलूवालिया का आप पर कम अहसान है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-6664773985997979240?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/6664773985997979240/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=6664773985997979240' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6664773985997979240'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6664773985997979240'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='शाही चुंबन का दीदार, गुलामों का दिल बेकरार'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-1003836855943019196</id><published>2011-04-29T09:39:00.002+05:30</published><updated>2011-04-29T21:59:26.370+05:30</updated><title type='text'>इंग्लैंड के नये गुलाम, लंदन दूर कि कोलकाता ?</title><content type='html'>दिल्ली से लंदन दूर है या फिर कोलकाता ? ये सवाल अटपटा सा है। लेकिन हिंदुस्तान में जो भी इंसान देश के तथाकथित नेशनल चैनल्स को देख रहा हो या फिर देश के अग्रेंजी के स्वघोषित राष्ट्रीय न्यूज पेपर को पढ़ रहा है तो उसका जवाब यही होगा कि लंदन में दिल्ली की आत्मा बसती है। कोलकाता यकीनन कोई दूर-दराज का शहर होगा। लंदन में ब्रिटेन की महारानी के पोते की शादी है। पिछले एक महीने से हिंदुस्तान में मीडिया बौराया हुआ है। किसी चैनल वालों से ये पूछना कि भाई बेगानी शादी में अबदुल्ला दीवाना वाली शादी भी आंख के सामने होगी तो अबदुल्ला दीवाना होगा यहां तो शादी सात समंदर पार है और आप है कि पागलों की मानिंद घूम रहे है। &lt;br /&gt;लंदन और कोलकाता का रिश्ता भी दिल्ली से एक खास है। 1942 में बंगाल में एक अकाल पड़ा था। भूख से मरने वालों की तादाद करोड़ तक पहुंच गयी थी। और जब आप इस अकाल के कारणों पर जाते है तो कई रिपोर्टस इस बात का जिक्र करती कि ये अकाल जितना बड़ा था उससे बड़ा बनाया था लंदन में राज करने वालों ने। हिंदुस्तान की आजादी की मांग को दबाना इसका एक बड़ा कारण था। दूसरा कारण था इंग्लैड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल का घोर नस्लवाली रवैया। हिंदुस्तानी से पागलपन की हद तक नफरत करने वाले चर्चिल ने इस बात की जानकारी के बावजूद की करोड़ों लोग भूख से तड़प रहे है इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया। दूसरे राज्यों से भेजा गया अऩाज जानबूझ कर जमाखोरों के हवाले कर दिया ताकि बेतहाशा मंहगी कीमत से बंगालियों और भारतवासियों की कमर टूट जाएं। &lt;br /&gt;देश की यारदाश्त बहुत कम है और जवान हो रही पीढ़ी की किताबों में ये बात मिलना भी मुश्किल है। लेकिन उस पीढ़ी को घूंट में पिलाया जा रहा है कि जॉन मेजर और गॉर्डन ब्राउन को न्यौता नहीं दिया है। देश के मुख्यमंत्रियों के नाम भले ही उस युवा और खूबसूरत ऐंकर/रिपोर्टर को न मालूम हो लेकिन ब्रिटेन की किस महारानी ने कब क्या पहना था उसे पूरी तरह से याद है। विदेश को कवर करने वाले पत्रकार वहां है देश में क्या चल रहा है इस बारे में किसी को शायद दो लाईन भी नहीं मालूम है। हिंदुस्तान के पडौसी देशों में क्या हालात है इस बारे में भी कई रिपोर्टर दो लाईन से ज्यादा बोल नहीं सकते है और वो लाईनें भी भारत सरकार के ब्यूरोकेट के बताई गयी होती है। लेकिन ब्रिटेन की दुल्हन कैट मिडलटन के मां-बाप का ताल्लुक किस खानदान से है इसका ब्यौरा उंगलियों पर है। कई रिपोर्टर की आंखों में इस कवरेज के दौरान जो चमक दिख रही है वो इस बात को दिखाती है कि वो रिपोर्टर से कम हीरोईन और हीरों के रोल में खुद को ज्यादा देखते है। उनका काम सूचना देना नहीं ग्लैमर की चांदनी स्क्रीन पर देना है। &lt;br /&gt;बात वापस कोलकाता पर। पैतीस साल से ज्यादा शासन कर रहे वाम मोर्चे के खिलाफ पहली बार कोई पार्टी इस हैसियत में आई है कि उसे चुनौती दे सके। लेकिन दिल्ली में बैठे मीडिया के मठाधीशों की रूचि उसमें नहीं है। बंगाल में किस कदर बदलाव की कसमसाहट है इसका कोई ब्यौरा किसी न्यूज चैनल्स पर नहीं है।&lt;br /&gt;बात तो बहुत लंबी है लेकिन देश में खुदीराम बोस और चापेकर बंधुओं की याद रखने वाले कितने लोग होगे। इस बात पर मैं पूरा इत्मीनान रखता हूं कि विदेश यात्रा पर घूम रहे और ब्रिटेन के महाराजा को माई-बाप कहने वाले इन रिपोर्टर को जरूर इस बात से कोई नाता नहीं होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-1003836855943019196?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/1003836855943019196/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=1003836855943019196' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/1003836855943019196'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/1003836855943019196'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/04/blog-post_863.html' title='इंग्लैंड के नये गुलाम, लंदन दूर कि कोलकाता ?'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-3112139405890776186</id><published>2011-04-18T09:07:00.001+05:30</published><updated>2011-04-27T09:25:47.876+05:30</updated><title type='text'>सचिन तेंदुलकर को नहीं राखी सावंत को दो भारत रत्न:</title><content type='html'>लगभग 6 महीने बाद आज कोई शब्द लिख रहा हूं। मैं कोई ऐसा लेखक नहीं हूं कि लोग मेरे लिखने का इंतजार करे। न ही मेरे लिखे का मेरे अलावा किसी के लिए कोई अर्थ है। लेकिन खुद के लिए ही आज छह महीने बाद ही की बोर्ड पर टाईप कर रहा हूं। मैं किसी यात्रा पर नहीं था। कुछ दिन इधर-उधर रहा। देश की सत्ता यानि दिल्ली से खासा दूर आया गया। कई यात्रा बेमकसद और बेवजह की। जाने कितने लेखकों ने कहा कि यात्रा आपको नये शब्द देती है। मुझे लगा बेमकसद यात्राएं बस यात्राएं होती है और कुछ भी नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले छह महीनों में देश भर में हमेशा की तरह कुछ न कुछ चलता रहा। इस दौरान देश के तथाकथित नेशनल मीडिया को काफी कुछ मिला। पैसा और हमेशा की तरह बिकाऊं खबरें और सबसे बड़ा था क्रिकेट का दीवानापन। एक देश जहां लाखों की तादाद में दीवानें हों वहां आशिकी के लिए एक ऐसा खेल जिंदा है जो साहब लोगों की याद दिलाएं रखता है। यानि खोना कुछ भी नहीं और साहब बन जाना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई खास चीजें इस मायने से गुजरी। हिंदुस्तान ने क्रिकेट वर्ल्ड कप जीत लिया। लगता था जैसे सदियों पुरानी कोई ख्वाहिश उतरी और पूरी हो गयी। टीवी चैनल्स कब ऐंटरटेनमेंट में बदल गए इस का किसी को पता नहीं चला था। लेकिन न्यूज चैनल्स क्रिकेटटैनमैंट में जब बदले तो सबको पता चला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में बैठने भर से वो नेशनल हो जाते हैं, क्योंकि दिल्ली से देश की सत्ता का कारोबार चलता है। दिल्ली का वायसराय हाउस जिसे गांधी जी एक खैराती अस्पताल में बदलना चाहते थे लेकिन नेहरू एंड कंपनी ने उसे राष्ट्रपति भवन में बदल दिया,के पास के कमरों से ये देश चलता है। भौगोलिक सीमाओं में बंधा एक संवैधानिक तौर पर कागजों के पुलंदों में बंधा देश। नेशनल चैनल्स के लिए जब सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देना हो तो संख्या बल बढ़ाने वाला देश। लेकिन अभी असम में एक चुनाव हुआ है। असम भी इस देश का राज्य है। इस राज्य में अभी क्रिकेट की कोई ऐसी टीम नहीं है जिससे तथाकथित नेशनल न्यूज चैनल इसको दिखा सके। लिहाजा ये चुनाव भी देश के नेशनल न्यूज वालों को नहीं दिखा। लेकिन न्यूज चैनलों का ऐंकर चिल्ला-चिल्ला कर इस राज्य की जनसंख्या को भी जोड़कर कि सचिन को भारत रत्न देना सवा अरब भारतीयों की मांग है। ये सवा अरब कहां से आते हैं भाई। असम पूर्वोत्तर की सात बहनों का मुख्य द्वार है। यहां से गुजर कर आप इस देश के सात राज्यों को छू सकते है देख सकते है और अहसास कर सकते है। लेकिन इस राज्य में सरकार का चुनाव हो रहा है और नेशनल न्यूज चैनलों को दिख नहीं रहा है कि चुनाव में कौन खड़ा है कौन मुद्दें हैं और क्या कहना है देश के इस राज्य का। &lt;br /&gt;ये तथाकथित न्यूज चैनल्स सही मायनों में आतंकवादियों का एक मंसूबा तो पूरा करते ही है कि पूर्वोत्तर हो या फिर कश्मीर सबमें आतंकवादियों का एक ही तो गाना है कि दिल्ली को न आपकी परवाह है और न वो आपको अपने अंदर गिनती है। आप न्यूज चैनलों का न्यूज कंटेंट देख लीजियें एक महीने का टोटल न्यूज एअऱ टाईम मिला लो तब भी पांच मिनट टोटल आपको पूर्वोत्तर या गैर हिंदी भाषी राज्य की खबर नहीं मिलेंगी। ये कैसे राष्ट्रीय न्यूज चैनल है भाई।&lt;br /&gt;इस बार देश के राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स की जबान पर एक ही बात लगी हुई है कि देश के सवा अरब लोगों की मांग सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न। कई न्यूज चैनल्स तो इस बात के लिए आत्मदाह तक करने को तैयार दिखते है कि भाई जल्दी दो, जल्दी दो। वर्ल्ड कप के मैंचों में भारत का राष्ट्रीय तिरंगा लहराने के अलावा पूरे स्टेडियम में कही भी देश नहीं दिखता। बीसीसीआई की टीम है हर टीम का खिलाड़ी करोड़पति है। कंपनियों के बैनर तले खेल रहा है। ये खेल अब भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा बाहर कही खेला नहीं जाता। हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी पैसे से बनी आईसीसी के लोगों ने पूरा पैसा उडेला लेकिन किसी भी देश में ये खेल लोकप्रिय नहीं हुआ। न्यूजीलैंड, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज इन तमाम देशों से क्लब के तौर पर ये खेल गायब हो गया।वहां खिलाड़ियों को इकट्ठा करना ही समस्या है।लेकिन गरीबी के महासागर में लूट कर नए बने अमीरों के देश भारत में अब ये राष्ट्रीय खेल है। एक ऐसा खेल जिसमें आठ देश ही दुनिया है। जिसमें जीत पर कोई पोडियम पर नहीं चढ़ता राष्ट्रगान नहीं होता।&lt;br /&gt;ऐसे खेल के महानायक सचिन तेंदुलकर ने इस देश का ऐसा कौन सा मान बढ़ाया है ये बताना उस ऐंकर के लिए भी मुश्किल होगा जो चिल्ला-चिल्ला कर सचिन को क्रिकेट का भगवान बताने में जुटा रहता है।  सिर्फ मनोरंजन है ये खेल। मल्टीनेशनल कंपनियों का खेल। पैसे कमाने में लिप्त भ्रष्ट्र राजनेताओं से भरी एडमिनिस्ट्टेटिव कौंसिल के सहारे चल रही इस मांग में ऐसा क्या है जिससे इस पर ध्यान दिया जा सके।&lt;br /&gt;मुझे लगता है खेलों की दुनिया में क्रिकेट की हैसियत इससे ज्यादा कुछ भी नहीं जैसे डब्लू डब्लू एफ की कुश्तियां। उस खेल में भारत के खली ने काफी हल्ला किया है। स्टेडियम भरे रहते है बच्चें भी उस खेल के दीवाने है तो खली को क्यों नहीं भारत रत्न देने की मांग उठती है। आखिरकार वो भी तो मनोरंजन के खेल में भारत का झंडा उठाये है। और उसमें दुनिया भर के पहलवानों में खली ही अकेला हिंदुस्तानी है। सचिन तेंदुलकर से ज्यादा प्रतिभाशाली हुआ इस हिसाब से तो। &lt;br /&gt;रही बात मनोरंजन करने की और इस लिहाज से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने की मांग उठ रही है तो अपना वोट राखी सावंत के लिए है। जो बेचारी इससे भी कम पैसे में देश का मनोरंजन कर रही है। उसके लिए भी लोग टीवी पर बैठते है वो  भी जाती है लोग देखने आते है। और किसी न किसी तरीके से वो देश के मनोरंजन के लिए मसाला जुटाती है। लिहाजा मेरे वोट की कोई कीमत है तो मैं अपना वोट भारत रत्न के लिए राखी सावंत को देता हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-3112139405890776186?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/3112139405890776186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=3112139405890776186' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/3112139405890776186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/3112139405890776186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='सचिन तेंदुलकर को नहीं राखी सावंत को दो भारत रत्न:'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-7909149764131258566</id><published>2010-11-20T11:34:00.002+05:30</published><updated>2010-11-20T11:36:13.205+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राहुल गांधी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनमोहन सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वीर सांघवी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बरखा दत्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोनिया गांधी'/><title type='text'>प्रधानमंत्री ईमानदार है ?</title><content type='html'>रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था। रोम साम्राज्य के खत्म होने के सैकड़ों साल बाद भी ये कहावत जिंदा है। यानि इतिहास उन सबका हिसाब रखता है जो इतिहास को भूल जाते है या पीठ दिखाते है। देश के बेबस ईमानदार प्रधानमंत्री इस समय नीरो को मात देने में लगे है। देश भर में लूट चल रही है। देश बिक रहा है। देश को राज्यों में बांटा गया था शासन चलाने के लिये लेकिन इस प्रधानमंत्री ने देश को बांट दिया लूट के लिेये। ये कैसे ईमानदार प्रधानमंत्री है भाई। इनको मालूम है इनके मंत्रिमंडल में शामिल लुटेरे देश का सौदा कर रहे है। लेकन बेचारे प्रधानमंत्री को अपनी कुर्सी बचानी है युवराज के लिये। युवराज कह रहा है कि प्रधानमंत्री को शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है। ये बात बिलकुल दुरूस्त है। देश को शर्मिंदा होना चाहिए ऐसे प्रधानमंत्री होने पर। क्या खडाऊं प्रधानमंत्री युवराज और राजमाता के आदेश पर देश चला रहे है। सोनिया गांधी का बयान आया कि देश को और जिम्मेदार सरकार चाहिए। कौन देगा सरकार। आपको बहुमत मिला और आपने ऐसे लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल कर दिया जो महमूद गजनवी और नादिरशाह जैसे लुटेरों को भी मात देने में जुटे है। ऐसे मंत्रियों पर लगे आरोपों में हजार दो हजार करोड़ के घपले का नहीं लाखों करोड़ के मामले शामिल है। लेकिन सोनिया को नहीं लगता कि कोई जवाबदेही का कानून बनाया जाए।&lt;br /&gt; देश के तथाकथित नेशनल मीडिया की औकात कितनी है ये लगातार हम आपको बताते रहे है। देश में चल रही लूट पर पर्दा डालकर हमेशा एक सवाल को गायब करना ही इस नेशनल मीडिया की कोशिश रही है। सवाल है जवाबदेही का। संविधान में इस बात की गुंजाईश छोड दी गई कि अंग्रेजों से बेहतरीन अंग्रेजी बोलने वाले काले नौकरशाहों और राजनेताओं को दान में मिले देश को लूटने के बाद किसी तरह की जवाबदेही न हो। खानदान राज कर रहे है। राजवाड़े जिनके होते लगातार देश अपमानित होता रहा शर्मिंदा होता रहा उनकी औलादें शान के साथ देश की लूट में शामिल हो गई। हाल ही में जोधपुर के एक पूर्व महाराजा के बेटे की शादी का ऐसा वर्णन देश के तथाकथित मीडिया ने किया कि भाट और चारण भी शर्मा जाएं। 1857 की आजादी की लडाई में जिन घरानों का इतिहास अंग्रेजों के जूते चाटने और देश भक्तों को मारने में रहा वो आज जनतंत्र के नाम पर जीत कर संसद में बैठते है कानून बनाते है लेकिन किसी अखबार या चैनल को नहीं लगता कि उस दौरान की कहानी भी चला दी जाए।&lt;br /&gt;देश की आजादी की ताकत को लुटेरों की हिफाजत में लगाने वाले तथाकथित राष्ट्रीय पत्रकारों के चेहरे बेनकाब हुए है। बरखा दत्त, वीर सांघवी जैसे नामचीन पत्रकारों की बातचीत की रिकार्ड़िंग ये बताती है कि सत्ता में कितने बौने लोग आ गए जो इनको दलाल की तरह से इस्तेमाल कर रहे है। बरखा दत्त जैसी पत्रकार उन लोगों को बेहद पंसद है जो लूट को वैधानिक बनाने के रास्ते तलाशते है। बरखा दत्त की कितनी कहानियां मीडियाकर्मी सुनाते है अगर उनको उसी तरह से लिख दिया जाएं जिस तरह मीडिया बेबस और आम आदमी की कहानी को दिखाता है तो क्या बात हो।&lt;br /&gt;2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में सत्ता में बैठी कांग्रेस किस तरह से गिरगिट की तरह से रंग बदल रही है। देश को नए-नए कानून बता कर देश को उल्लू बनाने में जुटी है &lt;br /&gt;कांग्रेस। मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के वक्त देश के तथाकथित मीडिया ने ऐसा माहौल बनाया था कि जैसे सत्यवादी हरिश्चन्द्र का अवतार आ गया हो। ईमानदारी ने साक्षात इंसानी अवतार लिया हो  और नाम रखा मनमोहन सिंह। ऐसा ही माहौल तैयार किया गया था वीर सांघवी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों ने। आज प्रधानमंत्री की ईमानदारी छवि के सारे पर्दे हट चुके है। लेकिन इस छवि के सहारे मलाई काटने वाले आज भी ये नारा लगा रहे है कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर दाग नहीं है। ये ऐसे ही है जैसे कोई आदमी लुटेरों को वकील मुहैय्या करा रहा हो और जब उसकी कलई खुले तो कहे कि भाई हमारा तो कोई दोष नहीं है हम तो महज मदद कर रहे थे।&lt;br /&gt;लेकिन ये बातें तो वो जो आप देख सुन रहे है।लेकिन हम आपसे एक सवाल पूछना चाहते है कि देश में प्रधानमंत्री का काम क्या है। क्या है उसकी जिम्मेदारी। और यदि जिम्मेदारी नहीं निबाह पाया तो उसकी सजा क्या हो। ऐसा कोई भी सीधा जवाब संविधान में नहीं है। देश की संस्थाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है इस देश को लूटने वालों को बचाने में। देश का तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया नाटक कर रहा है। नूरा कुश्ती कर रहा है। वो दिखा रहा है कि जैसे बीजेपी इस मसले पर चिंतित है। समाजवादी पार्टी के एक महान चिंतक मोहन सिंह ने तो कमाल ही कर दिया। अगर अखबार में छपे उनके लेख पर देखे कि सुप्रीम कोर्ट को प्रधानमंत्री पर सवाल करने ही नहीं चाहिए। ये मोहनसिंह भी वहीं है जिनकी समाजवादी छवि के चर्चे देश के तथाकथित मीडिया वाले लगातार गाते रहे है। दरअसल पूरे देश की राजनीति सिर्फ परिवारवाद और जातिवाद के दम पर चल रही है। ये लोग सिर्फ जाति के कबीलों के सरदारों के जूते उठा कर राजनीति कर रहे है। और देश को लूट रहे है। &lt;br /&gt;सबसे ज्यादा फायदे में है देश के नौकरशाह। आजादी के वक्त किसी को ये पूछने की परवाह नहीं थी कि जो नौकरशाह 14 अगस्त 1947 को यूनियन जैक के नाम पर देश चला रहा है वो 15 अगस्त 1947 को कैसे तिरंगे की शपथ लेगा। जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन देश को पड़ता था। आज कई जिलों में मैं जब ऐसे बोर्ड देखता हूं जिनमें आजादी से पहले एसपी और डीएम का नाम लगातार लिखा हुआ देखता हूं तो सिर्फ एक ही ख्याल जेहन में आता है कि रंग बदला है लुटेरे नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-7909149764131258566?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/7909149764131258566/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=7909149764131258566' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7909149764131258566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7909149764131258566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/11/blog-post_1765.html' title='प्रधानमंत्री ईमानदार है ?'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-7450658817451832722</id><published>2010-11-01T21:20:00.000+05:30</published><updated>2010-11-01T21:21:50.793+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देशभक्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कारगिल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सेनाध्यक्ष'/><title type='text'>सेना के (खळ) नायक</title><content type='html'>शर्म की बात है तो ये कि पैसे के लिये बिकने वाले और अपना ईमान बेचने वालों में अब सेना के लोग भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे है। इस मामले में ये घोटाला तो आदर्श है कि जल सेना, थलसेना और वायु सेना तीनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारियों ने लूट में सामूहिक हिस्सेदारी ली। ये वो लोग है जो अब मासूमियत का दिखावा करते हुए फ्लैट वापस करने की पेशकश कर रहे है। कितने बेवकूफ अधिकारी रहे होंगे अगर इनको इतना भी नहीं मालूम होगा कि 8 करोड़ का फ्लैट 80 लाख में मिल रहा है तो क्या कारण है। दरअसल इतनी मासूमियत से ये लोग ईमानदारी का गला घोंटते है कि इनके लिये गला भर आएं। इन लोगों की सेलरी का हिसाब निकाल लिया जाएं और इनके रहन-सहन का स्तर किसी स्वतंत्र तरीके से चैक करा लिया जाएं तो आसानी से पता चल जाएंगा कि किस तरह से देश की लूट में इन महानुभवों ने अपना योगदान दिया होगा। &lt;br /&gt;करगिल युद्ध। 1971 के बाद पहली बार इतने जवान और अधिकारियों की शहादत हुई। आजतक भी उस वक्त सत्ता में बैठे लोगों या फिर बाद में सत्ता में आएं लोगों ने इस बात का जवाब नहीं दिया कि कैसे आतंकवादी इतनी तादाद में भारतीय सीमा के अंदर घुस आएँ। कैसे बंकर बने कैसे रणनीतिक कब्जा किया गया। लेकिन सेना के अधिकारियों को तो जवाब देना था कि कैसे हुआ ये सब। अब आदर्श घोटाले ने जरूर देश को ये यकीन दिलाया कि किस तरह से ये मासूम अफसर अपना दायित्व निबाह रहे होंगे। कारगिल के शहीदों के नाम पर किस तरह से लूट की। इन अफसरों के सैकड़ों फोटो सेनाओं के ऑफिसों में लगे होंगे जिनमें ये कारगिल के शहीदों के प्रति अपना सम्मान जता रहे होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-7450658817451832722?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/7450658817451832722/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=7450658817451832722' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7450658817451832722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7450658817451832722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/11/blog-post_01.html' title='सेना के (खळ) नायक'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-824637418278998385</id><published>2010-11-01T21:17:00.001+05:30</published><updated>2010-11-01T21:20:42.259+05:30</updated><title type='text'>आदर्श घोटाला....सत्ता बेनकाब</title><content type='html'>ये एक आदर्श घोटाला है। एक मौजूदा मुख्यमंत्री दो पूर्व मुख्यमंत्री जो अब केन्द्रीय मंत्री हैं रीयल स्टेट घोटाले की जांच में है। दो पूर्व थलसेनाध्यक्ष एक पूर्व नौसेनाध्यक्ष और पूर्व वायुसेनाध्यक्ष ये सब आदर्श सोसायटी स्कैम की जांच के दायरे में हैं। इतने पर बस नहीं है महाराष्ट्र सरकार के कई मौजूदा मंत्रियों सहित कई पूर्व मंत्री इस जांच के दायरे में हो सकते है। इसके अलावा राजस्व विभाग के नौकरशाह और नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट्स देने वाली सरकारी एजेंसियों के नौकरशाह अभी पर्दे के पीछे है लेकिन जल्दी ही उनके नाम का भी हल्ला मच सकता है। हैरानी की बात नहीं है। देश में लूट की आदर्श स्थिति चल रही है। संविधान में लुटेरों को रोकने का कोई खास प्रावधान नहीं है। लूट की छूट में कोई व्यावधान नहीं है। इस देश में घोटाले की जांच भी एक बेहद पसंदीदा खेल है और खेल है तो खेला जाना चाहिएं। इसीलिये खेल शुरू हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जांच के आदेश दे दिये है। देश के रक्षामंत्री ए के एंटनी और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी जांच करेंगे। वित्त मंत्री कांग्रेस की इस सरकार के ट्रबल शूटर है। हर मामले की जांच में वही होते है। कांग्रेस के लगुवे&lt;br /&gt;-भगुवे बहुत खुश हुएं। पार्टी इस जांच में दूध का दूध पानी का पानी कर देंगी। लेकिन क्या ऐसा हो सकता है। जांच कमेटियों की रिपोर्टें रद्दी की टोकरी में पड़ी पड़ी नष्ट हो जाती है। जांच करने वाले के खिलाफ भी कोई न कोई घोटाला सामने आ जाता है। और लोग भूल जाते है। नया कोई घोटाला पुराने की याद तो मंद कर देता है। &lt;br /&gt;सबसे पहले देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी की बैठाई गई जांच पर बात की जा सकती है। इस घोटाले की जांच सीबीआई भी कर सकती है। इस घोटाले की जांच रक्षा मंत्रालय भी कर रहा है। कई सारे सवाल है। यदि कांग्रेस अध्यक्ष को जांच करानी थी तो सीबीआई को खुली छूट दी जा सकती थी। कानूनन तो पुलिस भी जांच कर सकती थी। लेकिन मुख्यमंत्री की जांच करेंगे केन्द्र के दो मंत्री। प्रणव मुखर्जी साहब को अभी कागज पढ़ने है। कागज तो साफ है मुख्यमंत्री के तीन -चार रिश्तेदारों के नाम फ्लैट है। इसके अलावा जांच के लिये पार्टी को कुछ करना नहीं है। क्योंकि वो तो जांच एजेंसियों का काम है। कांग्रेस पार्टी ये साबित करने में लगी रहती है कि उनके प्रधानमंत्री खड़ाऊं प्रधानमंत्री नहीं है और राज-काज के फैसले खुद लेते है। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष ने इस मामले में देश के प्रधानमंत्री के देश में वापस लौटने का इंतजार भी नहीं किया। बेबस से ईमानदार प्रधानमंत्री को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यदि अखबारों में छपी खबरों पर यकीन किया जाएं तो प्रधानमंत्री ने एक सवाल के जवाब में ऐसा जवाब उन्होंने एक पत्रकार को जवाब दिया था। खैर प्रधानमंत्री की असली राजनीतिक ताकत की हकीकत राजनेता भी जानते है और आम जनता भी। लेकिन सवाल फिर घूम-फिर कर वही आ रहा है कि सरकार ने कॉमनवेल्थ की जांच के लिये भी एक कमेटी बना दी शुंगलू साहब की अध्यक्षता में। सीबीआई पर कुछ समय से ये आरोप ज्यादा चस्पा हो रहा है कि वो सत्ता में बैठे लोगों की धुन पर नाचती रहती है। इसके बावजूद सीधे सीबीआई को क्लियर कट जांच क्यों नहीं दी गई। ये सवाल सीधे जेहन में नहीं उतर रहा है। लेकिन लोग जो जांच पर भरोसा करते है वो इस ख्याल में खो सकते है कि इसका कोई मतलब है। चारा घोटाला, ताज कॉरी़डोर, गोमतीनगर विपुल खंड प्लॉट स्कैम, मधु कोड़ा की अकल्पनीय लूट, चौटाला का टीचर भर्ती घोटाला, या फिर ऐसी एक लंबी लाईन है जिसका कोई अंत नहीं है। आप की संसद और विधानसभा आजतक एक भी ऐसा कानून नहीं बना पाय़ी कि ऐसे मुख्यमंत्रियों को फौरन दंड मिल सके। इनके लिये कानून के एक होने की बात की जाती है। लेकिन क्या आप ऐसी छूट की उम्मीद किसी जेंबकतरें या फिर रहजन के लिये कर सकते है। नहीं जेबकतरों को  पब्लिक सड़कों पर पीट-पीट कर मार देती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-824637418278998385?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/824637418278998385/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=824637418278998385' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/824637418278998385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/824637418278998385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='आदर्श घोटाला....सत्ता बेनकाब'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-8262394426110475706</id><published>2010-10-30T21:05:00.001+05:30</published><updated>2010-10-30T21:07:59.460+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देशभक्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आजादी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिव्यक्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कश्मीर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अरूंधती'/><title type='text'>अरूंधती रॉय के बहाने</title><content type='html'>अरूंधती रॉय के खिलाफ सबूत है, लेकिन सरकार मुकदमा दर्ज करके उसे हीरो बनने का मौका नहीं देना चाहती एक तथाकथित राष्ट्रीय अखबार ने सूत्रों के हवाले से छापा।कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर फारूख के पिता और केन्द्रीय मंत्री फारूख अब्दुल्ला साहब ने फरमाया अभिव्यक्ति की आजादी की भी एक सीमा है।  दिल्ली के तथाकथित नेशनल मीडिया की खबरों पर जाएं तो लगेगा कि देश लगभग उबल रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ने अपना धर्म निबाहा। अखबारों और न्यूज चैनलों को इंटरव्यूज देकर। पार्टी के नेताओं ने एक दो नेशनल चैनल्स की बहस में शामिल होकर भी निंदा की अरूंधती रॉय की। कुछ लोगों को हैरानी हुई कि आखिर अरूंधती चाहती क्या है। &lt;br /&gt;हमारा अरूंधती रॉय के बयान से कतई इत्तफाक नहीं है। क्योंकि कश्मीर पूरे तौर पर देश का हिस्सा है इसके बारे में हमें कोई संदेह नहीं है। &lt;br /&gt;लेकिन ऐसा क्या कह दिया है अरूंधती रॉय ने कि देश के गृहमंत्री से लेकर कानून मंत्री और राष्ट्र के प्रति देशभक्ति का सारा ठेका अपने सर पर ढ़ोने वाली बीजेपी एक ही जबान बोल रहे है। अरूंधती रॉय का मंतव्य कश्मीर की आजादी के पक्ष में था। अरूंधति राय की इस राय से सहमति रखने वाले लोगों की संख्या उँगलियों पर ही होगी इस बारे में किसी को शक नहीं हो सकता। कश्मीर के चंद अलगाववादियों और आतंकवादियों के अलावा किसी की इस राय से सहमति नहीं हो सकती। लेकिन इस बात का ऐसा बंतगड़ बनाया गया कि जैसे दिल्ली में आसमान टूट गया और किसी की नजर इस पर नहीं है।  और तथाकथित नेशनल मीडिया ने इसी बात को लेकर ऐसे तमाम लोगो को हीरो बना दिया जिनके कर्मों की वजह से कश्मीर की ये हालत हुई है। ऐसे तमाम लोग जो देश की सत्ता पर काबिज है और जिनका कश्मीर से इंच मात्र भी लेना-देना नहीं है सिर्फ बयानबाजी करके देशभक्ति दिखाते है, इन तमाम बयानवीरों को लगा कि हीरो बनने का इससे शानदार मौका नहीं मिलेगा। लेकिन कोई इनसे पूछेगा कि भाई देश का कानून यदि टूटा है तो क्या वो भी आपके आदेश से ही रिपोर्ट लिखेगा ये काम तो अदालतों का था लेकिन केन्द्रीय मंत्रियों को न्यायालय की ताकत भी अपने खीसे में खोंसने का शौक चर्रा गया है लिहाजा वो कह रहे है कि सबूत है लेकिन वो अरूंधति को हीरो बनने का मौका नहीं देना चाहते। उद्योगपतियों और बिल्डर माफियाओं के इशारों पर नाचने वाले तथाकथित नेशनल मीडिया को भी लगा कि जैसे बैठे-बैठे देशभक्ति दिखाने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा। आखिर राज्यों को लूटने में शामिल मुख्यमंत्रियों और कानून को ठेंगे पर रखने वाले उद्योगपतियों के खिलाफ इस खबर में कुछ नहीं है लिहाजा ऐडवर्टाईजमेंट छीनने का  भी खतरा नहीं है और अरूंधती को कोसते हुए कार्टून तक इन अखबारों में दिखाईं देने लगे। &lt;br /&gt;हमारा मानना है कि इस बारे में दिमाग साफ कर लिया जाएं कि तथाकथित नेशनल मीडिया का देश कितना है। चुनावों में पैसे लेकर खबरें लिखने वाले इस नेशनल मीडिया का देश वहीं तक है जहां तक मैकडोनाल्ड बर्गर या फिर पिज्जा हट्स है। दिल्ली के सत्तर हजार लोगों का देश जो कॉमनवेल्थ में कलमाडी के भाषण पर ताली बजाता है। वहीं देश जो लूट के उत्सव में शामिल होकर उस मीडिया को गरियाता है जो अपनी टीआरपी के लिये ही सही लेकिन कभी-कभी भ्रष्ट्राचार की खबरें दिखाता है।&lt;br /&gt;देश का कश्मीर लेकर क्या रूख है वो तो साफ दिख सकता है। किसी नेशनल अखबार को नहीं दिखता जब तिरंगें के सम्मान की रक्षा करते हुए कश्मीर में मारे गये सुरक्षाकर्मियों की लाशें उनके गांव जाती है। अंदर के पन्नों में कुछ लाईनों में सिमटी खबर में उस शहीद का नाम तक नहीं होता फोटों छपने की बात तो दूर है। रही बात देश के उन नौजवानों की जिनकी अरूंधती के खिलाफ प्रतिक्रियाएं आपको ट्वीटर में फेस बुक या दूसरी सोशल साईट्स पर दिख रही है तो उनमें से ज्यादातर को कश्मीर में कितने जिले है ये बात तो दूर है कश्मीर लद्दाख और जम्मू में क्या अंतर ये भी मालूम नहीं है। ऐसे सभी नौजवानों की आंखों में विदेशी नौकरियों के सपने बसे रहते है। देश से भागने के लिेये भले ही फर्जी कागज तैयार करने हो या फिर किसी नंबर दो के रास्ते का सहारा लेना हो ये हर पल तैयार रहते है। ये लोग देश के खिलाफ अरूंधती के बयान पर सबसे ज्यादा उबल रहे है। देश की फैशन मॉडलों के मारे जाने में मोमबत्तियों के साथ गेटवे ऑफ इंडिया से लेकर इंडिया गेट तक प्रदर्शन करने वाले इन फैशनेबल नौजवानों ने  क्या कभी कश्मीर में चल रही आतंकवादी गतिविधियों के खिलाफ आवाज निकाली है। देश भर में आईआईटी, मेडीकल या फिर दूसरी यूनिवर्सिटीस हो होठों से होठों पर लिपिस्टिक लगाने की होड़ लगी हैं लेकिन किसी छात्र यूनियन ने एक भी प्रस्ताव कश्मीर में लड़ रहे जवानों के हक में पास किया हो ऐसा सुनाई नहीं पड़ा। जंतर-मंतर पर रोज धऱना प्रदर्शनों में कभी कश्मीर में लड़ने के नाम पर देश के इन तथाकथित नौजवानों ने धावा बोला हो ऐसा भी नहीं हुआ। तो इनको क्यों लगता है कि अरूंधती रॉय ने देश को तोड़ने का काम किया है। अपने को फिर से लगता है कि अरूंधती के बयान के बहाने देश की सत्ता में बैठे लोग, दोनों हाथों से देश को लूट रहे लोग, गरीबों के खून से अपने घर को सजाने में जुटे लोग अब अभिव्यक्ति पर भी ताला लगाना चाहते है। वो चाहते है कि कोई आदमी अब इस लूट के खिलाफ भी एक आवाज भी नहीं लगा सके। आज भले ही वो आवाज अरूंधती की दबाई जा रही है कल इस ताकत का इस्तेमाल गरीब के हकों में नारें लगाने वालों के गले दबाने में किया जाएंगा। देश के दलाल मीडिया की ताकत हमेशा से सत्ता के बौनों और दलालों को हासिल होती रही है लेकिन देश को शायद सोचना चाहिये कि एक ऐसी आवाज को भी जिसका कोई तलबगार नहीं है दबाने की ताकत इन बौनों को नहीं दी जानी चाहिये। आखिर में एक बात पूरे जोर से दोहराना चाहूंगा जो दुनिया भर में जनतंत्र की आत्मा मानी जाती है " मैं आपकी कही बात के हर एक शब्द से पूरी तरह से असहमत हूं लेकिन आपके कहने के अधिकार की रक्षा के लिये अपने खून की आखिरी बूंद तक बहा दूंगा "&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-8262394426110475706?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/8262394426110475706/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=8262394426110475706' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8262394426110475706'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8262394426110475706'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/10/blog-post_30.html' title='अरूंधती रॉय के बहाने'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-1857327306995907436</id><published>2010-10-25T21:29:00.002+05:30</published><updated>2010-10-25T21:32:33.737+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिटलर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नेशनल मीडिया'/><title type='text'>ईश्वर अब इस देश में नहीं रहता</title><content type='html'>कॉमनवेल्थ गेम्स खत्म हो गये हैं। दुनिया ने भारत की ताकत को जान लिया है। उन लोगों के मुंह पर ताले लग गये जो भारत को पिछड़ा या कमजोर देश मानते हैं। देश ने भारत की तरक्की के बारे में जान लिया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.................ऐसे सैकड़ों नहीं हजारों की तादाद में समाचार पत्रों के हैडिंग्स आपकी निगाहों से गुजरें होंगे। देश के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी खबरों की आंधी चल रही है। इसके बाद इसकी जांच की खबरों पर भी लोगों की निगाहें टिकी हुई है। लेकिन तथाकथित नेशनल मीडिया की हाल की दो खबरों पढ़ने के बाद लगा कि देश को लेकर आम आदमी और तथाकथित मीडिया के बीच किस तरह की खाई उभर आई है। &lt;br /&gt;देश के सबसे ज्यादा बिकने का दावा करने वाले इन अखबारों में खबरें छपीं कि दिल्ली के अनवांटेड़ लोग लौट आएं हैं। अनवांटेड़ की श्रेणी में शामिल किये गये दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगने वाले लाखों की तादाद में ट्रैफिक लाईटों पर सामान बेचकर अपना घर चलाने वाले या फिर ठेली और रोजमर्रा के काम करने वाले मजदूर। इन नेशनल अखबारों ने तो इस बारे में पुलिस को कोसते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस अब इन लोगों के आने पर न रोक लगा रही है न उन पर सख्ती दिखा रही है। दोनों खबरों को अलग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-अलग अखबारों ने छापा साथ में रिपोर्टर के नाम भी छापे गये। कॉमनवेल्थ खेल के दौरान कई सौ करोड़ के विज्ञापन भी तथाकथित नेशनल मीडिया को मिले। &lt;br /&gt;ऐसे में तथाकथित नेशनल मीडिया ने बाकी देश से आंखें बंद कर ली। और मीडिया से सच जानने के आदी हो चुके आम आदमी को इस बात का जरा भी अंदेशा नहीं हुआ कि कैसे मीडिया उसको खबरों की दुनिया से अलग कर रहा है। एनसीआर के शहरों में डेंगू के मरीजों के चलते अस्पतालों में भारी भीड़ जमा थी। लेकिन दिल्ली में भी काफी मंहगें प्राईवेट हास्पीटल्स में बेड दिलवाने के लिये सिफारिशों की जरूरत पड़ रही थी। दिल्ली में हर अस्पताल में डेंगू बुखार से पीड़ित मरीजों की भीड़ दिखाईं पड़ रही थीं। लेकिन देश के सम्मान की लड़ाई लड़ रहे मीडिया को इससे कोई लेना-देना नहीं था। और जहां मीडिया की नजर नहीं है वहां सत्ता में बैठे लोगों की नजर क्यूं कर जाएं। मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद और नौएड़ा के सरकारी अस्पतालों की तो दूर प्राईवेट वार्डस में जाकर देखियें किस तरह से डेंगू एक महामारी में तब्दील हो चुका है। आंकड़ों पर नजर रखने वाले चाहे तो चैक कर सकते है कि कैसे अलग-अलग प्राईवेट अस्पताल ने करोड़ रूपये कमायें। लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की निगाहों में रतौंधी उतर आई थी। और तथाकथित नेशनल मीडिया एडवर्टाईजमेंट की मलाई काट रहा था लिहाजा इस खबर को ही खा गया। मुजफ्फरनगर में कुछ अखबारों में विज्ञापनों पर निगाह पड़ी तो हैरानी हुई कि बाकायदा डॉक्टरों ने एड दिया है कि मरीज अपने फोल्डिंग्स लेकर आएं। डाक्टरों ने मरीजों की भर्ती के लिए धर्मशाला ही बुक करा लीं। हर मरीज से बीस-बीस हजार रूपये पहले ही एडवांस के तौर पर जमा करा लिए गये। लेकिन किसी नेशनल चैनल और अखबार को दिल्ली में ये खबर नजर नहीं आई। कॉमनवेल्थ की विरूदावली गाने के बाद दिल्ली के अखबारों को खबर नजर कि किस तरह से भिखारी और दिहाड़ी मजदूर दिल्ली वापस आ रहे है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी संपादक को ये नहीं लगा कि क्या ये लोग हिंदुस्तानी नहीं है। अगर ये लोग दिल्ली में अनवांटे़ड है तो लखनऊ, जयपुर या फिर इलाहाबाद में कैसे वांटे़ड़ हो सकते है। यदि इन लोगों को रोटी नहीं मिल पा रही है तो इसमें किसका दोष है। कौन सी व्यवस्था है जो लगातार अमीरों को अमीर बना रही है और ज्यादा से ज्यादा आबादी को भूखमरी और अकाल मौत की ओर धकेल रही है। लेकिन तथाकथित नेशनल मीडिया ने छाप दिया कि ये वापस लौट रहे है। क्या अखबार और उनके रिपोर्टर ये इशारा कर रहे है कि इन लोगों को पागलखाने या फिर गैस चैंबरों में भेज दिया जाएं। यदि अखबार और मीडिया ये कर रहा है तो मुझे और कुछ नहीं एक दूसरी चीज याद आ रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसवी शताब्दी का नायक कौन है इस बारे में दुनिया सैकड़ों नाम नहीं तो दर्जनों नाम तो ले सकती है। लेकिन शताब्दी का खलनायक कौन है इस बारे में एक ही नाम सामने आयेगा। एडोल्फ हिटलर। जर्मनी के इस तानाशाह से भी दुनिया की नफरत की वजह युद्ध छेड़ना नहीं बल्कि दुनिया से यहूदियों की कौम का नामों&lt;br /&gt;-निशान मिटा देने की कोशिश के चलते ज्यादा है। साठ लाख के करीब यहूदियों को नये बने गैस चैंबरों से लेकर फायरिंग स्क्वाड जैसे पारंपरिक तरीकों से मौत के घाट उतार दिया गया। ये बातें इतिहास का हिस्सा हैं। लेकिन जिस बात पर जर्मनी या फिर यूरोप के बाहर की आम जनता ने ध्यान नहीं दिया था वो बात थीं किस तरह से हिटलर इतना ताकतवर हो गया कि एक पूरी कौम या फिर पूरा राष्ट्र उसके पीछे आंखें मूंद कर चलने लगा था। अगर आप लोग उस वक्त के जर्मनी के तथाकथित नेशनल मीडिया को देंखें तो वो जर्मन कौम के अहम को मजबूत करने में लगे थे। हिटलर के कदमों का विरोध करने वालों के गायब होने की खबरें भी मीडिया से गायब हो चुकी थीं। &lt;br /&gt;अब के हालात में ये ही कह सकते है कि हिंदुस्तान में अभी कोई हिटलर तो नहीं है लेकिन उसके चाहने वालों की कमी नहीं है। देश का तथाकथित मीडिया उसके निर्माण में जुट गया है। देश के मौजूदा हालात को देखकर कोई भी सिर्फ यहीं कह सकता है कि ईश्वर ने इस देश को छोड़ दिया है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-1857327306995907436?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/1857327306995907436/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=1857327306995907436' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/1857327306995907436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/1857327306995907436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/10/blog-post_25.html' title='ईश्वर अब इस देश में नहीं रहता'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-58550732432870792</id><published>2010-10-24T14:08:00.001+05:30</published><updated>2010-10-24T14:11:17.404+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉमनवेल्थ गेम्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कलमाड़ी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शीला दीक्षित'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्ट्राचार'/><title type='text'>खेल खत्म पैसा हजम</title><content type='html'>खेल खत्म पैसा हजम। बचपन में मदारी के खेल देखें और मदारी जब अपना ताम-झाम समेटता था तो बच्चों को बहका कर हासिल किये गये पैसे अपने जेंब में रखतें हुए  यही कहता था। कॉमनवेल्थ खेलों का समापन हुआ और लगा कि खेल खत्म पैसा हजम। लेकिन अच्छा नहीं लगा। बचपन में जो पैसा जेंब में होता था वो मेरी जेब खर्च का होता था लेकिन अब जो मेरी जेब में पैसा होता है वो मेरे परिवार के लिये जिंदगी के जीने के लिए के लिये जरूरी होता है। ऐसे में मेरी जेंब से चालाकी से हासिल पैसे को लेकर बेशर्मी से ये कहना कि खेल खत्म  पैसा हजम अच्छा नहीं लगा।&lt;br /&gt;लेकिन सत्ता में बैठे लोग इस बात को अपने माथे पर नहीं रखना चाहते है। देश के बेबस ईमानदार प्रधानमंत्री जी ने भारत के पदक विजेताओं के सम्मान में किये गये समारोह में माननीय कलमाड़ी साहब को नहीं बुलाया। और अगली खबर मीडिया को मिली कि शुंगलु साहब की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गयी है जो इस पूरे खेल में हुए खर्चे  की जांच करेंगी। तीन महीने में कमेटी इस बारे में अपनी सिफारिश देंगी। देश का अनुभव इस बात का गवाह है कि ऐसी समितियों का ट्रैक रिकार्ड क्या रहा है। और इस बारे में ठेकेदारों के रिश्तें किस पार्टी से रहे है इस बात का असर भी जांच पड़ेगा। &lt;br /&gt;नेहरू स्टेडियम भीड़ को देखने वाली बात ये थी कि किस तरह से साठ से सत्तर हजार आदमी देश के नाम पर नारा लगा सकते थे नाच सकते थे और हर बार भारत का नाम आने से तालियां बजा सकते थे। इन लोगों ने टिकट खरीदें थे चार हजार आठ हजार या इससे भी ज्यादा के टिकट। इस दौरान दिल्ली के अस्पतालों में डेंगूं के मरीजों की भीड़ बुरी तरह से जमा थी। हर अस्पताल में लंबी लाईनों में खड़े मरीज इस बात को दिखा रहे थे कि डेंगू इस वक्त एक महामारी के तौर पर राजधानी दिल्ली में पसर गयी है। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को गेम्स में ईज्जत की इतनी परवाह थी कि वो डेंगूं को लेकर बिलकुल बेपरवाह रही। देश के स्वास्थ्य मंत्री को इस वक्त कश्मीर में चल रही उठा-पठक से फुर्सत नहीं है। सरकारी अस्पतालों में वो मरीज पहुंच रहे है जो प्राईवेट अस्पतालों का खर्च उठाने की हैसियत में नहीं है। और प्राईवेट अस्पतालों में लूट का एक नया कीर्तिमान लिखा जा रहा है। दिल्ली के आस-पास के शहरों में हालात और बुरे है. गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, मेरठ, और मुजफ्फरनगर में हालात काबू से बाहर है। प्राईवेट लैब्स एक-एक दिन में पचास हजार से लेकर पांच लाख रूपये कमा रहे है। लेकिन दिल्ली में लोगों के हालात की किसी को परवाह नहीं है तो दिल्ली के बाहर तो उपर वाला ही उनका रखवाला है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-58550732432870792?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/58550732432870792/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=58550732432870792' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/58550732432870792'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/58550732432870792'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='खेल खत्म पैसा हजम'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-8324323585474608762</id><published>2010-08-10T16:42:00.000+05:30</published><updated>2010-08-10T16:43:18.437+05:30</updated><title type='text'>कलमाडी को सैल्यूट......</title><content type='html'>देश को किस-किस स्पर्धा में गोल्डमैडल मिलेगा, भारत का कौन सा खिलाड़ी अतंरराष्ट्रीय कीर्तिमान के करीब पहुंच सकता है। देश को कुल कितने मैडल हासिल होंगे। सवाल सिर्फ ये होने थे उस वक्त जब राष्ट्रमंडल खेलों के शुरू होने में महज 50 दिन हो गये हो। लेकिन आपके पास खबर आ रही है कि &lt;br /&gt;चालीस रूपये का नैपकिन चार हजार रूपये में, चार सौ की कुर्सी छह हजार रूपये में जिस मशीन की कीमत ही बाजार में सत्तर हजार से लेकर चार लाख तक उसका 60 दिन का किराया साढ़े नौ लाख रूपये। हम आपको किसी ठग की कारीगरी नहीं बता रहे है बल्कि इस देश की इज्जत बचाने के नाम इतनी बेशर्मी के साथ लूटे गये हजारों करोड़ रूपये की खरीद का एक नमूना भर दे रहे है। ये ज्यादातर आंकड़े इस समय देश के मीडिया में तैर रहे है। लूट कहना भी लुटेरों का अपमान है। ये तो सरे-आम डकैती है। गिरोहबंद लूट का नया नमूना। मेहमानों को दी जाने वाली टाईयों का किस्सा भी अब खुलने वाला है जिसकी कीमत शायद पच्चासी लाख होगी। लगभग तेरह सौ टाईयां और कीमत 85 लाख रूपये। मीडिया ने इस समय अपने सर पर जैसे एक ही भूत बैठा लिया हो कि इस लूट के खलनायक सुरेश कलमाड़ी का सर चाहिये। सासंदों को इस वक्त एक ही बात दिख रही है कि देश के साथ मजाक हो रहा है। लेकिन ये सब एक पहलू है दूसरा पहलू है कि सब एक बात कह रहे है कि देश की इज्जत बचाने के लिये खेल हो जाने दीजिये। ये कौन सी इज्जत है जिसमें मां सरेआम नीलाम की जा रही है आप कह रहे है कि वचन दिया है इसीलिये नीलाम हो जाने दीजिये। देश में पैसे की कमी से कई खेल परियोजनाएं रोक दी गयी। देश में पैसे की कमी का रोना रोकर रोज टैक्स बढ़ाये गये लेकिन किसी ने उफ तक नहीं की। अब ये तमाम लोग देश की इज्जत की दुहाई दे रहे है। यानि आप से कह रहे है कि किसी मक्खी गिरी चाय को नहीं बल्कि मक्खियों से गिरी चाय को आप आंख बंद कर निगल ले। साफ दिख रहा है कि आम जनता के पैसों को एय्याशी और निजि सनक पर हनक के साथ खर्च किया गया। हजारों करोड़ लूटने के लिये देश भर से वांटेड कुख्यात ठग नटवरलाल भी इतना खूबसूरत प्लान तैयार न करता। &lt;br /&gt;ये कहानी का एक पहलू है। हम दूसरे पहलू पर आते है। अभी जज की भूमिका में आ गया मीडिया पिछले सात सालों से क्या कर रहा था। संसद में बैठे ये गरीबनवाज क्या सोच रहे थे। अब विसिलब्लोअर की भूमिका निबाह रहे इस कमेटियों से जुड़़े लोगों को क्यों सांप सूंघा हुआ था। आप को सोचने की जरूरत नहीं है साफ तौर पर हम बता देते है कि लूट के खेल में सब शामिल थे। जब कोई लूट सार्वजनिक हो जाती है और उसमें एक पूरा समाज शामिल हो जाता है तो उसे आयोजन का नाम दिया जाता है। उसका महोत्सव होता है। ये भी लूट का महोत्सव है। सबने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। बात शुरू करते है 2002 से। दिल्ली के मयूर विहार, या आस-पास के किसी भी इलाके के प्रोपर्टी डीलर के पास आप गये होंगे तो याद होगा कि कैसे वो एक फ्लैट बेचने से पहले राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर फ्लैट के दाम बढ़ने की कहानी सुनाता होगा। मुझे याद है मयूर विहार के जिन फ्लेटों को लोगों ने 2004 में दस से बारह लाख के बीच में खरीदा है उनको राष्ट्रमंडल के नाम का हल्ला मीडिया में होते ही कीमतों को आसमान पर जाते देखा। यानि एक फ्लैट पचास लाख तक पहुंच गया। इस लूट में कौन शामिल था दिल्ली के आम नागरिक थे कि नहीं। अब बहुत आसान था ये कहना कि साहब हम को ज्यादा मिल रहा है तो क्यों न ले। ये वही आदमी होता है जो रिक्शा वाले के पांच रूपये ज्यादा मांगने पर उसकी मां-बहन और सरकार को गाली देने लगता है। लूट में हिस्सेदारी का खेल शुरू हो चुका था। डीडीए जिसको देश के सबसे भ्रष्ट्रतम डिपार्टमेंट की ख्याति हासिल है इस मामले में शामिल हो चुका था। इसके बाद पीडब्लूडी, और दिल्ली सरकार की वो तमाम एजेंसियां जिनको इसमें जरा सी भी भूमिका निबाहनी थी इस लूट में हिस्सा लेने जुट गये। एक के बाद एक टैंड़रर हुए कमीशन के तौर पर करोड़ों रूपये उगाहे गये। लेकिन किसी को कानो-कान खबर नहीं हुई। बीजेपी हो या कांग्रेस तमाम पार्टियों से जुड़े बड़े-बड़े ठेकेदारों ने लूट की इस गंगा में अपने हाथ नहीं बल्कि पूरा शरीर ही धो लिया। &lt;br /&gt;उधर ऑर्गनाईजिंग कमेटी में इस लूट को वैधानिक करने के लिये बाकायदा एक भर्ती अभियान चला जिसकी कोर टीम इस देश के नये नटवरलाल सुरेश कलमाड़ी ने पुणे से तैयार की। इसके अलावा जनता की गाढ़ी कमाई को कलम के सहारे लूटने वाले लोगों की पूरी जमात तैयार की गयी। दरबारी बुलाये गये। अब इस ढ़ांचे को सत्ता में बैठे लोगों ने सारी ताकत हस्तांतरित कर दी। लूट में सबका हिस्सा जाने लगा। &lt;br /&gt;अब बात नये राजनेताओं की और उनकी सत्ता मंडली में जुटे नौकरशाहों की तो उनके लिये भी लूट का हिस्सा हाजिर था। अक्षरधाम टैंपल आपकी आंखों को दिखेगा कि यमुना बैड पर यानि नदी के पाट पर बना है लेकिन पैसे से अदालत में साबित हो गया कि नहीं ये यमुना तट नहीं है। अगर किसी को उसका उद्घाटन याद है तो ये भी याद होगा कि देश के नंबर वन चैनल को इस मंदिर के एक ट्रस्ट्री ने मंदिर में टिकट लगने के सवाल पर जवाब दिया था कि ये मंदिर नहीं है। तीन साल बाद सत्ता के लगाये गये टैक्स से बचने के लिये वही ट्रस्ट्री मुझे टीवी पर दिखायी दिये ये कहते हुए कि ये मंदिर है इस पर टैक्स क्यों लगाया जा रहा है। इसी ख्यातिनाम अक्षरधाम टैंपल की बगल की जगह तय की गयी खेलगांव बनाने के लिये। खेलगांव यानि जहां दुनिया भर के एथलीट रुकेंगे। लिहाजा यहां बनने वाली सुविधायें दुनिया भर में सबसे बेहतरीन होनी चाहिये। लिहाजा ब्लू प्रिंट तैयार हुआ। और जैसे ही ये बना तो लूट के लिये सबसे नायाब चीज सामने थी। महमूद गजनवी, मोहम्मद गौरी,नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे लुटेरे शर्मा जाये लूट की ऐसी साजिश देख कर। ना कोई तलवार उठी न कोई खून बहा और हजारों करोड़ रूपये के फ्लैट भ्रष्ट्र नौकरशाहों, राजनेताओं और देश का खून निचोड़ रहे उद्योगपतियों के लिये तैयार।  नक्शे को देश समझने वाले किसी भी आदमी को ये समझ नहीं आ रहा है कि भाई जमीन डीडीए की बनाने वाले को पैसा डीडीए ने दिया और दूसरी तमाम सुविधा उनको सजाने का पैसा भी डीडीए देंगा सिर्फ बनाने के नाम पर हजारों करोड़ रूपये की लागत के ये फ्लैट एक निजि कंपनी को क्यों दिये जाये। इन फ्लेटों को खेल के बाद तुरंत बेचने की तैयारी हुई। लेकिन संसद में बढ-चढ़ कर बयानबाजी करने वाले नेता इस लूट पर चुप क्यों है कि भाई अगर आगे खेल होने वाले है तो फिर खेलगांव क्या फिर से बनेगा। दरअसल सारा खेल दस हजार करोड़ से उपर के इस खेल गांव में छिपा है जिसको लेकर कोई सवाल नहीं कर रहा है। कि क्यों इस खेल गांव को बेचा जा रहा है अगर आपको इस कंपनी से बनवाना था तो आप उसको बनाने की कीमत अदा करते और इस खेल गांव को आगे की खेल एक्टिविटी के लिये भी रखा जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस लूट के कई पहलू जो अभी देश के सामने नहीं आये है जिस कंपनी एम्माऱ-एमजीएफ ने ये फ्लेट तैयार किये है उस कंपनी पर  छह हजार करो़ड़ रूपये की मनी लांड्रिंग के घोटाले में छापे पड़ चुके है। उस कंपनी ने इस के लिये जरूरी राशि भी विदेशी पैसे से नहीं बल्कि हिंदुस्तान से ही दी गयी है।&lt;br /&gt;देश के सामने सबसे पहला सवाल है कि इस खेल के हजारों करोड़ रूपये के खर्च के बाद उसे हासिल क्या होंगा। पहले से मौजूद स्टेडियमों को तोड़ कर उन्हें दोबारा खड़ा कर दिया गया। इस तोड़-फोड़ की कीमत देश को चुकानी पड़ी इतनी कि नया स्टेडियम बन जाता एनसीआर की किसी भी जमीन में। अब खेल खत्म होने के बाद जब आप स्टेडियम गिनेंगे तो जितने खेल से पहले थे उतने ही बाद में मिलेगे। खेल गांव बिक चुका होगा। अमीरजादों औऱ भ्रष्ट्राचारियों की ऐय्याशियां उधर से गुजरने वाले हर हिंदुस्तानी का मुंह चिढ़ायेगी और उसका हिंदुस्तानी कानून से विश्वास गिराती रहेंगी। अगर कोई मजदूर उधर से गुजरेंगा तो वो ये सोच भी नहीं पायेगा कि उसके बच्चे के दूध पर टैक्स लगाकर तैयार की गयी है ये ऐशगाह। &lt;br /&gt;दिल्ली की सड़कों पर फुटपाथ उखाड़ कर दूसरे लगाये गये। लेकिन पानी के नल नहीं। हजारों करोड़ रूपये टाईल्स उखड़ कर सामने पड़ी है वहीं उन पर बैठ कर भीख मांगते आदमी को देख कर भी किसी नेता को संसद में आवाज उठाने की जरूरत नहीं पड़ी। रोज गुजरते हुए पत्रकारों को नहीं लगा कि खेल हो रहा है। पेज भर-भर कर मिले एड्वरटाईजमेंट ने सबकी जुबां पर ताला डाल दिया था। हर चैनल्स इस बात को साबित करने में लगा था कि कैसे इस देश की शान साबित होने वाले है ये राष्ट्रमंडल खेल। &lt;br /&gt;लेकिन बात अब ये है कि आपके पास क्या विकल्प है। एक भी नहीं। जिन लोगों ने ये पैसा लूटा है उन लोगों को सजा दिलाने का कोई कानून आपकी किताब में नहीं है। मीडिया के इस सारे हल्ले के पीछे का सच यही है कि सुरेश कलमाड़ी के सिर की बलि लेकर इस पूरे मामले की इतिश्री कर ली जाये। और पैसे को लूट कर अपनी जेबों पर भरने वाले पर्दे के पीछे के खिलाडियों को साफ बख्श दिया जाये। ये चल रहा है खेल और इस बात से मैं तो पूरी तरह से मुतमईन हूं कि भ्रष्ट्रमंडल के खेल पूरी तरह से सफल होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-8324323585474608762?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/8324323585474608762/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=8324323585474608762' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8324323585474608762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8324323585474608762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/08/blog-post_10.html' title='कलमाडी को सैल्यूट......'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-2235065670471914199</id><published>2010-08-02T20:04:00.001+05:30</published><updated>2010-08-02T20:07:51.776+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉमनवेल्थ गेम्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कलमाड़ी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्ट्राचार'/><title type='text'>देश की आंखों का पानी मर गया है</title><content type='html'>कई बार लिखना इस लिये भी मुश्किल होता है कि आप के पास कहने के लिये बहुत कुछ होता है और आप को लिखना सिर्फ कुछ पर होता है। देश यदि नक्शे को आधार माना जाये तो उथल-पुथल के दौर में है। मणिपुर हमारे देश का राज्य है आतंकवादी समर्थित छात्र संगठनों ने साठ दिन तक उसकी नाकाबंदी की बाकि नक्शे के कानों पर जूं नहीं रेंगी। कश्मीर में साफ तौर पर पाकिस्तान का झंडा लहरा रहे लोगों और पैसे लेकर पथराव करती भीड़ दिख रही है लेकिन नक्शे को कुछ मालूम नहीं है। ट्रेनों के एक्सीडेंट हो रहे है, नक्शे में कोई हरारत नहीं है। झारखंड और छत्तीसगढ़ में खानों के अवैध खनन के लिये देश के उद्योगपति अगर उन्हें देश का कहा जा सके तो अपनी चालों से आम आदमी जिंदगी को नरक करने में जुटे है। गरीब लोगों का नाम लेकर नक्सली कत्लेआम करने में जुटे है। देश का नक्शा सिर्फ एक गृहमंत्री को बोलते-देखता रहता है। दक्षिण भारत में क्या चल रहा है कोई नहीं जानता। &lt;br /&gt;देश को मालूम चल रहा है कि दिल्ली में कलमाड़ी एंड कंपनी ने खेल का आयोजन किया है। नक्शे का इस खेल से बस इतना लेना-देना है कि सत्ता को उसके लिये आम जनता पर टैक्स लगाने है।आयोजन में नुमाईशी प्रतियोगिताएं होनी है। हैंडबाल और टेनिसबॉल जैसे खेल खेले जायेंगे जिनके किसी खिलाड़ी के बारे में मुझे तो कोई जानकारी नहीं है आपको हो तो हो। कोई रिकार्ड देखने में दिलचस्पी रखता हो तो उसके लिये रिकार्ड बुक उपलब्ध है। किसी भी चश्में से देखने पर रिकार्ड बुक में ये नहीं दिखेगा कि कॉमनवेल्थ के किसी खेल का बना कोई वर्ल्ड रिकार्ड है। ऐसे में पूरे देश को भूलकर सत्ता इसमें क्यों मदहोश है। बात बिना लाग-लपेट के कहनी हो तो इस तरह कही जा सकती है कि ये लूट का महोत्सव है सबकी अपनी-अपनी हिस्सेदारी है। लोग देश की इज्जत नहीं बचा रहे है, इज्जत के नाम पर की गयी लूट बचाना चाहते है। देश की इज्जत भूख से मरते लोगों से खराब नहीं होती है, देश की इज्जत पर करोड़ों गरीब लोगों के तिल-तिल मरने से असर नहीं होता है और देश की इज्जत- लुटेरों को सरंक्षण देने से खराब नहीं होती है  लेकिन इज्जत खराब होती है विदेशी मेहमानों को घटिया शराब परोसने से, वो खराब होती है दिल्ली की सड़कों पर विदेशी मेहमानों के सामने भिखारियों के नजर आने पर वो खराब होती है विदेशी और उनके यहां बैठे चमचों की अय्याशी में कमी रह जाने पर। गजब है कि किस कदर झूठ को जिंदा रख कर उसे सच में तब्दील कर दिया है। &lt;br /&gt;कॉमनवेल्थ खेल का आयोजन हासिल करने से शुरू करे तो आपकी आंखें खुली रह सकती है। खेल के आयोजन के लिये हुए मुकाबले में भारत को कामयाबी उसकी खेल क्षमताओं की वजह से नहीं बल्कि भाग लेने वाले देशों को सबसे अधिक रकम ऑफर करने से मिली। ये आरोप उस समय बहुत शिद्दत से लगाया गया था। लेकिन कलमाड़ी एंड कंपनी इस खेल में काफी तेज है लिहाजा जीत गयी। आपको किसी को शायद याद नहीं होगा कि 1982 में हुए एशियाई खेलों के आयोजन के लिये एक खेल गांव बना था उस समय के तमाम ऐशो-आराम को ध्यान में रख कर। खेल खत्म हुए तो इस बेशकीमती प्रोपर्टी को भविष्य के लिये न रख कर कौडियों के मोल बेच दिया गया नेताओं-ठेकदारों और चंद राजनीतिक चमचे पत्रकारों को।किसी ने ये सवाल नहीं किया कि भाई आगे भी खेल होंगे और इनकी जरूरत होगी। ये जानते थे सत्ता के ठेकेदार की फिर से कमाई होंगी। पूरे दिन फावड़ा-कुदाल चलाकर एक गरीब औरत जो रोटी हासिल करती है वो भी कलमाड़ी जैसे नेताओं के ऐशोआराम के लिये टैक्स भरती है। आप सिर्फ इस बात को सोच कर देखें कि दूध पावडर के एक डब्बे पर आप कितना टैक्स देते है। वो भी उस टीम के लिये जिसको सुप्रीम कोर्ट में ये नेता है कहते है कि राष्ट्र की नहीं खेल संघों की निजी टीमें है। &lt;br /&gt;करप्शन के इस हल्ले के पीछे किसी की भलमनसाहत नहीं है न ही किसी के खून में उबाल आया है बल्कि डीडीए ने जो खेलगांव बसाया है उसी की लूट से ध्यान हटाने की कोशिश है ये। क्या कोई 3 से लेकर 8 करोड़ के फ्लैट खरीदेगा। यदि आम आदमी नहीं खरीदेंगा तो डीडीए ने किस के लिये उस कंपनी से ये फ्लैट खरीदे जिसको कॉन्ट्रेक्ट की शर्तें पूरी न करने की वजह से सजा देनी चाहिये थी।लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने ऐसा नहीं किया बल्कि उस कंपनी को गरीब औरत की खून-पसीने की कमाई को सौंप दिया गया।&lt;br /&gt;राजनीतिक पार्टियों की नूरा-कुश्ती काफी तैयारी से हुई है। कांग्रेस के नेताओं ने भी शोर इसलिये मचाना शुरू किया है कि वो जानते है कि कॉमनवेल्थ की नौटंकी के बाद जब तंबू उखडेगा तो बबाल मचेगा। पहले से शोर मचाने से ये होगा कि छोटे-मोटे ठेकेदार एक दो इंजीनियर के खिलाफ कार्रवाई हो जायेगी और हजारों करोड़ रूपये अंदर हो जायेंगे। मुख्य विपक्षी पार्टियों में बीजेपी की बात करते है क्योंकि यादव बंधुओं को जाति और धर्म की नंगी सियासत करते हुए हम रोज देखते है उनके एजेंडें सब को मालूम है।  बीजेपी के नेताओं को आप रोज हल्ला करते हुए देख रहे है। लेकिन बीजेपी के प्रर्दशन में शामिल होने वाले नेताओं की कंपनियां कई टैंडरों में शामिल है। उनकी कंपनियों ने इस कॉमनवेल्थ की भ्रष्ट्राचारी गंगोत्री में अपने हाथ धो लिये है अब तर्पण की बारी है। विजय मल्होत्रा तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष है आजतक कितने तीर चलायें है उन्हें ईमानदारी से मालूम होगा। &lt;br /&gt;बात तथाकथित न्यूज चैनलों और राष्ट्रीय अखबारों की। राहुल महाजन ने अपनी पत्नी डिंपी की पिटाई की गुरूवार की सुबह लगभग आठ बजे शुरू हुई ये खबर बिना नागा शनिवार तक चल रही है। चैनलों के बड़े-बड़े धुरंधर रिपोर्टर लगातार इस पर फोन इन करते रहे। एक चैनल के न्यूज रूम में बड़े पत्रकार साहब से बात हुई कि भाई ये क्या है तो उन्होंने कहा कि इसके अलावा आप बताओं देश में खबर क्या है। अब कुछ कहना-सुनना बेकार था। सीआरपीएफ के पांच जवानों को उड़ा दिया उल्फा के आतंकवादियों आज के दिन ये कह कर मैं उन पांच बदनसीब शहीदों की बेईज्जती नहीं कराना चाहता था। लेकिन ये तो दूर की बात है मैं तो उसको ये भी नहीं कह पाया कि भाई एक दिन अपने रिपोर्टर को दिल्ली के बदरपुर इलाके से लेकर शुरू कराओं और नरेला तक ले जा कर देखों कि सड़क पर सत्ता की ओर से कितने सार्वजनिक नल दिये है जिनसे आम आदमी पानी पी सके। मेरा अपना आकलन है एक भी नहीं । दिल्ली पानी मांग रही है और यहां देश के आंखों का ही पानी खत्म हो गया।....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-2235065670471914199?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/2235065670471914199/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=2235065670471914199' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2235065670471914199'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2235065670471914199'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='देश की आंखों का पानी मर गया है'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-59006928246331119</id><published>2010-07-11T22:02:00.001+05:30</published><updated>2010-07-11T22:04:02.302+05:30</updated><title type='text'>खाप पंचायतों के छिपे समर्थक देश के युवा राजनेता</title><content type='html'>बेगुनाह प्रेमियों को मौत के घाट उतारने के आदेश देने वाली खाप पंचायतों के बारे में कानून बनाने की पहल हो गयी। केन्द्र सरकार ने मामले को मंत्रियों के समूह को सौंप दिया। मीडिया में हो रही सनसनीखेंज आलोचना को शांत करने का एक दांव। मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिये एक और दांव कि राज्यों से प्रस्तावित कानून में राय ली जायेगी। राज्य अभी पुलिस सुधार कानूनों पर सालों से अपनी राय नहीं दे पाये हैं। राज्य के नेता वोट की लोटा-डोरी रखने वाली खाप पंचायतों पर कानून बनाने की राय राजनीतिक चश्में से देखें बिना देंगे ये यकीन किसी को नहीं। क्योंकि मौजूदा राजनीति की बुनियाद जातिवाद यानि जातियों पर टिकी हैं ये खाप पंचायतें। यकीन के लिये किसी सबूत की जरूरत नहीं है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने बाकायदा खाप पंचायतों के समक्ष पेश होकर उनके समर्थन का भरोसा दिया। चौटाला को लेकर किसी को शक नहीं हो सकता। अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर हजारों करोड़ रूपये की अवैध संपत्ति बनाने के आरोपों के चलते सीबीआई दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे इस नेता का वोट बैंक एक खास जाति को छोड़कर और कुछ नहीं है। लेकिन नवीन जिंदल को क्या हुआ। देशवासी को तिरंगा फहराने की लड़ाई अदालत में लड़कर नायक बनने वाले नवीन जिंदल को इस मामले में खाप पंचायतों का समर्थन करने की जरूरत को कैसे समझा जायेगा। सिर्फ इस बात के अलावा कि पैसे कमाने के लिये दुनिया भर में हवाई जहाज में घूमने वाले नवीन जिंदल वोट के लिये गांव में बस चलाने की बजाय बैलों की गाड़ी का समर्थन कर सकते है। अपने बिजनेस ग्रुप को राजनीतिक कवच देने के लिये कुछ भी करेंगे देश के युवा विजन के ये साहब। युवा जोड़ों को मौत मिल रही है। लेकिन युवा नेता(सांसद) कहां है। नये जमाने के नये नायक राहुल गांधी की आवाज कहां गयी। हर सभा में मंच पर नंगी तलवार लहराने वाले बीजेपी के युवा ह्रदय सम्राट वरूण गांधी की चुप्पी आवाज से ज्यादा बोली। इसके अलावा सचिन पायलट, जतिन प्रसाद, अखिलेश यादव, जैसे युवाओं की जुबां तालू से क्यों चिपकी हुई है। आप इसके पक्ष में है कि विपक्ष ये तो साफ हो। देश के तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया में इस समय ये बहस सबसे ज्यादा टीआरपी में है लेकिन ये युवा नेता बेचारे सीन से गायब है। कारण बूझों तो जाने की तर्ज पर नहीं है। हर किसी को मालूम है परिवारवाद के नाम पर जाति के दम पर चुने जाने वाले युवा किसी मुसीबत को न्यौता देकर अपना फायदा खत्म नहीं करना चाहते।वोटरों के सामने बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये नेता खूब जानते है कि उनकी जान सिर्फ उनकी जातियों के वोटरों में बसी है। इन्हीं के दम पर चलेंगी देश की आने वाली राजनीति। एक और कड़वी हकीकत से रूबरू होना है तो इन लोगों की पढ़ाई-लिखायीं कहा हुई है ये और देख लेना चाहिये। विदेशों के स्कूल-कालिजों से अपनी शिक्षा हासिल करने वाले ये लोग देश के सबसे गरीब आदमी की बात करते है टीवी के कैमरों के सामने। मीडिया को कोसते है गरीब आदमी की खबरों को न दिखाने के लिये उसी मीडिया को जिसके कैमरों में आने के लिये पत्रकारों को उनके पीआरओ पैसा और गिफ्ट देते है। &lt;br /&gt;मीडिया के लिये पहले ये खबर सिर्फ पिछड़े इलाकों की कहानी थी। ऐसे वर्गों की जिनके पास टीआरपी मीटर नहीं है लिहाजा वो दिखाने लायक कहानी नहीं थी। लेकिन एक के बाद एक होती घटनाओं ने दिखाया कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा की पंचायतें शहरों में लूट में लगे वर्ग के लिये मनोरंजन का साधन हो सकती है। इनको जंगली दिखाकर दिल्ली और मुंबई में लाखों रूपये के साथ खेल रहे लोगों का मनोरंजन किया जा सकता है। एकाएक हर रिपोर्टर तालीबानी-तालीबानी चिल्लाने लगा हर खूबसूरत एंकर को लगने लगा कि बेगुनाह नौजवानों को टुकड़े-टुकड़े कर रहे बूढ़े रावण और कंस जैसे मिथकीय विलेन से बड़े विलेन। ये सब मनोरंजन की चीख-पुकार थी। ऐसी चीख-पुकार जिस पर महानगरों में बैठे लोग चाय की चुस्कियों और दफ्तरों में घूसखोरी करते हुए अपना टाईम पास कर सकते है। ऐसा नहीं है कि मीडिया को इतनी समझ नहीं कि कैसे दोगले नेताओं की पोल खोली जाये लेकिन उसको मालूम है कि आज जो सत्ता में है उनकी बांटी गयी रेवड़ियां हाथ में तभी आयेगी जब उनके दुर्गुणों उनकी अदा बताया जाये। और जो आज विपक्ष में है वो कल सत्ता में होंगे तो कल की बटेर को भी ढ़ेला क्यों मारा जाये जब आज का कबूतर हाथ में हो तब भी। &lt;br /&gt;मीडिया के दोहरे मानदंड़ों को दिमाग में ताजा करना हो तो इस बात के लिये आप देख सकते है कि कैसे राजनीति से परिवाद का मुद्दा गायब किया गया। चरणसिंह को अपने अमेरिका पलट बेटे अजीत सिंह में किसानों का नायक दिखा। अजीत सिंह को अब उनकी राजनीति का वाहक सिर्फ जयंत चौधरी में दिख रहा है किसानों का भविष्य। मुलायम सिंह यादव ने शायद कसम खायी है कि अपने परिवार के 21 साल से ऊपर के हर सदस्य को राजनेता बना कर दम लेंगे। बीजेपी के बुरी तरह से हारे जननायक राजनाथ सिंह को लगता है कि उनके बेटे में उनकी जाति का नायक छिपा हुआ है। हर आदमी को मालूम है कि इन नेताओं की राजनीतिक ताकत उनकी नीतियों में नहीं जातिवाद में छिपी हुई है। आकंड़ेबाज चाहे तो ये बात उनके मिले वोटों के आंकड़ों से चैक कर सकते है।&lt;br /&gt;वैसे भी इस मामले में हिंदी भाषी राज्यों की जातियां कुछ ज्यादा ही मुखर है। ऐसी पंचायतों की मुख्य भूमि हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, पंजाब और कुछ राजस्थान में है। ऐसे में इस इलाके के युवा नेताओं की आवाज सुनाईं नहीं देना कोई हैरत नहीं बल्कि मीडिया का इस पर ध्यान न देना कुछ ज्यादा हैरानी देता है.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-59006928246331119?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/59006928246331119/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=59006928246331119' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/59006928246331119'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/59006928246331119'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/07/blog-post_2546.html' title='खाप पंचायतों के छिपे समर्थक देश के युवा राजनेता'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-5691444264833098823</id><published>2010-07-11T16:22:00.000+05:30</published><updated>2010-07-11T16:26:04.652+05:30</updated><title type='text'>अजब लोग है,खौलते क्यों नहीं</title><content type='html'>जुबां है मुंह में &lt;br /&gt;सवाल हैं जेहन में&lt;br /&gt;फिर भी लब खामोश हैं&lt;br /&gt;अजब लोग हैं बोलते क्यों नहीं...&lt;br /&gt;आंखों में जूनूं भी &lt;br /&gt;बदन में तपिश भी है&lt;br /&gt;गुजरते है बिना जुंबिश के &lt;br /&gt;अजब लोग है&lt;br /&gt;जुल्म सहते है बेआवाज&lt;br /&gt;अपने को तौलते क्यों नहीं&lt;br /&gt;मौहब्बत भी दिल में &lt;br /&gt;थिरकन भी बांहों में &lt;br /&gt;खून देखते है सड़कों पर चुपचाप....&lt;br /&gt;अजब लोग है &lt;br /&gt;खौलते क्यों नहीं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-5691444264833098823?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/5691444264833098823/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=5691444264833098823' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5691444264833098823'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/5691444264833098823'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/07/blog-post_11.html' title='अजब लोग है,खौलते क्यों नहीं'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' 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विपक्षी दलों (अगर विपक्ष है तो) के बयानबीरों ने टीवी चैनलों में बयान दिया कि वो मंहगाईँ के खिळाफ धरना देंगे। किराये की भीड़ के दम पर जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक भीड़ इकठ्ठा हो जायेगी। देर नहीं हुई तो नेताजी बिना बेहोश हुए घर चले जायेंगे। पांच हजार करो़ड़ रूपये के ग्रुप का मालिक नेता प्रतिपक्ष। पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति हैसियत। देश का प्रधानमंत्री विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा। तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनो आय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे है। गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती इन लोगो के वैभव देखकर देवलोक के देवराज इन्द्र को शर्म आ जाये।  &lt;br /&gt;इन लोगों की हैसियत से आप को लगता है कि इन लोगों को महंगाई छू कर भी गुजर सकती है। सबसे ज्यादा महंगाईं इऩ लोगों के दम पर आती है। इन लोगों का ऐश्वर्य जुटाने के लिये ही मंहगाईं हर बार बढ़ती है। &lt;br /&gt;फिर से मंहगाईँ बढ़ गयी है। प्रधानमंत्री ने कहा कोई चारा नहीं था। पेट्रोल,डीजल, कैरोसीन और घरेलू गैस के दाम एक साथ बढ़ाये दिये गये। सरकार चाहती है कि वो लोगों की आखिरी सहनशक्ति की सीमा भी देख ले। सत्ता में बैठे हर राजनेता ने इसका सर्मथन किया और विपक्ष में बैठे देवताओं ने निंदा। समर्थन देने वाले राजनेताओँ ने इस अपनी औकात के मुताबिक इसका फायदा उठाने वाले बयान दिये। ये सब बाते आपने पढ़ी, देखी और सुनी होंगी।&lt;br /&gt;महंगाईं को लेकर दो महीने पहले भी दिल्ली में भीड़ जुटी थी। हजारों की रैली में आये लोगों को देखकर दिल्ली के लोगों ने नाक-भौं सिकोड़ी। उन लोगों को ट्रैफिक जाम के लिये गालियां दी। मीडिया में बैठी सजी-धजी एंकरों ने गुस्सा जाहिर किया कि ये लोग दिल्ली क्यों आते है। तभी एक सवाल जेहन में आाया कि क्या मंहगाईं क्या सिर्फ उन लोगों के लिये उन लोगों के लिये है जो दिल्ली में सरकार से विरोध जताने आये थे। या दिल्ली में भी मंहगाईँ थी। मंहगाईँ तो दिल्ली में भी थी। फिर दिल्ली के लोग या फिर दूसरे महानगरों के लोग विरोध प्रर्दशन करने क्यों नहीं निकलते है। लेकिन जब इसका जवाब मिला तो लगा कि पैरों तले की जमीं ही खिसक गयी। &lt;br /&gt;चंबल के बीहड़ों में खबरों को कवर करने के दौरान एक बात पता चली कि डाकूओं को रोटियों की कीमत एक दो दस गुना नहीं बल्कि पांच सौ गुना तक देनी होती थी। गांव-देहात में किसी अनजान को भी पानी पिलाना &lt;br /&gt;पिलाने वाला का सम्मान माना जाता है लेकिन यहीं पानी जब किसी डाकू गिरोह को दिया जाता था तो उसकी भी कीमत वसूल की जा रही थी। ये अर्थशास्त्र समझ में नहीं आया। सालों बाद महानगरों में काम कर रहे माफिया गिरोहों की कार्यप्रणाली देखी तो समझा कि वो लोग भी अपने पैसों को पानी की तरह बहाते है। एक पुराने पुलिस वाले ने समझाया कि ये लूट के माल की सामाजिक हिस्सेदारी है। लूट में हिस्सेदारी इससे सुरक्षा मिलती है और साथ माफिया गतिविधियों को सामाजिक होने का जामा भी। आज जब मंहगाईं को चरम पर जाते देखा और दिल्ली या ऐसे ही किसी महानगर के लोगों को इस मंहगाईं पर चुप कर बैठते देखा तो वहीं ख्याल आया। &lt;br /&gt;दो दशक पहले सरकार को डर लगता था कि पेट्रोल में एक रूपये की तेजी भी महानगरों में विरोध प्रदर्शनों को न्यौता देंगी। लेकिन नब्बे के दशक में एकाएक महानगरों में सरकारी काम-काज संभालने वाले बाबूओं की सेलरी में हजारों रूपये का रातो-रात इजाफा फिर प्राईवेट कंपनियों में लाखों लोगों की लाखों रूपये की सैलरी की आमद। कुछ ही रातों में ये लोग देश की 88 करोड़ की जनता से निकलकर विशिष्ट जनों में शामिल हो गये। इन लोगों ने अचानक ऐसा कोई काम नहीं किया था कि ये लाखों रूपये के फायदे के एक दम से हकदार हो जाये लेकिन फिर भी इऩकी जेंब में पैसा आ गया। अब ये पैसा लूट के पैसे के तौर लगा। ये बात इन लोगों को भी मालूम थी कि घोर गरीबी में डूबे गांवों में स्कूल, सड़के और बिजली भेजने का पैसा उनकी जेब में आ रहा है। और यहीं से शुरू हो गया लूट में हिस्सेदारी का फार्मूला। देश के महानगरों में रहने वाले लोगों की आम नौकरी का वेतन देश के बाकी हिस्सों से कही ज्यादा है। इसीलिेय जब पेट्रोल का दाम बढ़ता है तो महानगर के आदमी को सिर्फ एक खुजली होने से ज्यादा कोई परेशानी नहीं होती। जब एक किलो दाल का भाव किसी मजदूर की एक दिन की मजदूरी के बराबर हो जाता है तब भी दिल्ली में नौकरी कर रहे लोगों को परेशानी नहीं होती। वो जानते है कि लूट में हिस्सेदारी करनी होंगी। क्योंकि लूट के इस खेल में वो अपना हिस्सा ले रहे है तो इस को बांट कर सामाजिक मान्यता तो हासिल करनी होंगी। आटा, तेल , नमक,चीनी, साबुन और भी दूसरी जरूरी चीजों के दामों में बढ़ोत्तरी बस ऐसी ही लगती है जैसी एक वसूली में कुछ पैसों का बढ़ जाना। और शायद यही कारण है कि महानगरो की एंकर हो या फिर आम निवासी सबको लगता है कि भूखे-नंगें लोग आकर इस लूट के खिलाफ अगर आवाज उठाते है तो इससे पर्दाफाश हो सकता है। &lt;br /&gt;ये सब अचानक नहीं हुआ। लाखों लोगों की एक ऐसी फौज तैयार की गयी जो देश के सत्तर करोड़़ गरीबों की रोटियों के दम पर अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाने में जुट गयी। और ये वर्ग ऐसा था जिसकी जिम्मेदारी थी कि वो राजनेताओं और सरकारों पर नियंत्रण रखें और नीचे वाले लोगों के साथ अपनी सद् भावना। &lt;br /&gt;आखिर मंदी किसके लिये आयी थी। मंदी कहां से आयी थी। मंदी का फायदा किसे मिला। मंदी का नुकसान किसने झेला। इस सवाल को मीडिया ने काफी धुंधला कर दिया। इतना धुंधला कि कोई आदमी साफ देख ही न सके। मीडिया ने एक खास मकसद से पूरा खेल इस तरह से खेला कि जैसे मंदी से देश का व्यापारी वर्ग पूरी तरह से परेशान है। पहले लेबर ला में संशोधन किये गये। फायदा किसे मिला बड़े व्यापारियों को। हजारों करोड़ रूपये की देनदारी साफ कर दी गयी। ये देनदारी किस पर थी। बैंकों में जमा पैसे किसके थे। इस बात पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया।&lt;br /&gt;कोई बड़ी कंपनी फेल नहीं हुई। छोटी ईकाईयां बंद हो गयी। किसी बड़ी ब्रांडेड कंपनी की सेल बेस सेल से नीचे नहीं गयी। लक्जरी कारों और आईटम की सेल का ग्राफ लगातार उपर उठता रहा। हजारों करोड़ रूपये की छूट दे दी गयी एक्सपोर्ट के व्यापारियों को। देश के करोड़ों लोग अपने खून की कीमत देकर देश के व्यापारियों, भ्रष्ट्र राजनेताओं और ब्यूरोक्रेट का बिल तो चुका ही रहे थे लेकिन अब करोड़ों महानगरवासियों की अय्याशी का बिल भी उनके मत्थे पड़ गया है। यानि देश को महानगरों को सजाने-संवारने की कीमत गरीबों के खून से हासिल की जा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-2326353783280215459?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/2326353783280215459/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=2326353783280215459' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2326353783280215459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/2326353783280215459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/07/blog-post_04.html' title='लुटेरों को छूट... मीडिया का छाता'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-7122047581426361972</id><published>2010-07-02T13:31:00.000+05:30</published><updated>2010-07-02T13:33:04.832+05:30</updated><title type='text'>ख्वाब हूं कि एक ख्वाब में हूं</title><content type='html'>एक ख्वाब हूं&lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;एक ख्वाब में हूं&lt;br /&gt;झूठ बोलता हुआ &lt;br /&gt;सच हूं&lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;सच बोलता हुआ&lt;br /&gt;झूठ&lt;br /&gt;दुनिया आँखों में है&lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;दुनिया की आंखों में हूं&lt;br /&gt;रास्ते से गुजर रहा हूं &lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;रास्ता मुझ से गुजर रहा है&lt;br /&gt;मै किसी को समझ रहा हूं &lt;br /&gt;कि &lt;br /&gt;मुझे समझा रहा है कोई&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-7122047581426361972?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/7122047581426361972/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=7122047581426361972' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7122047581426361972'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/7122047581426361972'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='ख्वाब हूं कि एक ख्वाब में हूं'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' 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की लड़ाई को&lt;br /&gt;मुझे गाना था&lt;br /&gt;अजनमा &lt;br /&gt;ईश्वर की असीम बड़ाई को, &lt;br /&gt;मेरे पास एक जनम था&lt;br /&gt;चुनना था कई जनमों को&lt;br /&gt;फिर &lt;br /&gt;मैंने तुम को चुन लिया &lt;br /&gt;बाकी &lt;br /&gt;सब &lt;br /&gt;छोड़ दिया &lt;br /&gt;मैंने &lt;br /&gt;अगले जनमों के लिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-8497943657615094297?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/8497943657615094297/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=8497943657615094297' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8497943657615094297'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8497943657615094297'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/06/blog-post_25.html' title='मेरे पास एक जनम था, चुनना था कई जनमों को'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-6365503218426748686</id><published>2010-06-20T12:40:00.002+05:30</published><updated>2010-06-20T12:42:59.595+05:30</updated><title type='text'>बड़े बेशर्म हो नीतिश जी....सम्राट नहीं सेवक हो बिहार के</title><content type='html'>यूं तो किसी राजनेता पर लिखने का अब कोई मन नहीं होता है। जातिय गोलबंदी के नेता। उनके पास अपना कुछ नहीं है सिर्फ जाति के। ना कोई सपना ना कोई ईमानदारी का विकल्प। सबके पास है सिर्फ जातिय गणित के दम पर की गयी घेराबंदी। कभी एक कबीले का नेता दूसरे कबीले से मिलकर सामंजस्य बैठा लेता है। कभी किसी दूसरे को अपने मुताबिक कर लेता है। और लोकतंत्र और भीड़तंत्र में अंतर कर पाने में नाकाम रही जनता सिर्फ नेता की जाति को ही महत्व देती उसके चरित्र को नहीं। मीडिया हर सत्तारूढ़ नेता को महान साबित करने की होड़ में रहता है बस अनुपात इतना रखता है जितना वो टुकडे़ फेंकता है। &lt;br /&gt;नीतिश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री है। खुद्दार मुख्यमंत्री। इतना खुद्दार कि उसने दो साल पहले बिहार में आयी बाढ़ के दौरान गुजरात राज्य की दी गयी सहायता के पांच करोड़ रूपये वापस कर दिये। इस खुद्दार नेता ने तर्क दिया है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने राज्य की दी गयी सहायता का गुनगान कर बिहार को अपमानित किया है। एक और बात कि बीजेपी के पटना अधिवेशन में नरेन्द्र मोदी का नीतिश कुमार के साथ हाथ मिलाते हुए फोटों भी लगाया गया। इस बात पर भड़क गये है नीतिश कुमार।&lt;br /&gt;गजब की खुद्दारी है। बीजेपी के समर्थन से सरकार चला रहे हो। उसकी सरकार में केन्द्र में मंत्री रहे हो। लेकिन हाथ मिलाने के फोटों से खफा। ऐसे ही है जैसे एक बाप घर में बैठ कर चोर बेटे की कमाई पर ऐश कर रहा हो। लेकिन बाहर उस पर नाराज होता रहे। ये कैसी खुद्दारी है। लेकिन नीतिश के जातिय बंधुओँ की निगाह में ये उनके नेता की महानता है। गुड़ खाये और गुलगुलों से परहेज। लेकिन नीतिश की जातिय समीकरण में राजनीतिक लाभ कमा रहे लोगों को अपने नेता की अदा दिखेंगी। &lt;br /&gt;देश के तमाम लोगों की नजर में मोदी खलनायक हो सकते है। ऐसे खलनायक जिसने अल्पसंख्यकों के सफाये की कोशिश की। लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी बात के मुताबिक गुजराती लोगों ने नरेन्द्र मोदी को उससे बेहतर तरीके से चुना है उसी तरह से जिस तरह से नीतिश कुमार को उनके राज्य के लोगों ने। अपन दोनों नेताओं के राजनीतिक विचारों से कोई ईत्तफाक नहीं रखते है। लेकिन लोकतंत्र की कसौटी वोट के दम पर दोनों चुने गये है। यहां तक तो ठीक है। लेकिन क्या नरेन्द्र मोदी ने पांच करो़ड़ रूपये अपनी जेंब से दिये थे। क्या पांच करोड़ रूपया मोदी का था। क्या हर गुजराती मोदी की तरह से नीतिश कुमार का दुश्मन है। ऐसा दुश्मन जिसकी रोटी से अपना पेट पाल रहे हो नीतिश कुमार। लेकिन ये बात मुझे नहीं झकझोरती। बात में हैरानी तब होती है जब आम जनता जिसके दम पर ये नेता जिन्हें नौकर होना चाहिये मालिक बन बैठते है। नीतिश कुमार अगर बिहार के स्वाभिमान की चिंता करते है तो दिल्ली में रोजगार से रोटी चला रहे लाखों बिहारियों को वापस बुला क्यों नहीं लेते। क्योंकि कई बार दिल्ली में उन लोगों को गाली देकर अपमानित किया जाता है। &lt;br /&gt;पैसा मोदी का नहीं था। पैसा नीतिश कुमार को नहीं दिया गया था। पैसा हिंदुस्तान के एक राज्य के लोगों के टैक्स से जमा किया गया था। वो पैसा देश के ही एक राज्य बिहार के लोगों को संकट में मदद के तौर पर दिया गया था। लेकिन नीतिश का स्वाभिमान आहत हो गया। भीख के तौर पर मिली सत्ता की रोटियां तोड़ते वक्त नीतिश को शर्म नहीं आ रही है। लेकिन हाथ मिलते हुए देख कर तिलमिला उठा हूं। आखिर ये हो क्या रहा है संघीय ढ़ांचे की ऐसी की तैसी कर रहे है नेता। लेकिन संविधान में इस बात पर कोई रोकथाम नहीं कि भाई आप नेता है सम्राट नहीं कि आपकी सनक से शासन के नियम तय होंगे। जिस सनक और हनक के साथ नरेन्द्र मोदी जनता के वोटों से चुनकर आयी सोनिया गांधी को रोम की बेटी और जाने क्या क्या कहते है उसी तरह से नीतिश कुमार अपनी हनक और सनक से एक राज्य के लोगों की मदद को वापस कर उन करोडो़ं लोगों का अपमान करते है। &lt;br /&gt;दरअसल इस संविधान को बनाते वक्त नहीं सोचा गया था कि बौने लोग ऊंची गद्दी पर बैठने के लिये हील के जूते नहीं बल्कि दूसरों की गर्दन काट लेंगे। इसी लिये नीतिश ने अपनी सनक में पैसे तो वापस कर दिये लेकिन बीजेपी के समर्थन को वापस नहीं किया। बेशर्मी देखिये बीजेपी की भी वो कह रही है कि वो नीतिश कुमार को समर्थऩ देती रहेंगी। सत्ता की मलाई खाने के लिये बेशर्म बनने में कोई बुराई नहीं है और नूरा कुश्ती से जातिय कबीलों को अपने नेताओँ के हक में बोलने की छूट मिलती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-6365503218426748686?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/6365503218426748686/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=6365503218426748686' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6365503218426748686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/6365503218426748686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/06/blog-post_5784.html' title='बड़े बेशर्म हो नीतिश जी....सम्राट नहीं सेवक हो बिहार के'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' src='http://4.bp.blogspot.com/_e94h2xjL3g8/SfGBfmGGIII/AAAAAAAAAAM/Tu_a6yAnBqI/S220/kakbhusandi+0333.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5597693578404601875.post-4965723638424546406</id><published>2010-06-20T08:23:00.001+05:30</published><updated>2010-06-20T08:25:06.448+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रीय मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉमनवेल्थ गेम्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली'/><title type='text'>दिल्ली के भेडिये....</title><content type='html'>इस&lt;br /&gt;खबर का क्या करूं। अखबार में छोटी सी छपी। दिमाग पर बड़े से हथौड़े की तरह से बज रही है। ध्यान हटाना चाहता हूं लेकिन हट नहीं रहा है। और भी अखबार है जिनमें चमकते हुए फोटो छपी हुईं हैं रगींन। लेकिन दिमाग है कि सौं शब्दों में समेटी गयी खबर से हटता ही नहीं। क्रूरता की मिसाल देने के लिये आप के दिमाग में बहुत सी मिसालें होंगीं। भोपाल छोड़ भी दें तो आपके दिमाग में बसी फिल्मों में फिल्माई गयी सारी निर्दयता भी इस खबर के सामने बौनी लग रही है। खबर..... दिल्ली की एक सड़क पर पुलिस को लाश के छोटे-छोटे टुकडे़ बीनने पड़े।....... एक्टीडेंट में घायल इस आदमी को कारो में गुजर रहे लोगों ने मदद नहीं दी बल्कि उसके उपर से कार के पहिये उतार दिये। कारों की रफ्तार इतनी तेज थी कि एक जिंदा इंसान पहले तो घायल फिर लाश और फिर टुकड़ों में तब्दील हो गया। सड़क पर इंसानी जिस्म के टुकड़े इधर से उधर फैल गये। खून सड़क से उठकर कारों के पहिये से लग कर कार वालों के साथ ही चला गया। खबर को सोच कर किसी भी इंसान के रोंगटें खड़े हो सकते है। अफसोस है कि ये पहला मामला नहीं है दिल्ली में कुछ दिन पहले ही अक्षर धाम टैंपल के सामने वाली सड़क पर इसी तरह से एक इंसान के टुकड़ें दिल्ली पुलिस ने उठाये थे। सवाल ये बचा ही नहीं कि किस गाड़ी की टक्कर से मरने वाला घायल हुआ। सवाल ये है कि हजारों कारें एक इंसान को रौंदते हुए गुजरती जा रही है बिना किसी अफसोस के। कारों में सवार ज्यादातर लोग घर वापस लौट रहे होंगे। घर जिसके अंदर उनके अपने इंतजार कर रहे होंगे। अक्सर आपने देखा होगा कई बार सड़क के बीच में किसी जानवर की लाश पड़ी होती है। पहले उस लाश के आस-पास मांस और खून का कीचड़ होता है। अगले दिन आपको सिर्फ उसकी खाल दिखाई देती है। इस तरह से जमीन से चिपकी हुई जैसे कि किसी ने सड़क पर तस्वीर बना दी हो। और फिर वो भी गायब हो जाती है। लेकिन इस तरह के आम दृश्यों में भी आप ऐसी किसी चीज की कल्पना नहीं कर सकते है कि कोई इंसान इस तरह से कुचल कर गायब होगा। ये देश की राजधानी दिल्ली है। देश के शंहशाहों का शहर। शहर जिसको खूबसूरत बनाने में हजारों करोड़ रूपये लगाये जा रहे है। ये शहर जिसमें कानून बनानी वाली संसद है। तब ये शहर इतना बेदर्द क्यों है। इसका जवाब भी दिल्ली के बाशिंदों में ही छिपा हुआ है। 15000 करोड़ रूपये खर्च कर विदेशी मेहमानों के लिये दुल्हन की तरह से सज रही है दिल्ली। लेकिन इसके लिये सबसे पहली बलि दी गयी उस गरीब आदमी और सड़क पर लेटे हुए आदमी जिसके नारों से दिल्ली की गद्दी सजती रही है। लेकिन हजारों करोड़ रूपये के इस नाजायज खर्च को राष्ट्रीय सम्मान का नाम दिया जा रहा है। इस शहर में पानी बिकता है। इस शहर में पेशाब करने का पैसा लगता है। इस शहर में भीड़-भरे इलाके में चाकूओं से गोद दिया जाता है इंसान को। इस शहर में पुलिस वाले दिन-दहाड़े रेप करने के आरोपों से घिर जाते है। लेकिन शहर है कि जागता ही नहीं। &lt;br /&gt;कुछ दिन पहले देश की राजधानी मान कर हजारों लोग इस शहर में चले आये थे अपना विरोध जताने। दिल्ली शहर के मीडिया ने जिसे राष्ट्रीय मीडिया कहा जाता है पूरे अखबार के पन्ने और टीवी प्रोग्राम्स सिर्फ किसानों के खिलाफ गालियों से भरे थे। एक राष्ट्रीय अखबार में तो बाकायदा कुछ शराब की बोतलें एक साथ इकट्ठा कर खींचे गये फोटों को ये कह कर दिखाया गया कि शराब पी रैली में आने वाले किसानों ने। ठीक है शहर के शराब के ठेके का किसानों के दम पर चलते है। फाईव स्टार होटल्स और हाल ही में माल्स में दी गयी शराब परोसने की छूट का फायदा क्या किसानों को मिलता है। भालू-बंदरों सा दर्शाया था मीडिया ने उन किसानों को जो सिर्फ दिल्ली वालों को परेशान करने ही आये थे। ऐसा ही है ये शहर। ये अलग बात है कि इस शहर का दिल कहलाये जाने वाले कनॉट प्लेस की साज-सज्जा का खर्चा आम आदमी के पैसे से जा रहा है। उस आदमी के जो अपने खून पसीने को बेच कर इस दिल में बहने वाले खून का इंतजाम कर रहा है। लेकिन शहर है कि उन आदमियों को गंदगी कह रहा है। शहर में बहुत सारी बातें है जो राष्ट्रीय मीडिया के पहले पन्ने पर छपती है जैसे कि दरियागंज में एक बस में दो भाईयों को चाकूओं से मार कर गुंड़ों ने लूट लिया। वो चिल्लाते रहे लेकिन किसी ने उनको बचाने की कोशिश ही नहीं की। इसके बाद जब ड्राईवर बस को थाने में ले जाने लगा तो उन दिल्ली वालों ने ड्राईवर को गाली-गलौज कर बस को रुकवाया और उतर कर चलते बने। ये जाने क्यों इस शहर की फितरत है। कभी रोम के बारे में लिखते हुए विश्व कवि नाजिम हिकमत ने कहा था कि &lt;br /&gt;" इस शहर को तो ऐसा ही होना था...क्योंकि इस शहर की नींव में भेडिये का दूध और भाई का खून......। लेकिन हमको इतिहास की किताबों में सिर्फ ये तलाशना है कि क्या किसी पीर, मुर्शीद , औलिया या साधुःसंत ने इस शहर को ऐसा होने का शाप दिया था क्या।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-4965723638424546406?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/4965723638424546406/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=4965723638424546406' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/4965723638424546406'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/4965723638424546406'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://medialok.blogspot.com/2010/06/blog-post_20.html' title='दिल्ली के भेडिये....'/><author><name>mediajantantra</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='21' 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तलक किसी को मनायेंगी&lt;br /&gt;.....................................................&lt;br /&gt;टूटी हुई ही सही आस रहनी रहनी चाहिये&lt;br /&gt;भरे गले में भी एक प्यास रहनी चाहिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5597693578404601875-8663808546041813085?l=medialok.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://medialok.blogspot.com/feeds/8663808546041813085/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5597693578404601875&amp;postID=8663808546041813085' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8663808546041813085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5597693578404601875/posts/default/8663808546041813085'/><link rel='alternate' 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बाहर चींखतें हुए इंसानों की तस्वींरें टीवी चैनल्स पर दिखती रही। अगले दिन के अखबारों में छप गया वो फोटो एक बेहद मासूम सी बच्ची को दफनाते वक्त का। फैसला आया तो कुछ सूझा ही नहीं। दर्द और अपमान के अलावा कोई दूसरी भावना दिमाग में नहीं थीं। लिख नहीं पाया। पुराने सारे मंजर और तस्वीरें एक एक कर टीवी चैनल्स दिखा रहे थे। फैसले की बार-बार हवा में तैरती आवाज दिल को तोड़ रही थी। देश के कानून मंत्री ने कहा कि न्याय को दफन कर दिया गया। किसने ...। अदालत ने, देश के कानून ने, नेताओं ने या खुद जनता ने ये सवाल हवा में गूंज रहा है। लेकिन मुझे इसको लेकर कोई अफसोस नहीं कि ये सब झूठ बोल रहे है। पूरा देश पिछले साठ सालों से इसी तरह से चलाया जा रहा है। जातियों के दम पर टके के नेता चुन कर संसद और विधानसभाओं में पहुंच कर कानून बनाने में जुटे हैं। कौन सा कानून वहीं जो अमीरजादों और ताकतवर लोगों के हक में काम करता रहे। लेकिन ये मरे हुए मन का रूदन है। पुराना पाठ है। &lt;br /&gt;जब हजारों लोग मारे गये। किसी ने तो लापरवाही की होंगी। देश के तत्कालीन  प्रधानमंत्री राजीव गांधी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का फैसला रहा होंगा। लेकिन किसी को क्या फर्क पड़ता है। केन्द्र हो या राज्य दोनों में दूसरी पार्टियों की सरकारों ने भी राज किया है इस पच्चीस सालों के बीच। लेकिन किसी को को वास्ता नहीं था। सुप्रीम कोर्ट में बैठे न्यायधीशों को इस बात का याद रहता है कि आरटीआई के माध्यम से सूचना देना सुप्रीम कोर्ट के विशेषाधिकारों का हनन है। बेस्ट बेकरी केस जहीरा शेख का मामला हो या फिर गुजरात में अहसान जाफरी गुलबर्गा सोसायटी का मामला हो सब में नयी परंपरा डाली जा सकती है लेकिन पच्चीस हजार लोगों की अकाल मौत पर नहीं। अगर आप देश को और करीब से समझना चाहते है तो सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में सरकार की ओर से और कंपनी की ओर से खड़े वकीलों की फेहरिस्त देख लेंगे तो समझ लेंगें कि क्यों दोगलापन इस देश की रगो में दौड़ रहा है। &lt;br /&gt;आ
